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राज्य की परिभाषा

राज्य की परिभाषा अर्थ और प्रकृति के PYQ आधारित Notes बनाये गए हैं। इसमें राज्य के आवश्यक तत्वों, राजनीति विज्ञान की विचारधाराएँ आदर्शवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद, विकासवाद, कल्याणकारी राज्य  का विवरण है। जो TGT Civics, PGT Civics, LT Civics, GIC Political Science, UGC NET Political Science, Political Science Assistant Professor, UPPSC etc. के विगतवर्षों में आयोजित परीक्षाओं के प्रश्नो पर आधारित है।

राज्य का अर्थ,परिभाषा व प्रकृति

ग्रीक भाषा के शब्द ‘पोलिस’ (Polis) से राज्य शब्द की उत्पत्ति हुई है जिसका अर्थ नगर-राज्य होता है प्राचीन यूनानी नगर राज्य की व्यवस्था के बारे में कहा जाता है कि “राज्य ही नगर था और चर्च भी”। प्राचीन यूनानी विचारक अरस्तु का मानना है कि राज्य की उत्पत्ति जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए हुई किन्तु यह सद्जीवन को वनाए रखने के लिए बना रहा। अरस्तु का कहना है कि राज्य व्यक्ति से पूर्व का संगठन है। अर्थात व्यक्ति राज्य का एक भाग है जबकि राज्य पूर्ण है। उदाहरण के लिए एक पेड़ पूर्ण है जबकि डाली एक भाग है। डाली पेड़ से निकलती है अतः पेड़ डाली से पूर्व का है। इस प्रकार राज्य व्यक्ति का पूर्वगामी है। अरस्तु का कहना है कि राज्य के बाहर रहने वाला मनुष्य पशु या देवता है।

इटली में ट्यूटोनिक कबीलों की भाषा ‘ट्यूटोनिक’ के शब्द ‘स्टेट्स’ से अंग्रजी भाषा का शब्द ‘स्टेट’ उत्पन्न हुआ है। जबकि मैकियावेली के द्वारा ‘द प्रिंस’ नामक पुस्तक में इतावली भाषा का शब्द ‘स्टेटो’ का प्रयोग किया है।

मैकियावेली वह विचारक है जिसने आधुनिक काल मे राज्य शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया और आधुनिक राज्य की अवधारणा को प्रस्तुत किया। मैकियावेली के अनुसार राज्य एक ऐसी संस्था है जो अपने क्षेत्र में सर्वोच्च शक्ति का प्रयोग करती है। अतः मैकियावेली ने राज्य को सभी प्रतिबंधों से मुक्त कर दिया। इसके द्वारा राजनीति से धर्म और नैतिकता के हटा दिया गया तथा आधुनिक एवं व्यावहारिक राजनीति का प्रारम्भ किया गया। इसलिए मैकियावेली को आधुनिक राजनीति का जनक या पिता कहा जाता है।

मैकियावेली, नीत्स और कैटलिन ने राज्य को शक्ति के रूप में परिभाषित किया है। टी. एच. ग्रीन ने राज्य का आधार शक्ति नहीं इच्छा को बताया है। राज्य का उद्देश्य व्यक्ति का नैतिक विकास है। अतः राज्य को केवल वे कार्य करने चाहिए जो समाज के अच्छे जीवन के लिए आवश्यक हो। ग्रीन का मानना है कि राज्य स्वतंत्रता की सृष्टि के लिए शक्ति का प्रयोग कर सकता है। ग्रीन सर्वसत्तावादी नहीं है। ग्रीन ने कहा की राज्य का कार्य एक उत्तम (अच्छे) जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना है।

लीकॉक का मानना है कि राज्य एक निश्चित भू-भाग में जनता द्वारा कानून स्थापना के लिए संगठित समूह है। तथा सरकार राज्य का अभिव्यक्त रूप है, जो व्यक्ति के सामान्य उद्देश्यों की पूर्ती करता है। जिसका अर्थ है राज्य अमूर्त है और सरकार ही राज्य का व्यवहारिक एवं मूर्त रूप है।

ब्लंशली (ब्लंटशली) ने राज्य को एक निश्चित भूभाग के राजनीतिक दृष्टि से संगठित लोग के रूप में परिभाषित किया है। ब्लंट्शली का वि़चार है की राज्य मानव शरीर का प्रतिरूप है। ब्लंशली का कहना है कि आधुनिक राज्य का मुख्य पक्ष उसकी भूमि, शारीरिक हिंसा के साधनों पर एकाधिकार तथा वैधानिकता है।

ग्राम्शी के अनुसार राज्य एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर अधिपत्य के कारण अस्तित्व में आया है। ग्राम्शी के अधिपत्य का आशय केवल आर्थिक एवं सैन्य शक्ति नहीं है बल्कि शासन वर्ग का बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व है। राज्य की सापेक्ष स्वायत्तता की संपल्पना इटली के विचारक ग्राम्शी के साथ जुड़ी है।

