नवीन लोक प्रबंधन का विकास (Evolution of New Public Management)
अर्थ एवं अवधारणा
नवीन लोक प्रबंधन (New Public Management—NPM) लोक प्रशासन का एक ऐसा दृष्टिकोण है, जिसमें सरकारी संस्थाओं को अधिक कुशल, परिणामोन्मुख, उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाने पर जोर दिया जाता है। इसके अंतर्गत निजी क्षेत्र की उपयोगी प्रबंधन तकनीकों, प्रतिस्पर्धा, प्रदर्शन मूल्यांकन, वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का प्रयोग किया जाता है। परंपरागत लोक प्रशासन में नियमों, पदसोपान और प्रक्रियाओं के पालन पर अधिक जोर था। NPM ने इनके साथ यह प्रश्न भी जोड़ा कि प्रशासन ने निर्धारित संसाधनों से क्या परिणाम प्राप्त किए।
- उदाहरण के लिए, किसी सरकारी अस्पताल का मूल्यांकन केवल उसके बजट खर्च के आधार पर नहीं, बल्कि उपचार की गुणवत्ता, मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं और सेवा की समयबद्धता के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
- प्रमुख विद्वान: Christopher Hood ने अपने प्रसिद्ध लेख A Public Management for All Seasons? (1991) में NPM की प्रमुख विशेषताओं को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया।
- ध्यान रहे कि NPM कोई एक सर्वमान्य सिद्धांत नहीं, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबंधन और प्रशासनिक सुधारों से संबंधित विचारों एवं पद्धतियों का समूह है।
नवीन लोक प्रबंधन के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
NPM का विकास विभिन्न प्रशासनिक और आर्थिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप हुआ। इसके प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं।
1. परंपरागत लोक प्रशासन की सीमाएँ
मैक्स वेबर (Max Weber) ने नौकरशाही के वैधानिक-तार्किक मॉडल (Legal-Rational Bureaucracy) की व्याख्या की। इसमें स्पष्ट अधिकार-क्षेत्र, पदसोपान, लिखित नियम, योग्यता-आधारित नियुक्ति और निष्पक्षता प्रमुख थे। इस मॉडल ने आधुनिक प्रशासन में स्थिरता और वैधानिकता स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन अत्यधिक नियमबद्धता से निर्णयों में देरी, कठोरता और नागरिकों की आवश्यकताओं के प्रति कम संवेदनशीलता जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती थीं। इन सीमाओं ने प्रशासनिक कार्यकुशलता सुधारने की आवश्यकता को बढ़ाया।
2. व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Behavioural Approach)
हर्बर्ट साइमन (Herbert A. Simon) की पुस्तक Administrative Behavior (1947) ने प्रशासनिक निर्णय-प्रक्रिया और संगठनात्मक व्यवहार के अध्ययन को नई दिशा दी। साइमन ने प्रशासनिक निर्णयों को समझने में सीमित विवेकशीलता (Bounded Rationality) की भूमिका स्पष्ट की। उनका कार्य सीधे NPM का सिद्धांत नहीं था, लेकिन इससे प्रशासन को केवल नियमों और औपचारिक संरचनाओं के आधार पर देखने के बजाय वास्तविक निर्णयों तथा संगठनात्मक व्यवहार के आधार पर समझने को प्रोत्साहन मिला।
3. नवीन लोक प्रशासन (New Public Administration)
1968 का मिनोब्रुक सम्मेलन (Minnowbrook Conference) नवीन लोक प्रशासन के विकास में महत्त्वपूर्ण था। ड्वाइट वाल्डो (Dwight Waldo) इस बौद्धिक परंपरा से जुड़े प्रमुख विद्वानों में थे। NPA ने प्रशासनिक दक्षता के साथ सामाजिक समानता (Social Equity), नागरिकों की आवश्यकताओं और सामाजिक परिवर्तन पर जोर दिया। इसके विपरीत, NPM ने मुख्यतः प्रदर्शन, प्रबंधकीय स्वतंत्रता और संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया।
