Introduction
जब दुनिया दो खेमों में बंट रही हो, तब भारत क्या करे? मान लीजिए दुनिया में दो बड़े शक्तिशाली देश एक-दूसरे के विरोध में खड़े हैं और दोनों चाहते हैं कि भारत उनके साथ खड़ा हो। ऐसी स्थिति में भारत के सामने दो रास्ते हो सकते हैं या तो किसी एक खेमे का हिस्सा बन जाए या फिर अपने हितों के आधार पर हर मुद्दे पर स्वयं निर्णय ले। यहीं से Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा को समझने की शुरुआत होती है।
भारत की विदेश नीति में Strategic Autonomy का अर्थ यह नहीं है कि भारत दुनिया से दूरी बना ले या किसी देश के साथ साझेदारी न करे। इसके विपरीत, भारत अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम एशिया और Global South के देशों के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग करता है। उद्देश्य यह है कि इन संबंधों से भारत की निर्णय लेने की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हित प्रभावित न हों। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्यों में राष्ट्रीय सुरक्षा, समृद्धि और ऐसा strategic space बनाए रखना शामिल है जिसमें भारत अपने विकास और राष्ट्र-निर्माण पर ध्यान दे सके। इसलिए Strategic Autonomy को एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है: “दूसरों के साथ साझेदारी करना, लेकिन अपने फैसलों की चाबी अपने हाथ में रखना।”
Strategic Autonomy क्या है?
Strategic Autonomy का सामान्य अर्थ है—किसी देश की ऐसी क्षमता और नीति जिसके द्वारा वह अपने राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक उद्देश्यों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय ले सके, भले ही उस निर्णय से किसी शक्तिशाली देश या समूह की प्राथमिकताएँ पूरी तरह मेल न खाती हों।
सरल भाषा में समझें तो Strategic Autonomy का अर्थ है, “मित्रता सभी से हो सकती है, लेकिन विदेश नीति का अंतिम निर्णय राष्ट्रीय हित के आधार पर होगा।”
इसमें दो बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं:- Decision-making autonomy अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता। Strategic space ऐसी स्थिति जिसमें किसी बाहरी शक्ति का दबाव भारत की नीति-निर्माण क्षमता को सीमित न कर सके। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी strategic space और autonomy को भारत के विदेश नीति उद्देश्यों से जोड़ा है।
Strategic Autonomy की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई विश्व सरकार नहीं होती जो सभी देशों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करे। प्रत्येक राज्य को अपनी सुरक्षा, आर्थिक हित और रणनीतिक आवश्यकताओं का ध्यान स्वयं रखना पड़ता है। भारत जैसे बड़े देश के लिए यह चुनौती और जटिल हो जाती है क्योंकि भारत के हित एक साथ कई क्षेत्रों में जुड़े हैं जैसे – चीन के साथ सीमा और सुरक्षा, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध, अमेरिका के साथ तकनीक, व्यापार और Indo-Pacific सहयोग, यूरोप के साथ व्यापार और technology, पश्चिम एशिया के साथ ऊर्जा और भारतीय प्रवासियों के हित, Global South के साथ विकास और वैश्विक शासन सुधार, हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा, इसलिए भारत के लिए किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर होना रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है।
Strategic Autonomy और भारत की विदेश नीति
भारत की विदेश नीति में Strategic Autonomy कोई बिल्कुल नई अवधारणा नहीं है। स्वतंत्रता के बाद Jawaharlal Nehru के नेतृत्व में भारत ने Cold War के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले दो शक्ति-गुटों में शामिल होने से परहेज किया। भारत की नीति का मूल विचार था कि भारत अपने निर्णय स्वयं ले और किसी महाशक्ति के strategic camp का स्थायी हिस्सा न बने। विदेश मंत्रालय के ऐतिहासिक विवरण में Nehru की इसी सोच को रेखांकित किया गया है कि भारत दोनों गुटों से मित्रतापूर्ण संबंध रख सकता है, लेकिन किसी एक के विरुद्ध दूसरे के गुट में शामिल नहीं होगा। इसी ऐतिहासिक सोच से Non-Alignment विकसित हुआ।
लेकिन Cold War समाप्त होने के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बदल गई। सोवियत संघ का विघटन हुआ, अमेरिका की शक्ति बढ़ी और बाद में चीन एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा। भारत को भी अपनी विदेश नीति में बदलाव करना पड़ा। यहीं से Strategic Autonomy ने एक नए रूप में महत्व प्राप्त किया।
Non-Alignment और Strategic Autonomy में क्या अंतर है?
