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उदारवाद और नव-उदारवाद (Liberalism and Neoliberalism)

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उदारवाद और नव-उदारवाद के सिद्धांतों को दर्शाता शैक्षिक चित्र

उदारवाद और नव-उदारवाद (Liberalism and Neoliberalism)

उदारवाद: अर्थ एवं प्रमुख मान्यताएँ

उदारवाद (Liberalism) अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक प्रमुख सिद्धांत है। यह मानता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल शक्ति-संघर्ष, सैन्य प्रतिस्पर्धा और युद्ध तक सीमित नहीं है। राज्यों के बीच सहयोग, व्यापार, लोकतंत्र, अंतरराष्ट्रीय कानून और संस्थाएँ भी वैश्विक राजनीति को प्रभावित करती हैं।

यथार्थवाद (Realism) जहाँ राष्ट्रीय हित, शक्ति और सुरक्षा को प्रमुखता देता है, वहीं उदारवाद यह समझने का प्रयास करता है कि संघर्ष की संभावना के बावजूद राज्य सहयोग कैसे कर सकते हैं। उदारवाद के अनुसार, उचित राजनीतिक संस्थाओं, आर्थिक परस्पर निर्भरता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के माध्यम से युद्ध की संभावना कम की जा सकती है।

उदारवाद एक व्यापक विचारधारा है। इसके प्रमुख रूपों में शास्त्रीय उदारवाद, आदर्शवाद, लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत, जटिल परस्पर निर्भरता और नव-उदारवादी संस्थावाद शामिल हैं। इन सभी का मुख्य जोर समान नहीं है, लेकिन वे विभिन्न परिस्थितियों में सहयोग की संभावनाओं को समझने का प्रयास करते हैं।

उदारवाद का ऐतिहासिक विकास

1. शास्त्रीय उदारवाद

जॉन लॉक (John Locke) ने अपनी पुस्तक Two Treatises of Government में प्राकृतिक अधिकारों, सीमित सरकार और राजनीतिक सहमति पर बल दिया।एडम स्मिथ (Adam Smith) ने The Wealth of Nations (1776) में श्रम-विभाजन, बाजार और आर्थिक गतिविधियों के महत्त्व को स्पष्ट किया। इन विचारों ने उदारवादी अंतरराष्ट्रीय चिंतन की पृष्ठभूमि तैयार की। इस परंपरा के अनुसार, संवैधानिक शासन और व्यापारिक संबंध राज्यों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित कर सकते हैं। हालांकि, व्यापार हमेशा शांति सुनिश्चित नहीं करता; आर्थिक निर्भरता का उपयोग दबाव बनाने के लिए भी किया जा सकता है।

2. इमैनुएल कांट और स्थायी शांति

इमैनुएल कांट (Immanuel Kant) ने 1795 में Perpetual Peace: A Philosophical Sketch प्रकाशित किया। उन्होंने स्थायी शांति के लिए गणतांत्रिक शासन, स्वतंत्र राज्यों के संघ और अंतरराष्ट्रीय नियमों को महत्त्व दिया। कांट के अनुसार, युद्ध के निर्णय पर नागरिकों और राजनीतिक संस्थाओं का प्रभाव युद्ध की संभावना को कम कर सकता है। स्वतंत्र राज्यों के बीच संघ और नियमों पर आधारित संबंध शांति को मजबूत कर सकते हैं। उनका विचार आधुनिक लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थागत सहयोग की एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक पृष्ठभूमि है।

3. प्रथम विश्व युद्ध और आदर्शवाद

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के बाद उदारवादी चिंतन में अंतरराष्ट्रीय कानून, सामूहिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर जोर बढ़ा। अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson) ने युद्धोत्तर शांति-व्यवस्था और राष्ट्रसंघ (League of Nations) का समर्थन किया। राष्ट्रसंघ की स्थापना 1920 में हुई। आदर्शवाद (Idealism) का विश्वास था कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, कानून और सामूहिक सुरक्षा के माध्यम से युद्ध को रोका जा सकता है। लेकिन राष्ट्रसंघ आक्रामक शक्तियों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर सका। द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) ने आदर्शवादी दृष्टिकोण की सीमाएँ उजागर कीं और यथार्थवाद का प्रभाव बढ़ाया।

