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विकास प्रशासन

विकास प्रशासन एवं कल्याण प्रशासन की अवधारणाओं पर आधारित शैक्षिक फीचर्ड इमेज

विकास प्रशासन एवं कल्याण प्रशासन (Development and Welfare Administration)

विकास प्रशासन: अर्थ एवं अवधारणा

विकास प्रशासन (Development Administration) लोक प्रशासन का वह क्षेत्र है जो नियोजित सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन लाने तथा विकास योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने से संबंधित है। इसका उद्देश्य गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं को कम करना तथा विकास के लिए आवश्यक प्रशासनिक क्षमता विकसित करना है।

विकास प्रशासन के दो प्रमुख पक्ष हैं:

  1. विकास का प्रशासन (Administration of Development): विकास योजनाओं का निर्माण, क्रियान्वयन, समन्वय और मूल्यांकन। उदाहरण के लिए, ग्रामीण रोजगार, सिंचाई, शिक्षा और स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लागू करना।
  2. प्रशासन का विकास (Development of Administration): प्रशासनिक संस्थाओं, कर्मचारियों, प्रक्रियाओं और तकनीकी क्षमताओं में सुधार करना, ताकि वे विकास संबंधी लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से प्राप्त कर सकें।

दोनों पक्ष परस्पर संबंधित हैं। प्रशासनिक क्षमता कमजोर होने पर विकास योजनाएँ प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पातीं। वहीं, विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से प्रशासन में नई तकनीकों, प्रक्रियाओं और कौशल की आवश्यकता पैदा होती है।

ऐतिहासिक विकास

विकास प्रशासन का व्यवस्थित अध्ययन विशेष रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विकसित हुआ। एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों की स्वतंत्रता के बाद प्रशासन के सामने राष्ट्र-निर्माण, आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन और सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार की चुनौतियाँ आईं।
औपनिवेशिक प्रशासन मुख्यतः राजस्व-संग्रह, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक नियंत्रण पर केंद्रित था। स्वतंत्रता के बाद प्रशासन से आर्थिक तथा सामाजिक परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाने की अपेक्षा की गई। इसी आवश्यकता ने विकास प्रशासन को लोक प्रशासन के एक विशिष्ट अध्ययन क्षेत्र के रूप में विकसित किया।

विकास प्रशासन के प्रमुख विद्वान एवं उनके विचार

एडवर्ड वीडनर (Edward Weidner)

  • वीडनर विकास प्रशासन के प्रमुख विद्वानों में से एक थे। उनका लेख Development Administration: A New Focus for Research (1962) इस क्षेत्र के विकास में महत्त्वपूर्ण है।
  • उन्होंने विकास प्रशासन के अध्ययन को विकास लक्ष्यों की प्राप्ति और प्रशासनिक कार्रवाई से जोड़ा। इस दृष्टिकोण में प्रशासन की सफलता केवल नियमों के पालन से नहीं, बल्कि विकास उद्देश्यों की प्राप्ति से भी आँकी जाती है।
  • उदाहरण के लिए, विद्यालयों के निर्माण के साथ यह देखना भी आवश्यक है कि वहाँ शिक्षक उपलब्ध हैं या नहीं और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है या नहीं।

फ्रेड डब्ल्यू. रिग्स (Fred W. Riggs)

  • रिग्स तुलनात्मक लोक प्रशासन के प्रमुख विद्वान थे। उन्होंने प्रशासन और उसके सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक वातावरण के संबंध का अध्ययन किया।
  • विकास प्रशासन के संदर्भ में उनके विचारों से यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक संस्थाओं को स्थानीय सामाजिक संरचना और परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करना चाहिए। एक देश की प्रशासनिक व्यवस्था को दूसरे देश में बिना आवश्यक बदलाव के लागू करना प्रभावी नहीं हो सकता।
  • रिग्स के तुलनात्मक दृष्टिकोण का महत्त्व यह है कि प्रशासनिक विकास को केवल संगठनात्मक सुधार नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में समझा जाए।