दोनों अवधारणाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं, लेकिन बिल्कुल समान नहीं हैं।
Non-Alignment
प्रमुख संदर्भ – Cold War
मुख्य उद्देश्य – शक्ति-गुटों से दूरी
मुख्य चिंता – किसी bloc में शामिल न होना
साझेदारी – सीमित/संदर्भ आधारित
वर्तमान उपयोगिता – ऐतिहासिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण
Strategic Autonomy
प्रमुख संदर्भ – Multipolar/Contemporary World
मुख्य उद्देश्य – स्वतंत्र निर्णय क्षमता
मुख्य चिंता – किसी बाहरी शक्ति पर रणनीतिक निर्भरता कम रखना
साझेदारी – व्यापक और क्षेत्र-विशिष्ट
वर्तमान उपयोगिता – वर्तमान विदेश नीति में अधिक प्रासंगिक
आसान उदाहरण – Cold War में सवाल था, “आप अमेरिका के साथ हैं या सोवियत संघ के साथ?”
Strategic Autonomy में भारत का दृष्टिकोण अधिक लचीला है, “जहाँ भारत का हित होगा, वहाँ भारत सहयोग करेगा; लेकिन किसी साझेदारी का अर्थ यह नहीं कि हर मुद्दे पर भारत वही दृष्टिकोण अपनाएगा।”
Strategic Autonomy का मतलब Isolation नहीं है यह एक बहुत महत्वपूर्ण conceptual distinction है (Strategic Autonomy ≠ Isolation)। Strategic Autonomy का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है Engagement without dependence अर्थात् दुनिया के साथ सक्रिय रूप से जुड़ना, लेकिन ऐसी निर्भरता से बचना जो राष्ट्रीय निर्णयों को कमजोर कर दे।
भारत की विदेश नीति में आज विभिन्न देशों और समूहों के साथ व्यापक engagement इसका उदाहरण है। MEA के अनुसार भारत की विदेश नीति बदलते अंतरराष्ट्रीय वातावरण के अनुसार pragmatic और dynamic होनी चाहिए।
Multi-Alignment और Strategic Autonomy
आज भारत की विदेश नीति को समझने के लिए Multi-Alignment की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है। Multi-Alignment का अर्थ है कि भारत अलग-अलग देशों और समूहों के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग कर सकता है। उदाहरण के लिए भारत अमेरिका के साथ strategic और technological cooperation करता है। रूस के साथ लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा संबंध रखता है। जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ Indo-Pacific में सहयोग करता है। BRICS में रूस और चीन सहित अन्य देशों के साथ काम करता है। SCO में चीन और रूस के साथ मौजूद है। Global South के देशों के साथ विकास और वैश्विक शासन के मुद्दों पर सहयोग करता है। इस प्रकार भारत का लक्ष्य किसी एक alliance system में पूरी तरह समाहित होना नहीं, बल्कि विभिन्न साझेदारियों का उपयोग अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए करना है।
भारत की Strategic Autonomy के प्रमुख आधार
Strategic Autonomy केवल विदेश मंत्रालय या कूटनीति से नहीं बनती। इसकी वास्तविक शक्ति देश की आंतरिक क्षमताओं से आती है।
आर्थिक शक्ति
जिस देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, उसके पास विदेश नीति में अधिक विकल्प होते हैं। आर्थिक कमजोरी किसी देश को बाहरी सहायता, बाजार या वित्तीय संस्थाओं पर अत्यधिक निर्भर बना सकती है। इसलिए Economic Strength → Strategic Options → Strategic Autonomy का संबंध महत्वपूर्ण है।
रक्षा क्षमता
यदि किसी देश की सुरक्षा पूरी तरह दूसरे देशों के हथियारों, तकनीक या intelligence support पर निर्भर हो तो उसकी strategic autonomy सीमित हो सकती है। इसीलिए भारत में Defence Self-Reliance को Strategic Autonomy से जोड़ा जा रहा है। 15 अगस्त 2025 के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने Operation Sindoor को भारत की defence self-reliance और strategic autonomy से जोड़ा तथा indigenous defence capabilities के महत्व पर जोर दिया।
Technology और Strategic Autonomy
आज Strategic Autonomy केवल सैनिक शक्ति का विषय नहीं है। इसके नए आयाम हैं जो इस प्रकार है – Artificial Intelligence, Semiconductors, Cybersecurity, Space technology, Digital infrastructure, Telecommunications, Critical minerals, Biotechnology। MEA के 2026 के Foreign Service training material में भी technological sovereignty और strategic autonomy के बीच बढ़ते संबंध पर चर्चा की गई है। इसका अर्थ है कि भविष्य में Technology Dependence भी Strategic Dependence बन सकती है।
Energy Security