ध्यान दें कि आदर्शवाद उदारवाद का पर्याय नहीं है। आदर्शवाद मुख्यतः युद्ध रोकने और शांति-व्यवस्था स्थापित करने पर केंद्रित था, जबकि उदारवाद एक व्यापक राजनीतिक एवं सैद्धांतिक परंपरा है।

4. आधुनिक उदारवाद का विकास

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र (1945), अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं और यूरोपीय एकीकरण जैसी प्रक्रियाओं ने सहयोग के नए अवसर प्रस्तुत किए। शीतयुद्ध के दौरान सैन्य प्रतिस्पर्धा जारी रही, लेकिन व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग भी विकसित हुआ। इससे उदारवादी विचारकों के सामने प्रश्न आया कि यदि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई विश्व-सरकार नहीं है, तो राज्य सहयोग कैसे बनाए रखते हैं? इसी प्रश्न ने आगे चलकर नव-उदारवादी संस्थावाद के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उदारवाद के प्रमुख आधुनिक दृष्टिकोण

1. लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत (Democratic Peace Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार, स्थापित उदार लोकतंत्रों के बीच युद्ध की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है। इसकी बौद्धिक पृष्ठभूमि कांट के गणतांत्रिक शांति संबंधी विचारों में मिलती है। इसकी दो प्रमुख व्याख्याएँ हैं।

संस्थागत व्याख्या के अनुसार, चुनाव, विधायिका, जनमत और राजनीतिक जवाबदेही युद्ध के निर्णय को कठिन बनाते हैं। मानकात्मक व्याख्या के अनुसार, लोकतंत्रों में वार्ता, समझौते और शांतिपूर्ण विवाद-समाधान को महत्त्व दिया जाता है।

इस सिद्धांत का अर्थ यह नहीं है कि लोकतांत्रिक देश कभी युद्ध नहीं करते। इसका प्रमुख दावा लोकतंत्रों के बीच पारस्परिक युद्ध की अपेक्षाकृत कम संभावना से संबंधित है। इसकी आलोचना में यह प्रश्न उठाया जाता है कि शांति का कारण लोकतंत्र है या साझा हित, आर्थिक संबंध और रणनीतिक परिस्थितियाँ भी इसमें भूमिका निभाती हैं।

2. जटिल परस्पर निर्भरता (Complex Interdependence)

रॉबर्ट ओ. कीओहाने (Robert O. Keohane) और जोसेफ एस. नाइ (Joseph S. Nye) ने अपनी पुस्तक Power and Interdependence: World Politics in Transition (1977) में जटिल परस्पर निर्भरता की अवधारणा प्रस्तुत की। परस्पर निर्भरता का अर्थ है कि एक देश की नीतियाँ और गतिविधियाँ दूसरे देशों को प्रभावित करती हैं। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यापार, तकनीक, पर्यावरण, स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसे क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए विदेश नीति को केवल सैन्य शक्ति के आधार पर नहीं समझा जा सकता।

जटिल परस्पर निर्भरता की तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं:-

  1. राज्यों और समाजों के बीच अनेक संपर्क-मार्ग होते हैं, जिनमें सरकारी तथा गैर-सरकारी संबंध शामिल हैं।
  2. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दे भी महत्त्वपूर्ण होते हैं; सैन्य सुरक्षा हमेशा प्रत्येक मुद्दे पर सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं होती।
  3. कुछ परिस्थितियों में सैन्य शक्ति समस्याओं के समाधान का सबसे प्रभावी साधन नहीं होती।

आलोचना: परस्पर निर्भरता असमान हो सकती है। जिस देश के पास अधिक आर्थिक विकल्प और संसाधन हों, वह दूसरे देश पर दबाव डाल सकता है। इसलिए परस्पर निर्भरता सहयोग के साथ-साथ शक्ति का साधन भी बन सकती है।

3. उदारवादी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सिद्धांत

एंड्रयू मोरावचिक (Andrew Moravcsik) ने अपने शोधपत्र Taking Preferences Seriously: A Liberal Theory of International Politics (1997) में उदारवादी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का व्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, राज्य की विदेश नीति को समझने के लिए उसके घरेलू समाज, सामाजिक समूहों और राजनीतिक संस्थाओं से उत्पन्न राष्ट्रीय प्राथमिकताओं (National Preferences) का अध्ययन आवश्यक है।