रॉबर्ट मैकाइवर ने कहा कि राज्य का स्वरूप मुलतः एक निगम है। क्योंकि राज्य की शक्ति का स्रोत नागरिक होते है। मैकाइवर के अनुसार रक्त संबंध समाज का निर्माण करता है और कालांतर में राज्य को जन्म देता है। मैकाइवर का कहना है कि यह सत्य है कि जहाँ दमनकारी शक्ति नहीं होती वहाँ राज्य नहीं होता, परंतु शक्ति के प्रयोग से ही राज्य का निर्माण नहीं होता अन्यथा दस्यूपोत या विद्रोही सेना भी एक राज्य कही जा सकती है।

डायसी का कहना है कि राज्य सरकार के संसाधनों से संगठित एक व्यक्ति है जो कानून का निर्माण एवं क्रियान्वयन करता है। डायसी राज्य की विधि शास्त्रीय सिद्धांत के समर्थक है जिसके अनुसार राज्य एक विधिक या कानूनी व्यक्ति है।

जॉन लॉक ने राज्य और सरकार में विभेद किया है। लॉक के द्वारा दो समझौतों का सिद्धांत दिया गया। एक के द्वारा राज्य का निर्माण किया गया और दूसरे के द्वारा सरकार का निर्माण किया गया। जिसमें राज्य निर्माण के समझौते को कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता लेकिन सरकार को हटाया जा सकता है।

रूसो के अनुसार प्रत्येक राज्य में एक इच्छा होती है जो विधिक रूप से अन्य सभी इच्छाओं पर प्रबल होती है। रूसो के सामान्य इच्छा के सिद्धांत से प्रेरित हो, इमैनुअल कांट ने नैतिक इच्छा की स्वाधीनता का समर्थन किया है। कांट के अनुसार राज्य एक नैतिक संवास है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति के जीवन को नैतिक और न्यायसंगत बनाना है। कांट का मत है राज्य उच्चतम नैतिकता का प्रतिनिधित्व करता है। कांट को आधुनिक आदर्शवाद का पिता माना जाता है।

रॉबर्ट नॉजिक के द्वारा राज्य की रात्रिप्रहरी-राज्य की अवधारणा का समर्थन किया गया। जिसका अर्थ होता है जैसे रात के समय चौकीदार रखवाली का काम करता है उसी प्रकार राज्य को केवल देख-रेख का कार्य करना चाहिए। इसी को न्यूनतम राज्य की अवधारणा भी कहते है। व्यक्तिवादी राज्य की इसी पुलिसमैन की भूमिका का समर्थन करते है।

समाज राज्य से व्यापक है। राज्य की शक्ति मौलिक एवं प्राथमिक है। राज्य अन्य समुदायों की तुलना में श्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास दण्डकारी शक्ति है। राज्य अमूर्त तथा सरकार मूर्त है। सरकार राज्य की अभिकर्त्ता है। सरकार की प्रकृति क्षणभंगुर और सत्ता सीमित है।

विचारकों कों के द्वारा राज्य के लिए प्रयोग किये गए शब्द

  • थॉमस हॉब्स ने राज्य (इंगित करने) के ‘कॉमनवेल्थ’ का प्रयोग किया है जो समाज, राज्य तथा शासन का सामूहिक नाम है।
  • बोदां ने राज्य की जगह ‘रिपब्लिक’ शब्द को प्रथमिकता दी है।
  • लॉक के द्वारा राज्य की जगह ‘समुदाय’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

राज्य साधन है या साध्य ?

राज्य के स्वरूप के बारे में कोई निश्चित धारणा नहीं है। चुँकि आदर्शवादी राज्य को प्राकृतिक और स्वयं में साध्य के रूप में मानते है। जबकि उदारवादियों ने राज्य को साधन माना है। अतः राज्य को साध्य और साधन दोनों माना जाता है।

अर्द्ध राज्य

ऐसा राज्य जो क्षेत्राधिकार परक राज्यत्त्व से संपन्न हो परंतु अनुभव परक राज्यत्त्व में अत्यधिक विपन्न हो अर्द्ध राज्य कहलाता है।

राज्य के कितने अनिवार्य  तत्व हैं?