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी देश की energy supply किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर हो जाए तो geopolitical crisis के समय उसकी foreign-policy choices प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए भारत विभिन्न देशों और क्षेत्रों से energy relationships बनाए रखने की कोशिश करता है। यहाँ Strategic Autonomy का अर्थ ऊर्जा के मामले में पूर्ण आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि diversification और विकल्पों की उपलब्धता है।
Supply Chain Resilience
COVID-19 और बाद की geopolitical disruptions ने दिखाया कि वैश्विक supply chains कितनी महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी critical product के लिए किसी देश की पूरी निर्भरता एक ही विदेशी स्रोत पर हो तो संकट की स्थिति में राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसलिए Strategic Autonomy का आधुनिक अर्थ resilient और diversified supply chains से भी जुड़ गया है।
भारत की Strategic Autonomy के प्रमुख उदाहरण
अमेरिका और रूस के साथ समानांतर संबंध
भारत का अमेरिका के साथ strategic partnership मजबूत है, लेकिन साथ ही रूस के साथ भी उसके ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध बने हुए हैं। यह स्थिति दिखाती है कि भारत किसी एक शक्ति के साथ संबंधों को दूसरे के साथ संबंध समाप्त करने की शर्त नहीं मानता। ऐतिहासिक रूप से भी MEA ने भारत की विदेश नीति को major powers के साथ संबंध रखते हुए strategic autonomy बनाए रखने से जोड़ा है।
BRICS और Quad दोनों में भारत
यह Strategic Autonomy समझने का शायद सबसे अच्छा contemporary example है। भारत BRICS का सदस्य है, जिसमें चीन और रूस जैसे देश शामिल हैं। दूसरी ओर भारत Quad में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग करता है। पहली नजर में यह विरोधाभासी लग सकता है। लेकिन Strategic Autonomy के दृष्टिकोण से देखें तो दोनों platforms के उद्देश्य और भारत के हित अलग-अलग क्षेत्रों में हैं। इसलिए भारत दोनों के साथ काम कर सकता है।
2026 में BRICS भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
2026 में भारत ने BRICS की अध्यक्षता संभाली और इसका theme रखा: “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability.” सितंबर 2026 में नई दिल्ली में 18वाँ BRICS Summit आयोजित हुआ। BRICS New Delhi Declaration में sovereign equality, cooperation, inclusiveness और अधिक representative तथा fairer international order जैसे सिद्धांतों पर जोर दिया गया। यह Strategic Autonomy के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत एक तरफ पश्चिमी देशों के साथ व्यापक strategic cooperation करता है, वहीं दूसरी तरफ Global South और emerging economies के platforms में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। यानी भारत के लिए BRICS किसी एक देश-विरोधी गठबंधन की तरह नहीं, बल्कि वैश्विक शासन में अपनी आवाज और विकल्प बढ़ाने का एक मंच भी है।
Defence Self-Reliance
Strategic Autonomy की वास्तविक परीक्षा संकट के समय होती है। यदि युद्ध या गंभीर सुरक्षा संकट के समय भारत को अपनी आवश्यक सैन्य क्षमता के लिए पूरी तरह दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़े, तो उसके strategic choices सीमित हो सकते हैं। इसी कारण भारत defence manufacturing, indigenous weapons systems, R&D और domestic defence production पर जोर दे रहा है। भारत सरकार के अनुसार, 2025 में Operation Sindoor के अनुभव को defence self-reliance और strategic autonomy के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया।
भारत और चीन
भारत और चीन के संबंध Strategic Autonomy की जटिलता को समझने का अच्छा उदाहरण हैं। दोनों देशों के बीच सीमा और सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौतियाँ हैं। लेकिन इसके साथ ही दोनों बहुपक्षीय संगठनों में भी साथ काम करते हैं। 2025 में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति Xi Jinping की बैठक में दोनों पक्षों ने bilateral relations को तीसरे देश के दृष्टिकोण से न देखने तथा दोनों देशों की strategic autonomy का उल्लेख किया। इससे यह समझ आता है कि international politics में competition और cooperation एक साथ मौजूद हो सकते हैं।
भारत के लिए Strategic Autonomy क्यों महत्वपूर्ण है?