जॉन डी. मोंटगोमरी (John D. Montgomery)

मोंटगोमरी से संबंधित विकास प्रशासन की व्याख्या में नियोजित सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को लागू करने पर बल मिलता है। विकास कार्यक्रमों की सफलता के लिए नीति-निर्माण, संसाधन आवंटन और विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय आवश्यक है।

जॉर्ज एफ. गैंट (George F. Gant)

गैंट की पुस्तक Development Administration: Concepts, Goals, Methods विकास प्रशासन के अध्ययन का प्रमुख संदर्भ है। उनके कार्य में विकास के उद्देश्यों, प्रशासनिक पद्धतियों और संस्थागत क्षमता के महत्त्व को समझने में सहायता मिलती है।

इन विद्वानों के विचारों से विकास प्रशासन के तीन प्रमुख आधार सामने आते हैं: विकास लक्ष्य, प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संस्थागत परिवर्तन।

विकास प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ

  • लक्ष्य-उन्मुखता: प्रशासन का उद्देश्य निर्धारित विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना है। सफलता का आकलन केवल प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि परिणामों से भी किया जाता है।
  • परिवर्तन-उन्मुखता: इसका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में सुधार करना है। गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा जैसी समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय प्रशासनिक प्रयास आवश्यक हैं।
  • नियोजन एवं समन्वय: विकास कार्यक्रमों में अनेक विभागों और संस्थाओं की भूमिका होती है। इसलिए उनके बीच समन्वय आवश्यक है।
  • नवाचार एवं अनुकूलनशीलता: प्रशासन को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कार्य-पद्धतियों में सुधार करना चाहिए।
  • जनभागीदारी: ग्राम सभा, पंचायतों और नागरिक संगठनों की भागीदारी से योजनाओं को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा सकता है।
  • मूल्यांकन एवं जवाबदेही: योजनाओं की प्रगति, लाभार्थियों तक पहुँच और वास्तविक परिणामों का मूल्यांकन आवश्यक है।

विकास प्रशासन के उद्देश्य एवं महत्त्व

  • विकास प्रशासन का उद्देश्य आर्थिक विकास के साथ सामाजिक परिस्थितियों में सुधार करना है। इसके प्रमुख उद्देश्य रोजगार के अवसर बढ़ाना, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना, आधारभूत संरचना विकसित करना और क्षेत्रीय तथा सामाजिक असमानताओं को कम करना हैं।
  • आर्थिक वृद्धि और विकास में अंतर समझना आवश्यक है। आर्थिक वृद्धि का संबंध उत्पादन एवं आय में वृद्धि से है, जबकि विकास में जीवन स्तर, शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसरों और सामाजिक न्याय में सुधार भी शामिल है। इसलिए विकास प्रशासन को केवल आर्थिक लक्ष्यों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
  • विकास प्रशासन सरकारी नीतियों को व्यवहार में लागू करने, संसाधनों का उचित उपयोग करने और प्रशासनिक संस्थाओं की क्षमता बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

परंपरागत लोक प्रशासन और विकास प्रशासन में अंतर

परंपरागत लोक प्रशासन

  • प्रमुख उद्देश्य – व्यवस्था, स्थिरता एवं नियमों का पालन
  • कार्यशैली – निर्धारित प्रक्रियाओं पर बल
  • मूल्यांकन – वैधानिकता एवं प्रक्रियाओं की नियमितता
  • नागरिकों से संबंध – प्रशासनिक सेवाओं का नियमित संचालन
  • प्रमुख चुनौती – प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखना

विकास प्रशासन

  • प्रमुख उद्देश्य – नियोजित परिवर्तन एवं विकास
  • कार्यशैली – नवाचार एवं अनुकूलन पर अपेक्षाकृत अधिक बल
  • मूल्यांकन – वैधानिकता के साथ विकास परिणाम
  • नागरिकों से संबंध – भागीदारी एवं विकास आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान
  • प्रमुख चुनौती – विकास लक्ष्यों की प्राप्ति एवं क्षमता निर्माण