राज्य के चार अनिवार्य तत्व होते है।

  1. संप्रभुता,
  2. भू-भाग,
  3. जनसंख्या,
  4. सरकार

संप्रभुता को राज्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व या सर्वोच्च शक्ति के रूप में माना जाता है। इसके बिना राज्य का निर्माण संभव नहीं है। संप्रभुता को राज्य का आध्यात्मिक तत्व या आत्म-तत्व भी कहा जाता है। संप्रभुता शब्द का प्रयोग जींन बोंदा की पुस्तक ‘डी रिपब्लिका’ में पहली वार किया गया। हॉब्स के द्वारा सामाजिक समझौते के सिद्धांत के साथ संप्रभु राज्य की अवधारणा को संयुक्त किया गया है।

सीले के द्वारा भू-भाग को राज्य का आवश्यक तत्व नहीं माना जाता है। इसके समर्थक डुग्वी, विलोबी और लिमोन है।

आदर्शवाद के अनुसार राज्य की परिभाषा

आदर्शवादी विचारक हीगल के अनुसार राज्य एक संसार है जिसे आत्मा अपने लिए बनाती है। उसने राज्य को आध्यात्मिक रूप में आत्मा की अभिव्यक्ति माना। हीगल ने यहाँ तक कहा कि ‘राज्य पृथ्वी पर ईश्वर का पदक्रम या अवतरण है। यह पृथ्वी पर विद्यमान एक दैवीय विचार है’। आदर्शवाद राज्य की अत्यधिक प्रशंसा करता है।

विकासवाद के अनुसार राज्य की परिभाषा

विकासवादी सिद्धांत का मानना है कि ‘राज्य की उत्पत्ति न तो एक निश्चित समय में हुई है और न ही एक विशेष कारण से हुई है’। राज्य न तो प्रभु के हाथ का कार्य है, न ही सर्वोच्च भौतिक शक्तियों का परिणाम है, न ही संकल्प या रूढ़ि की उत्पत्ति है, न ही परिवार का मात्र विस्तार है। बल्कि यह एक स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया है। इसलिए राज्य प्राकृतिक विकास की संस्था है। विकासवादी सिद्धांत, ऐतिहासिक सिद्धांत के अंतर्गत आता है।

राज्य के विकास क्रम की अवस्थाऐं –

  1. पूर्वर्ती (प्राच्य) राज्य,
  2. यूनानी राज्य,
  3. रोमन राज्य,
  4. सामंति राज्य,
  5. राष्ट्र राज्य

अराजकतावाद के अनुसार राज्य

अराजकतावादी क्रोपोटकिन और जॉर्ज सौरल राज्य की हिसां एवं शोषण के यंत्र के रूप में भर्त्सना (आलोचना) करते है। जॉर्ज सौरल मानना है कि संपूर्ण शासन सत्ता मजदूर संघों को सौंप देनी चाहिए। क्रोपोटकिन का मत है उत्पादक संघों और कम्यूनो को शासन में भागीदारी देनी चाहिए। अराजकतावाद में राज्य का सिद्धांत नही होता है।

समाजवाद के अनुसार राज्य की परिभाषा

समाजवादी विचारधारा समष्टि (समाज) प्रधान दर्शन है। इसकारण यह व्यक्ति के स्थान पर समाज को अधिक महत्व देती है। परिणामतः एक समाजवादी राज्य भूमि एवं खानों का राष्ट्रीयकरण करना चाहता है। राज्य का कार्य आर्थिक सुधार पर बल देना, शान्ति एवं व्यवस्था को बनाए रखना, उत्पादन के साधनों का प्रबंधन और शिक्षा का विकास करना है।

राजनीतिक चिंतक हरबर्ट स्पेन्सर ने राज्य के नकारात्मक कार्यों की अवधारणा को प्रतिपादित किया है। यह राज्य को एक ऐसी बुराई मानता है जो जरूरी है। स्पेन्सर विधि (कानून) को पाप और विधायक (कानून बनाने वाला) को पापी समझता है। हरबर्ट स्पेन्सर कि पुस्तकें – मैन वर्सेस स्टेट, सोशल स्टैटिक्स, फर्स्ट प्रिंसिपल, द स्टडी ऑफ सोसियोलॉजी, द प्रॉपर गवर्नमेंट, द प्रिंसिपल ऑफ सोसियोलाजी हैं।

मार्क्सवाद के अनुसार राज्य की परिभाषा

मार्क्सवादी राज्य (राज्य का वर्ग सिद्धांत) के अनुसार मजदूरों का कोई देश (राज्य) नहीं होता है। राज्य एक शोषण का यंत्र है। राज्य का लोप हो जायोगा। राज्य के वर्ग सिद्धांत का समर्थन मार्क्सवादी चिंतक करते है। जिनमें स्वयं कार्ल मार्क्स, एन्जेल्स, लेनिन हैं।
मार्क्स ने कहा, “एक परस्पर विरोधी वर्गीय समाज में राज्य एक राजनीतिक उपकरण है, एक वर्ग के ऊपर दूसरे के शासन बनाए रखने का एक यंत्र मात्र है।” मार्क्स का मानना है “राज्य वर्ग शासन का एक अंग है, एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के दमन का अंग है।”