राष्ट्रीय सुरक्षा
भारत की भौगोलिक स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर में चीन और हिंद महासागर क्षेत्र में बदलती maritime competition भारत को ऐसी विदेश नीति की आवश्यकता देती है जिसमें उसके पास पर्याप्त strategic options हों।
राष्ट्रीय हितों की रक्षा
हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर भारत की प्राथमिकताएँ किसी दूसरे देश से समान नहीं हो सकतीं। Strategic Autonomy भारत को यह क्षमता देती है कि वह किसी मुद्दे पर अपने national interest के अनुसार निर्णय ले।
Great Power Competition में संतुलन
आज अमेरिका-चीन strategic competition, रूस-पश्चिम तनाव, Indo-Pacific competition और बदलती global alliances ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक जटिल बना दिया है। ऐसे वातावरण में किसी एक power bloc पर निर्भरता भारत के विकल्पों को सीमित कर सकती है।
भारत की Global Role
Strategic Autonomy केवल अपने हितों की रक्षा का साधन नहीं है। भारत स्वयं को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है जो Global South, multilateral reform और वैश्विक समस्याओं पर अपनी भूमिका निभा सके। MEA के 2024 Annual Report में भारत की foreign policy को strategic autonomy बढ़ाने, Global South की प्राथमिकताओं को आगे रखने और multilateral institutions में सुधार की दिशा में सक्रिय बताया गया था।
Strategic Autonomy की सीमाएँ और चुनौतियाँ
यह मान लेना गलत होगा कि Strategic Autonomy का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता है। आज कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था पूरी तरह self-sufficient नहीं है।
भारत को चाहिए कि, विदेशी technology, international trade, energy imports, foreign investment, critical minerals, global supply chains, defence technology, international cooperation इसलिए आधुनिक Strategic Autonomy का अर्थ पूर्ण आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि dependence को manage करने की क्षमता है।
सबसे बड़ी चुनौती
यदि Strategic Autonomy को केवल “किसी की बात न मानना” समझ लिया जाए तो यह विदेश नीति को isolation की ओर ले जा सकती है। और यदि साझेदारियों में अत्यधिक निर्भरता हो जाए तो autonomy कमजोर हो सकती है। इसलिए असली चुनौती है कि Partnership और Independence के बीच संतुलन।
क्या Strategic Autonomy हमेशा संभव है?
पूरी तरह नहीं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सभी देशों के बीच परस्पर निर्भरता बढ़ चुकी है। उदाहरण के लिए एक देश technology में मजबूत हो सकता है लेकिन energy imports पर निर्भर हो सकता है। दूसरा देश energy में मजबूत हो सकता है लेकिन technology में पीछे हो सकता है। इसलिए Strategic Autonomy का आधुनिक अर्थ absolute independence नहीं बल्कि maximum possible freedom of action है। यही distinction परीक्षा में लिखना विशेष रूप से उपयोगी है।
Strategic Autonomy की आलोचना
कुछ आलोचक मानते हैं कि Strategic Autonomy कभी-कभी बहुत व्यापक अवधारणा बन जाती है और इसकी स्पष्ट सीमा निर्धारित करना कठिन होता है। दूसरी आलोचना यह है कि autonomy बनाए रखने के लिए अत्यधिक resources चाहिए।
एक देश को, मजबूत economy, advanced technology, military capability, diplomatic capacity, energy security, resilient supply chains विकसित करनी पड़ती हैं। अर्थात् Strategic Autonomy केवल diplomatic skill से नहीं आती; national power उसका आधार है। 2025 में MEA के एक Foreign Service monograph में भी इस बात पर जोर दिया गया कि genuine strategic autonomy के लिए economic, technological और military capabilities का निर्माण महत्वपूर्ण है।
Strategic Autonomy को एक उदाहरण से समझिए
मान लीजिए एक परिवार को बाजार से किसी वस्तु की आवश्यकता है। यदि वह केवल एक दुकानदार पर निर्भर है, तो दुकानदार कीमत और शर्तें तय करने की बेहतर स्थिति में होगा। लेकिन यदि परिवार के पास पाँच अलग-अलग विकल्प हैं, अपनी कुछ वस्तुएँ स्वयं बनाने की क्षमता है और आर्थिक रूप से मजबूत है, तो वह बेहतर निर्णय ले सकता है। देशों के मामले में भी यही logic लागू होता है। अनेक साझेदार + घरेलू क्षमता + आर्थिक शक्ति + तकनीकी क्षमता + सैन्य क्षमता = अधिक Strategic Autonomy