यह अंतर पूर्ण नहीं है। विकास प्रशासन में भी नियमों, निष्पक्षता और वैधानिकता का पालन आवश्यक है। इसी प्रकार परंपरागत प्रशासन भी सार्वजनिक हित और प्रभावशीलता से जुड़ा होता है।

कल्याण प्रशासन: अर्थ एवं अवधारणा

कल्याण प्रशासन (Welfare Administration) वह प्रशासनिक व्यवस्था है जिसके माध्यम से राज्य नागरिकों के सामाजिक कल्याण, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी आवश्यकताओं से संबंधित नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू करता है। इसके अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, खाद्य सुरक्षा, वृद्धावस्था सहायता, बाल संरक्षण, महिला कल्याण तथा कमजोर वर्गों के लिए सहायता संबंधी कार्यक्रम आते हैं। कल्याण प्रशासन का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं है। इसमें पात्र लाभार्थियों की पहचान, सेवाओं का वितरण, शिकायत निवारण और योजनाओं की निगरानी भी शामिल है।

उदाहरण के लिए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रशासन का दायित्व केवल खाद्यान्न उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि पात्र परिवारों तक निर्धारित लाभ पहुँचाना और शिकायतों का समाधान करना भी है।

कल्याणकारी राज्य और कल्याण प्रशासन में अंतर

कल्याणकारी राज्य (Welfare State) एक व्यापक राजनीतिक अवधारणा है, जिसमें राज्य नागरिकों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण की जिम्मेदारी स्वीकार करता है। इसके विपरीत, कल्याण प्रशासन वह व्यावहारिक व्यवस्था है जिसके माध्यम से राज्य इस उद्देश्य को योजनाओं, सार्वजनिक सेवाओं और प्रशासनिक संस्थाओं के जरिए लागू करता है। इस प्रकार कल्याणकारी राज्य उद्देश्य और राज्य की भूमिका से संबंधित है, जबकि कल्याण प्रशासन उस उद्देश्य के क्रियान्वयन से संबंधित है।

कल्याण प्रशासन का ऐतिहासिक विकास

कल्याण प्रशासन का विकास राज्य की भूमिका में हुए परिवर्तन से जुड़ा है। प्रारंभिक राज्य व्यवस्थाओं में सुरक्षा, न्याय और कानून-व्यवस्था प्रमुख कार्य थे। जरूरतमंदों की सहायता में परिवार, समुदाय और धार्मिक संस्थाओं की भी भूमिका थी। हालाँकि, विभिन्न ऐतिहासिक समाजों में राज्य द्वारा राहत और जनकल्याण के कार्य भी किए जाते थे।

औद्योगीकरण के बाद गरीबी, बेरोजगारी, श्रमिकों की असुरक्षा और शहरी समस्याएँ बढ़ीं। इससे यह प्रश्न उठा कि नागरिकों के सामाजिक कल्याण की जिम्मेदारी केवल व्यक्ति और बाजार पर छोड़ी जा सकती है या राज्य को भी हस्तक्षेप करना चाहिए। बाद में सामाजिक उदारवाद और सामाजिक लोकतंत्र ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के विस्तार को समर्थन दिया। जॉन मेनार्ड कीन्स के आर्थिक विचारों ने आर्थिक मंदी और बेरोजगारी की परिस्थितियों में राज्य की सक्रिय आर्थिक भूमिका को समझने में योगदान दिया। हालाँकि, कल्याणकारी राज्य का विकास किसी एक विचारक के कारण नहीं हुआ; इसमें सामाजिक आंदोलनों, लोकतांत्रिक राजनीति और आर्थिक परिस्थितियों की भी भूमिका थी।