उदाहरण के लिए, किसी देश के निर्यातक उद्योग मुक्त व्यापार का समर्थन कर सकते हैं, जबकि घरेलू उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा की माँग कर सकते हैं। सरकार की व्यापार नीति इन हितों और राजनीतिक प्रक्रियाओं से प्रभावित हो सकती है। इस प्रकार मोरावचिक का दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि राष्ट्रीय हितों को पहले से निश्चित मान लेना पर्याप्त नहीं है। यह भी समझना चाहिए कि वे घरेलू राजनीति में कैसे बनते हैं।

नव-उदारवाद (Neoliberalism): अर्थ एवं विकास

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नव-उदारवाद से सामान्यतः नव-उदारवादी संस्थावाद (Neoliberal Institutionalism) का अर्थ लिया जाता है। यह सिद्धांत बताता है कि अंतरराष्ट्रीय अराजकता (Anarchy) के बावजूद राज्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से सहयोग कैसे कर सकते हैं। यहाँ अराजकता का अर्थ पूर्ण अव्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था है जिसमें राज्यों के ऊपर कोई सर्वोच्च विश्व-सरकार नहीं है।

नव-उदारवादी संस्थावाद यह स्वीकार करता है कि राज्य अपने हितों को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि उनके हित हमेशा परस्पर विरोधी हों। यदि सहयोग से सभी संबंधित राज्यों को लाभ मिल सकता है, तो वे साझा नियम और संस्थाएँ विकसित कर सकते हैं। ऐसी संस्थाएँ सूचना की कमी, अविश्वास और समझौतों के पालन से जुड़ी समस्याओं को कम करने में सहायता करती हैं।

1. रॉबर्ट कीओहाने का योगदान

रॉबर्ट ओ. कीओहाने नव-उदारवादी संस्थावाद के प्रमुख विद्वान हैं। उनकी पुस्तक After Hegemony: Cooperation and Discord in the World Political Economy (1984) इस सिद्धांत की महत्त्वपूर्ण कृति है। कीओहाने ने यह समझाने का प्रयास किया कि किसी एक प्रभुत्वशाली शक्ति (Hegemon) की भूमिका कम होने पर भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग जारी रह सकता है। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ नियमों और प्रक्रियाओं के माध्यम से सहयोग को अधिक स्थिर बना सकती हैं। संस्थाएँ राज्यों के हितों को समाप्त नहीं करतीं, बल्कि उन हितों को प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बनाती हैं। उदाहरण के लिए, व्यापार संबंधी साझा नियम राज्यों को प्रत्येक समझौते की शर्तें नए सिरे से तय करने की आवश्यकता कम कर सकते हैं।

2. नव-उदारवादी संस्थावाद की प्रमुख मान्यताएँ

  1. अंतरराष्ट्रीय अराजकता के बावजूद सहयोग संभव है। विश्व-सरकार का अभाव राज्यों को हर परिस्थिति में संघर्ष के लिए बाध्य नहीं करता।
  2. राज्य अपने हितों का पीछा करते हैं। सहयोग केवल नैतिकता या सद्भावना के कारण नहीं होता, बल्कि पारस्परिक लाभ भी इसका आधार हो सकता है।
  3. संस्थाएँ सहयोग की कठिनाइयाँ कम करती हैं। वे सूचना उपलब्ध कराती हैं, नियम निर्धारित करती हैं, समझौतों की निगरानी करती हैं और विवाद-समाधान के मंच प्रदान करती हैं।
  4. बार-बार होने वाली बातचीत सहयोग को बढ़ा सकती है। यदि राज्य भविष्य में भी एक-दूसरे के साथ संबंध बनाए रखना चाहते हैं, तो वर्तमान समझौतों का पालन करना उनके हित में हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका

नव-उदारवादी संस्थावाद के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ सहयोग के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार करती हैं।