भारत की Strategic Autonomy का भविष्य
आने वाले वर्षों में Strategic Autonomy केवल traditional diplomacy का विषय नहीं रहने वाली है। इसके साथ निम्न विषय और अधिक महत्वपूर्ण होंगे:
- Technology Autonomy – AI, semiconductors, cyber और digital infrastructure।
- Defence Autonomy – स्वदेशी defence production और R&D।
- Energy Autonomy – विभिन्न energy sources और suppliers का diversification।
- Economic Resilience – Global shocks के समय अर्थव्यवस्था की स्थिरता।
- Supply Chain Resilience – Critical goods के लिए diversified sources।
- Diplomatic Flexibility – एक से अधिक strategic partnerships बनाए रखने की क्षमता।
इसलिए 21वीं सदी की Strategic Autonomy को केवल “गुटनिरपेक्षता” के पुराने अर्थ में समझना पर्याप्त नहीं होगा।
Strategic Autonomy: एक लाइन में पूरी अवधारणा – Strategic Autonomy ऐसी विदेश नीति और राष्ट्रीय क्षमता है जिसके माध्यम से कोई देश बाहरी शक्तियों पर अत्यधिक रणनीतिक निर्भरता से बचते हुए अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने और आवश्यकतानुसार विभिन्न देशों के साथ साझेदारी करने की क्षमता बनाए रखता है।
निष्कर्ष
Strategic Autonomy को केवल “किसी का दबाव न मानने” की नीति के रूप में समझना अधूरा होगा। इसका वास्तविक अर्थ है कि भारत के पास अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने के लिए पर्याप्त strategic space, capabilities और diplomatic options हों। भारत किसी एक शक्ति से संबंध बनाकर बाकी दुनिया से दूरी नहीं बनाता। इसके बजाय वह अलग-अलग देशों और समूहों के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग करता है और कोशिश करता है कि कोई एक बाहरी शक्ति उसकी विदेश नीति के विकल्पों को नियंत्रित न करे।
आज की multipolar और तेजी से बदलती दुनिया में यह नीति भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन Strategic Autonomy की असली ताकत केवल diplomacy में नहीं है। मजबूत अर्थव्यवस्था, defence capability, technology, energy security और resilient supply chains इसके वास्तविक आधार हैं।
इसलिए भारत की Strategic Autonomy का अंतिम लक्ष्य दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि दुनिया के साथ जुड़कर भी अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता बनाए रखना है।
FAQs
- Strategic Autonomy क्या है?
Strategic Autonomy का अर्थ है कि कोई देश अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा आवश्यकताओं के आधार पर स्वतंत्र रणनीतिक निर्णय लेने की क्षमता रखे और किसी बाहरी शक्ति पर अत्यधिक निर्भर न हो। - क्या Strategic Autonomy का मतलब किसी देश से गठबंधन न करना है?
नहीं। Strategic Autonomy के बावजूद देश विभिन्न देशों के साथ strategic partnerships और अन्य प्रकार के सहयोग कर सकता है। - क्या Strategic Autonomy और Non-Alignment समान हैं?
नहीं। Non-Alignment मुख्यतः Cold War के power blocs से जुड़ी अवधारणा थी, जबकि Strategic Autonomy का जोर वर्तमान परिस्थितियों में स्वतंत्र decision-making और strategic space पर है। - क्या भारत Strategic Autonomy की नीति अपनाता है?
हाँ। भारत की विदेश नीति में strategic space और autonomy लंबे समय से महत्वपूर्ण लक्ष्य रहे हैं। - क्या Strategic Autonomy का अर्थ आत्मनिर्भरता है?
पूरी तरह नहीं। आत्मनिर्भरता Strategic Autonomy को मजबूत कर सकती है, लेकिन Strategic Autonomy का दायरा diplomatic, economic, technological, military और strategic decision-making तक विस्तृत है। - BRICS और Quad भारत की Strategic Autonomy को कैसे दर्शाते हैं?
भारत BRICS में चीन और रूस सहित अन्य देशों के साथ सहयोग करता है तथा Quad में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ। यह भारत की विभिन्न strategic platforms पर simultaneously engage करने की क्षमता को दर्शाता है। - Strategic Autonomy के लिए कौन-कौन सी क्षमताएँ जरूरी हैं?
आर्थिक शक्ति, रक्षा क्षमता, technology, energy security, supply-chain resilience और प्रभावी diplomacy इसके महत्वपूर्ण आधार हैं।