समकालीन कल्याण प्रशासन में सामाजिक सुरक्षा के साथ मानव विकास, समान अवसर, अधिकार-आधारित सेवाएँ और प्रशासनिक जवाबदेही भी महत्त्वपूर्ण हैं।
मानव विकास दृष्टिकोण महबूब-उल-हक और अमर्त्य सेन के कार्यों ने विकास को केवल आय या उत्पादन की वृद्धि के बजाय मानव क्षमताओं और अवसरों के विस्तार से जोड़ने में योगदान दिया।

अमर्त्य सेन की पुस्तक Development as Freedom में विकास को वास्तविक स्वतंत्रताओं और क्षमताओं के विस्तार के संदर्भ में समझाया गया है। इस दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक अवसरों तक पहुँच विकास के महत्त्वपूर्ण आयाम हैं। UNDP की पहली Human Development Report 1990 में प्रकाशित हुई। मानव विकास दृष्टिकोण ने विकास के मूल्यांकन में जीवन की गुणवत्ता को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया।

कल्याण प्रशासन के उद्देश्य एवं विशेषताएँ

कल्याण प्रशासन के प्रमुख उद्देश्य हैं:-

  • बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति: शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और खाद्य सुरक्षा जैसी सेवाओं तक पहुँच।
  • सामाजिक न्याय: वंचित समूहों की समस्याओं को दूर करना और अवसरों की असमानता कम करना।
  • सामाजिक सुरक्षा: वृद्धावस्था, बीमारी, बेरोजगारी और दिव्यांगता जैसी परिस्थितियों में सहायता।
  • समावेशन: यह सुनिश्चित करना कि पात्र नागरिक सामाजिक या आर्थिक कारणों से सेवाओं से वंचित न रहें।
  • जवाबदेही: लाभार्थियों की पहचान, लाभ वितरण और शिकायत निवारण में पारदर्शिता बनाए रखना।

कल्याण प्रशासन की सफलता केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। यह भी देखना आवश्यक है कि सहायता सही व्यक्तियों तक पहुँची या नहीं और उनके जीवन में वास्तविक सुधार हुआ या नहीं।

भारत में विकास प्रशासन का विकास

स्वतंत्रता के बाद नियोजित विकास

1947 के बाद भारत ने राष्ट्र-निर्माण, आर्थिक विकास, ग्रामीण पुनर्निर्माण और सामाजिक न्याय को प्रमुख उद्देश्य बनाया। इसके लिए नियोजन, कृषि विकास, औद्योगीकरण तथा सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार में प्रशासन की भूमिका बढ़ी।

सामुदायिक विकास कार्यक्रम, 1952

भारत में सामुदायिक विकास कार्यक्रम (Community Development Programme) 2 अक्टूबर 1952 को प्रारंभ हुआ। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और आधारभूत सुविधाओं में सुधार करना था। इस कार्यक्रम में सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय विकास पर बल दिया गया। इसके अनुभवों से यह आवश्यकता सामने आई कि ग्रामीण विकास में स्थानीय संस्थाओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका बढ़ाई जाए।

बलवंत राय मेहता समिति, 1957

1957 में बलवंत राय मेहता के नेतृत्व वाले अध्ययन दल ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय विस्तार सेवा की समीक्षा की। समिति ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण तथा पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से ग्रामीण विकास में जनभागीदारी बढ़ाने पर बल दिया। इस विचार का आधार था कि स्थानीय लोग अपनी समस्याओं और आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। इसलिए विकास संबंधी निर्णयों में उनकी भागीदारी आवश्यक है।

पंचायती राज का संवैधानिक विकास

73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने से संबंधित है। इसके प्रावधान 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुए। इससे ग्रामीण स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक आधार मिला। हालाँकि, पंचायतों की वास्तविक प्रभावशीलता राज्य सरकारों द्वारा अधिकार, वित्तीय संसाधन और कर्मचारी उपलब्ध कराने पर भी निर्भर करती है। समय के साथ भारत में विकास प्रशासन का क्षेत्र ग्रामीण विकास से आगे बढ़कर रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण और डिजिटल सेवा वितरण तक विस्तृत हुआ।