  • सूचना और पारदर्शिता:– संस्थाएँ रिपोर्टिंग, आँकड़ों और नियमित संवाद के माध्यम से राज्यों के व्यवहार के बारे में जानकारी उपलब्ध करा सकती हैं। इससे अनिश्चितता कम होती है।
  • लेन-देन की लागत:– साझा नियम और प्रक्रियाएँ समझौते करने तथा उन्हें लागू करने में लगने वाले समय और संसाधनों को कम कर सकती हैं।
  • निगरानी और अनुपालन:– संस्थाएँ यह जाँचने में सहायता करती हैं कि सदस्य राज्य समझौतों का पालन कर रहे हैं या नहीं।
  • विवाद-समाधान:– संस्थाएँ वार्ता और नियम-आधारित प्रक्रियाओं के माध्यम से विवादों को सुलझाने के अवसर प्रदान करती हैं।
  • दीर्घकालीन सहयोग:– बार-बार होने वाली बातचीत और भविष्य में मिलने वाले लाभ राज्यों को सहयोग बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, विश्व व्यापार संगठन (WTO) व्यापार नियमों और विवाद-निपटान की व्यवस्था प्रदान करता है। इसी प्रकार, जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौता (2015) देशों के बीच जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं और सहयोग का ढाँचा प्रस्तुत करता है। हालाँकि संस्थाएँ सभी विवादों को समाप्त नहीं कर सकतीं। उनकी प्रभावशीलता सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति, संसाधनों और नियमों के पालन पर निर्भर करती है।

नव-यथार्थवाद और नव-उदारवादी संस्थावाद

नव-यथार्थवाद (Neorealism) और नव-उदारवादी संस्थावाद दोनों मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अराजक है और राज्य उसके प्रमुख अभिकर्ता हैं। दोनों के बीच मुख्य अंतर इस बात पर है कि वे सहयोग, संस्थाओं और लाभों को किस प्रकार समझते हैं।

नव-यथार्थवाद

  • प्रमुख चिंता – शक्ति, सुरक्षा और अस्तित्व
  • अराजकता का प्रभाव – आत्म-सहायता और सुरक्षा प्रतिस्पर्धा पर बल
  • संस्थाओं की भूमिका – शक्ति-वितरण और प्रमुख राज्यों के हितों से सीमित
  • लाभ का महत्त्व – सापेक्ष लाभ पर विशेष ध्यान
  • सहयोग की समस्या – दूसरे राज्य की बढ़ती शक्ति से चिंता

नव-उदारवादी संस्थावाद

  • प्रमुख चिंता – सहयोग और संस्थागत व्यवस्थाएँ
  • अराजकता का प्रभाव – अराजकता के भीतर सहयोग की संभावना
  • संस्थाओं की भूमिका – सूचना, नियम और निगरानी के माध्यम से सहयोग आसान बनाना
  • लाभ का महत्त्व – निरपेक्ष लाभ पर विशेष ध्यान
  • सहयोग की समस्या – सहयोग की लागत और अनिश्चितता कम करना

निरपेक्ष लाभ और सापेक्ष लाभ

निरपेक्ष लाभ (Absolute Gains) का अर्थ है कि सहयोग से किसी राज्य को कितना लाभ प्राप्त होता है। सापेक्ष लाभ (Relative Gains) का अर्थ है कि दूसरे राज्य की तुलना में उसकी स्थिति कितनी बेहतर या कमजोर हुई है। उदाहरण के लिए, यदि दो देशों को व्यापार समझौते से क्रमशः 10 और 20 इकाई का लाभ मिलता है, तो दोनों को निरपेक्ष लाभ हुआ। लेकिन पहले देश को चिंता हो सकती है कि दूसरे देश की आर्थिक शक्ति उससे अधिक तेजी से बढ़ रही है।

नव-यथार्थवादी दृष्टिकोण सुरक्षा संबंधी मामलों में इस चिंता को विशेष महत्त्व देता है। नव-उदारवादी संस्थावाद बताता है कि कई परिस्थितियों में राज्य सापेक्ष लाभ की चिंता के बावजूद पारस्परिक लाभ के लिए सहयोग कर सकते हैं। इसे नव-नव बहस (Neo-Neo Debate) कहा जाता है। यह बहस मुख्यतः 1980 के दशक में प्रमुख हुई। इसमें दोनों दृष्टिकोणों की साझा मान्यताओं और संस्थाओं तथा सहयोग के संबंध में उनके मतभेदों पर चर्चा की जाती है।