मार्क्स के राज्य की प्रकृति -राज्य सभी के हित के लिए नहीं है। राज्य बहुतों की कीमत पर कुछ के हितों को बढ़ावा देता है। राज्य बुर्जुआ वर्ग का पारस्परिक बीमा समझौता है।
लेनिन का कथन है कि जब राज्य होगा तो स्वतंत्रता नहीं हो सकती, जब स्वतंत्रता होगी तो राज्य अस्तित्व में नहीं रहेगा।

राष्ट्र-राज्य की परिभाषा

राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पुनर्जागरण, धर्म सुधार एवं वाणिज्यिक क्रांति के सम्मिलित प्रभाव का प्रतिफल है। वैश्विकरण ने राष्ट्र-राज्य की प्रासंगिकता को दुर्बल कर दिया है। किन्तु राष्ट्रवाद की संकल्पना अभी भी राष्ट्र-राज्य की मूल शक्ति के रूप में विद्यमान है।

लोक कल्याणकारी राज्य की परिभाषा

लास्की ऐसा प्रथम आधुनिक राजनीतिक विचारक था जिसने विश्व का ध्यान पुलिस राज्य धारणा से कल्याणकारी राज्य की विचारधारा की ओर आकर्षित किया। कल्याणकारी सिद्धांत राज्य को एक माध्यम मानता है। आधुनिक समय में कल्याणकारी राज्य की संकल्पना इंग्लैंड में प्रकाशित बेवरिज रिपोर्ट में प्रस्तुत की गई। जिसमें समाज की पाँच बड़ी बुराइयों यथा – अज्ञानता, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और आश्रयाभाव को समाप्त करने के लिए राज्य की सकारात्मक भूमिका का समर्थन किया। किन्तु इस रिपोर्ट से पहले टी. एच. ग्रीन के द्वारा समाज की तीन बड़ी बुराईयों यथा – अज्ञानता, गरीबी और नशाखोरी के उन्मूलन पर बल दिया। इस लिए आधुनिक कल्याणकारी राज्य का अग्रदूत ग्रीन को कहा जाता है। जिसने आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य के सिद्धांत का मार्ग प्रशस्त किया।

हॉबमैन ने कहा, “लोक-कल्याणकारी राज्य एक ओर साम्यवाद तथा दूसरी ओर अनियंत्रित व्यक्तिवाद के मध्य समझौता है।” इसे उदारवाद और समाजवाद का मिश्रण, संश्लेषण व स्वर्णिम मध्य मार्ग कहा जाता है।
टी. डब्ल्यू. कांट ने कहा लोक कल्याणकारी राज्य वह है जो अपने नागरिकों को व्यपक समाज सेवा की सुविधा प्रदान करता है।
पेटमेन का मत है कि कल्याणकाकरी राज्य लैंगिक दृष्टि से विभाजनकारी तथा पुरुष सत्तात्मक प्रकृति का है।
भारत में पं. जवाहर लाल नेहरू कल्याणकारी राज्य के समर्थक है।

कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का सैद्धांतिक स्रोत – मिल, ग्रीन, लास्की, ब्रिटिश समाजवादी विचारक और मार्क्स संशोधनवादी है।

कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था करना है।जनसंख्या आधिक्य कल्याणकारी राज्य में बाधक है। जबकि आर्थिक समृद्धि, समाज सेवा अधिनियम, धन का समान वितरण सहायक है।

राज्य का सावयव सिद्धांत (Organic Theory)

इसमें राज्य को शरीर के समान माना जाता है। जैसे मानव शरीर विभिन्न अंगों से मिलकर बना है उसी प्रकार राज्य भी विभिन्न अंगों से बनता है। इसके समर्थक विचारकों में ब्लंशली और हरबर्ट स्पेन्सर है।

परिक्षाओं में पूछे गए अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

राज्य का वर्गीकरण सर्वप्रथम अरस्तु के द्वारा किया गया। अरस्तु के वर्गीकरण के दो आधार हैं। शासक वर्ग की संख्या , शासन करने वालों का उद्देश्य (नैतिकता)
जो राज्य पड़ोसी राज्यों को बिना अपने में मिलाए उन्हें अपने अधिकार में और वश में रखते हैं वे अधिकार राज्य होते हैं।

बेन्थम राज्य के विधि शास्त्रीय सिद्धांत का समर्थक है।
लियो स्ट्रॉस का मत है स्वतंत्रता पर नियंत्रण स्वाभाविक है।
व्यापारिक राज्य के सिद्धांत को रोजक्रांस ने अभिव्यक्त किया है।

नोट – इससे आगे के राज्य के सिद्धांत से संबंधित PYQ आधारित महत्वपूर्ण कथन के नोट्स पढ़ने के लिए राज्य के सिद्धांत से संबंधित महत्वपूर्ण कथन पर क्लिक करें।

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