भारतीय संविधान और कल्याण प्रशासन

भारतीय संविधान सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। प्रस्तावना, मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं। राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक दिए गए हैं। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन देश के शासन में मूलभूत हैं।

अनुच्छेद – प्रमुख प्रावधान

  • अनुच्छेद 38 – सामाजिक व्यवस्था में न्याय तथा असमानताओं को कम करना
  • अनुच्छेद 39 – आजीविका के साधन, संसाधनों का सामान्य हित में वितरण, समान कार्य के लिए समान वेतन और श्रमिकों-बच्चों का संरक्षण
  • अनुच्छेद 41 – राज्य की आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर काम, शिक्षा तथा कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक सहायता
  • अनुच्छेद 46 – अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को बढ़ावा देना
  • अनुच्छेद 47 – पोषण स्तर, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार

मौलिक अधिकार भी कल्याण प्रशासन को दिशा देते हैं। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता से संबंधित है और अनुच्छेद 21A छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। इस प्रकार भारतीय प्रशासन को कल्याणकारी योजनाएँ लागू करते समय संवैधानिक मूल्यों, समानता और विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

भारत में विकास एवं कल्याण प्रशासन के प्रमुख उदाहरण

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA): यह ग्रामीण परिवारों को निर्धारित शर्तों के अंतर्गत मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी प्रदान करता है। इसके क्रियान्वयन में ग्राम पंचायतों, कार्य आवंटन, मजदूरी भुगतान और सामाजिक अंकेक्षण की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। यह आजीविका सुरक्षा और ग्रामीण परिसंपत्तियों के निर्माण से जुड़ा है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (NFSA): इसका उद्देश्य पात्र परिवारों को निर्धारित खाद्यान्न अधिकार उपलब्ध कराना है। लाभार्थियों की पहचान, वितरण व्यवस्था और शिकायत निवारण इसके प्रमुख प्रशासनिक पक्ष हैं।
  • पंचायती राज संस्थाएँ: ग्राम पंचायत और अन्य पंचायत संस्थाएँ स्थानीय विकास योजनाओं, आवश्यकताओं की पहचान और जनभागीदारी में योगदान देती हैं।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पोषण कार्यक्रम: स्वास्थ्य सेवाएँ, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा पोषण कार्यक्रम कल्याण प्रशासन के उदाहरण हैं। इनके संचालन में विभिन्न विभागों और स्थानीय कर्मचारियों के बीच समन्वय आवश्यक है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि एक ही कार्यक्रम विकास और कल्याण दोनों उद्देश्यों की पूर्ति कर सकता है।

विकास एवं कल्याण प्रशासन की प्रमुख समस्याएँ

प्रशासनिक क्षमता की कमी

पर्याप्त कर्मचारी, प्रशिक्षण, वित्तीय संसाधन और तकनीकी सुविधाएँ उपलब्ध न होने पर योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित होता है। विभागों के बीच समन्वय की कमी भी परिणामों को कमजोर कर सकती है।

भ्रष्टाचार और कमजोर जवाबदेही

संसाधनों का दुरुपयोग, अपारदर्शी लाभार्थी चयन और कमजोर निगरानी विकास एवं कल्याण प्रशासन की प्रमुख समस्याएँ हैं। पारदर्शिता, सामाजिक अंकेक्षण और प्रभावी शिकायत निवारण इनके समाधान में सहायक हो सकते हैं।

सामाजिक बहिष्करण

दूरस्थ क्षेत्रों के निवासी, दिव्यांगजन और दस्तावेजों की कमी से प्रभावित परिवार सेवाओं तक पहुँचने में कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं। इसलिए योजनाओं की उपलब्धता के साथ उनकी वास्तविक पहुँच का मूल्यांकन भी आवश्यक है।

लक्ष्य और परिणाम में अंतर

योजना पर खर्च की गई राशि या लाभार्थियों की संख्या वास्तविक सफलता का पूरा प्रमाण नहीं है। शिक्षा में नामांकन के साथ सीखने के स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं में भवनों के साथ कर्मचारियों एवं उपचार की उपलब्धता का मूल्यांकन भी आवश्यक है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