उदारवाद और नव-उदारवादी संस्थावाद में अंतर

उदारवाद

  • स्वरूप – व्यापक राजनीतिक एवं अंतरराष्ट्रीय संबंध परंपरा
  • प्रमुख विषय – शांति, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, सहयोग और सामाजिक हित
  • मुख्य प्रश्न – सहयोग और शांति किन परिस्थितियों में संभव हैं?
  • घरेलू राजनीति – अनेक उदारवादी दृष्टिकोणों में महत्त्वपूर्ण
  • प्रमुख विद्वान – कांट, मोरावचिक सहित अन्य उदारवादी विचारक

नव-उदारवादी संस्थावाद

  • स्वरूप – विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत
  • प्रमुख विषय – अराजकता में संस्थागत सहयोग
  • मुख्य प्रश्न – संस्थाएँ सहयोग की समस्याओं को कैसे कम करती हैं?
  • घरेलू राजनीति – मुख्य ध्यान संस्थाओं और अंतरराज्यीय सहयोग पर
  • प्रमुख विद्वान – कीओहाने; कीओहाने और नाइ

उदारवाद एक व्यापक परंपरा है, जबकि नव-उदारवादी संस्थावाद उसका एक विशिष्ट आधुनिक दृष्टिकोण है। इसलिए दोनों को एक ही अर्थ में प्रयोग नहीं करना चाहिए।

आर्थिक नव-उदारवाद और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का नव-उदारवाद

आर्थिक नव-उदारवाद (Economic Neoliberalism) और नव-उदारवादी संस्थावाद अलग अवधारणाएँ हैं।

आर्थिक नव-उदारवाद का संबंध बाजार-आधारित नीतियों, निजीकरण, आर्थिक उदारीकरण, प्रतिस्पर्धा और सरकारी विनियमन में कमी से हो सकता है। इसके विपरीत, अंतरराष्ट्रीय संबंधों का नव-उदारवादी संस्थावाद यह समझाता है कि राज्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से सहयोग कैसे कर सकते हैं। किसी देश का बाजार-उन्मुख आर्थिक नीतियाँ अपनाना यह सुनिश्चित नहीं करता कि वह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हमेशा सहयोग करेगा। इसी प्रकार, व्यापक सरकारी विनियमन वाला देश भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से सहयोग कर सकता है।

नोट: अंतरराष्ट्रीय संबंधों की इकाई में नव-उदारवाद पर प्रश्न होने पर रॉबर्ट कीओहाने, जोसेफ नाइ, जटिल परस्पर निर्भरता, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और निरपेक्ष लाभ पर विशेष ध्यान दें।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

1. यथार्थवादी आलोचना

यथार्थवादी विचारकों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ शक्तिशाली राज्यों के हितों और शक्ति-संबंधों से प्रभावित होती हैं। यदि कोई शक्तिशाली राज्य अपने महत्त्वपूर्ण हितों के विरुद्ध नियमों को लागू नहीं करना चाहता, तो संस्था के लिए उसे नियंत्रित करना कठिन हो सकता है। नव-उदारवादी संस्थावाद का उत्तर है कि संस्थाओं को विश्व-सरकार नहीं माना जाता। वे सूचना, निगरानी और वार्ता के माध्यम से सहयोग को आसान बना सकती हैं, भले ही वे सभी राज्यों को बाध्य न कर सकें।

2. सापेक्ष लाभ की समस्या

राज्य केवल यह नहीं देखते कि उन्हें सहयोग से कितना लाभ मिलेगा, बल्कि यह भी देखते हैं कि दूसरा देश उनसे कितना अधिक लाभ प्राप्त करेगा। यह चिंता विशेष रूप से सैन्य तकनीक, रणनीतिक संसाधनों और सुरक्षा प्रतिस्पर्धा में महत्त्वपूर्ण है। इसलिए संस्थाएँ सहयोग की संभावना बढ़ा सकती हैं, लेकिन सुरक्षा संबंधी अविश्वास को हमेशा समाप्त नहीं कर सकतीं।

3. संस्थागत असमानता

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के नियम और निर्णय हमेशा सभी देशों के हितों को समान रूप से पूरा नहीं करते। आर्थिक संसाधनों, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक प्रभाव में अंतर संस्थाओं के परिणामों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए संस्थाओं का मूल्यांकन उनके नियमों के साथ-साथ प्रतिनिधित्व, अनुपालन और वास्तविक परिणामों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

4. आर्थिक असमानता की आलोचना

मार्क्सवादी और आलोचनात्मक राजनीतिक अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण इस प्रश्न पर बल देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग से मिलने वाले लाभों का वितरण किस प्रकार होता है। व्यापार और निवेश से कुल आर्थिक लाभ बढ़ सकता है, लेकिन उससे सभी सामाजिक समूहों और देशों को समान लाभ नहीं मिलता। यह आलोचना बताती है कि सहयोग की व्याख्या के साथ आर्थिक असमानता और शक्ति-संबंधों का अध्ययन भी आवश्यक है।

भारतीय संदर्भ

  • भारत की विदेश नीति को केवल उदारवाद या यथार्थवाद के माध्यम से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इसमें रणनीतिक स्वायत्तता, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और बहुपक्षीय सहयोग सभी महत्त्वपूर्ण हैं।
  • भारत संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाओं में भाग लेता है। इन संस्थाओं के माध्यम से उसे अंतरराष्ट्रीय वार्ता, नियम-निर्माण और साझा समस्याओं पर सहयोग के अवसर मिलते हैं। यह व्यवहार नव-उदारवादी संस्थावाद की उपयोगिता को समझने में सहायता करता है।
  • भारत की रणनीतिक स्वायत्तता यह भी स्पष्ट करती है कि सहयोग का अर्थ किसी एक शक्ति पर निर्भर होना नहीं है। भारत अलग-अलग मुद्दों पर विभिन्न देशों के साथ अपने हितों के अनुसार सहयोग कर सकता है।
  • जलवायु परिवर्तन इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। पेरिस जलवायु समझौता (2015) देशों को जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं और सहयोग का ढाँचा देता है। लेकिन ऐतिहासिक उत्सर्जन, वित्त, तकनीक और विकास की आवश्यकताओं को लेकर देशों के बीच मतभेद बने रहते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि संस्थाएँ सहयोग को बढ़ावा दे सकती हैं, लेकिन हितों के टकराव और असमानताओं को अपने आप समाप्त नहीं कर सकतीं।

परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य

तथ्य / अवधारणा – महत्त्व

  • इमैनुएल कांट — Perpetual Peace (1795) – स्थायी शांति का विचार
  • राष्ट्रसंघ — 1920 – प्रथम विश्व युद्ध के बाद सामूहिक सुरक्षा का प्रयास
  • संयुक्त राष्ट्र — 1945 – युद्धोत्तर बहुपक्षीय व्यवस्था
  • कीओहाने और नाइ — Power and Interdependence (1977) – जटिल परस्पर निर्भरता
  • कीओहाने — After Hegemony (1984) – अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और सहयोग की भूमिका
  • मोरावचिक — Taking Preferences Seriously (1997) – घरेलू समाज और राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ
  • लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत – लोकतंत्रों के बीच युद्ध की अपेक्षाकृत कम संभावना
  • निरपेक्ष लाभ – सहयोग से स्वयं को प्राप्त लाभ
  • सापेक्ष लाभ – दूसरे राज्य की तुलना में लाभ
  • नव-नव बहस – नव-यथार्थवाद और नव-उदारवादी संस्थावाद के बीच बहस

महत्वपूर्ण पुस्तकें –

  • Immanuel Kant — Perpetual Peace: A Philosophical Sketch (1795).
  • Robert O. Keohane and Joseph S. Nye — Power and Interdependence: World Politics in Transition (1977).
  • Robert O. Keohane — After Hegemony: Cooperation and Discord in the World Political Economy (1984).
  • Andrew Moravcsik — “Taking Preferences Seriously: A Liberal Theory of International Politics,” International Organization, 1997
  • Kenneth N. Waltz — Theory of International Politics (1979).
  • Hans J. Morgenthau — Politics Among Nations: The Struggle for Power and Peace.
  • Robert Jackson and Georg Sørensen — Introduction to International Relations: Theories and Approaches.
  • Andrew Heywood — Global Politics.

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