विकास प्रशासन ने लोक प्रशासन को सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन, नियोजन और प्रशासनिक क्षमता से जोड़ा। लेकिन यदि विकास को केवल आर्थिक वृद्धि या सरकारी लक्ष्यों की प्राप्ति तक सीमित कर दिया जाए, तो सामाजिक न्याय और नागरिक भागीदारी की उपेक्षा हो सकती है। इसी प्रकार कल्याण प्रशासन सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी सेवाएँ उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता पर्याप्त संसाधनों, सही लाभार्थी चयन और प्रशासनिक जवाबदेही पर निर्भर करती है। लक्षित योजनाओं में पात्र व्यक्तियों के छूट जाने का जोखिम होता है, जबकि व्यापक योजनाओं के लिए अधिक वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए दोनों का मूल्यांकन दक्षता, समानता, वैधानिकता, पारदर्शिता और वास्तविक सामाजिक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

विकास प्रशासन नियोजित सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन और प्रशासनिक क्षमता के विकास पर केंद्रित है, जबकि कल्याण प्रशासन नागरिकों की बुनियादी आवश्यकताओं, सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों के कल्याण से संबंधित है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। भारत में इनका संबंध नियोजित विकास, सामुदायिक विकास कार्यक्रम, पंचायती राज और संविधान के नीति-निदेशक तत्त्वों से है। इनकी सफलता के लिए पर्याप्त संसाधन, प्रभावी क्रियान्वयन, जनभागीदारी और जवाबदेही आवश्यक हैं। प्रशासन की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब योजनाओं से नागरिकों के जीवन में ठोस सुधार हो।

परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • विकास प्रशासन – विकास का प्रशासन + प्रशासन का विकास
  • एडवर्ड वीडनर – Development Administration: A New Focus for Research (1962)
  • फ्रेड डब्ल्यू. रिग्स – तुलनात्मक लोक प्रशासन; प्रशासन और पर्यावरण का संबंध
  • जॉर्ज एफ. गैंट – Development Administration: Concepts, Goals, Methods
  • सामुदायिक विकास कार्यक्रम – 2 अक्टूबर 1952
  • बलवंत राय मेहता समिति – 1957; लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण
  • 73वाँ संविधान संशोधन – 1992; प्रभावी तिथि 24 अप्रैल 1993
  • मानव विकास रिपोर्ट – UNDP की पहली रिपोर्ट, 1990
  • अनुच्छेद 38 – सामाजिक न्याय और असमानताओं में कमी
  • अनुच्छेद 39 – आजीविका, संसाधन वितरण, समान वेतन
  • अनुच्छेद 41 – काम, शिक्षा एवं सार्वजनिक सहायता संबंधी नीति-निर्देश
  • अनुच्छेद 46 – कमजोर वर्गों के शैक्षिक एवं आर्थिक हित
  • अनुच्छेद 47 – पोषण एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य

पुस्तकें –

  • Edward Weidner — “Development Administration: A New Focus for Research” (1962).
  • Fred W. Riggs — Approaches to Development: Politics, Administration, and Change में प्रशासनिक विकास संबंधी अध्याय।
  • George F. Gant — Development Administration: Concepts, Goals, Methods.
  • Amartya Sen — Development as Freedom.

इन्हें भी पढ़े –

नवीन लोक प्रशासन का विकास (Evolution of New Public Administration)

नवीन लोक प्रबंधन का विकास (Evolution of New Public Management)

लोक प्रशासन के शास्त्रीय सिद्धांत: हेनरी फेयोल, लूथर गुलिक और मैरी पार्कर फॉलेट

वैज्ञानिक प्रबंधन का सिद्धांत

नौकरशाही का सिद्धांत: मैक्स वेबर

पारिस्थितिकी का सिद्धांत (Ecological Theory of Public Administration) — एफ. डब्ल्यू. रिग्स

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