4. 1970 के दशक का आर्थिक संकट
1970 के दशक में अनेक विकसित देशों को मुद्रास्फीति, धीमी आर्थिक वृद्धि और सार्वजनिक व्यय के बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ा। इससे सरकारी खर्च की उपयोगिता और प्रशासनिक कार्यकुशलता पर प्रश्न उठे। यह धारणा मजबूत हुई कि सरकारी संस्थाओं का मूल्यांकन केवल उनके खर्च या प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि उनके परिणामों से भी किया जाना चाहिए। इस परिस्थिति ने वित्तीय अनुशासन, प्रदर्शन मूल्यांकन और बाजार-आधारित प्रशासनिक सुधारों को प्रोत्साहित किया।
5. 1980 का दशक: NPM का उदय
1980 का दशक NPM के विकास का निर्णायक चरण था। ब्रिटेन, अमेरिका, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में सरकारी संस्थाओं के पुनर्गठन, लागत नियंत्रण, प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन-आधारित प्रबंधन पर जोर दिया गया।
ब्रिटेन:
मार्गरेट थैचर के नेतृत्व में सरकारी व्यय और प्रशासनिक कार्यकुशलता पर ध्यान दिया गया। 1988 की Next Steps पहल ने कार्यकारी एजेंसियों के विकास को बढ़ावा दिया।
अमेरिका:
रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में सरकारी व्यय, नियमन और निजी क्षेत्र की भूमिका पर बहस बढ़ी।
न्यूजीलैंड:
State Sector Act, 1988 तथा Public Finance Act, 1989 ने प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए।
ऑस्ट्रेलिया:
सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबंधन, वित्तीय जवाबदेही और प्रदर्शन सुधार से संबंधित कदम उठाए गए।
इन देशों ने एक जैसा मॉडल नहीं अपनाया, लेकिन इनके सुधारों में परिणामोन्मुख प्रबंधन और प्रशासनिक दक्षता पर समान जोर दिखाई देता है।
6. 1990 का दशक: NPM का विस्तार
1990 के दशक में NPM को अकादमिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिली। Christopher Hood के 1991 के लेख A Public Management for All Seasons? ने इसकी विशेषताओं को व्यवस्थित रूप से स्पष्ट किया।
1992 में David Osborne और Ted Gaebler की पुस्तक Reinventing Government ने सरकार को अधिक उद्यमशील, नवाचारी और परिणामोन्मुख बनाने के विचार को लोकप्रिय बनाया।
इस प्रकार NPM प्रशासनिक सुधारों का एक व्यापक दृष्टिकोण बन गया, लेकिन विभिन्न देशों में इसका स्वरूप उनकी राजनीतिक, आर्थिक और संस्थागत परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रहा।
नवीन लोक प्रबंधन के प्रमुख बौद्धिक आधार
NPM किसी एक विचारधारा से विकसित नहीं हुआ। इसके प्रमुख आधार अर्थशास्त्र, संगठन सिद्धांत और प्रबंधन विज्ञान से संबंधित हैं।
1. नव-उदारवाद (Neoliberalism)
नव-उदारवाद बाजार, प्रतिस्पर्धा, निजी उद्यम और आर्थिक गतिविधियों में राज्य की भूमिका की सीमाओं पर जोर देता है। इसके प्रभाव में सार्वजनिक सेवाओं में निजी भागीदारी, निजीकरण और प्रतिस्पर्धा जैसे उपायों को प्रोत्साहन मिला। हालाँकि नव-उदारवाद एक व्यापक राजनीतिक-आर्थिक विचारधारा है, जबकि NPM सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबंधन से संबंधित दृष्टिकोण है। दोनों संबंधित हैं, लेकिन समान नहीं हैं।
2. लोक विकल्प सिद्धांत (Public Choice Theory)
James M. Buchanan और Gordon Tullock जैसे विद्वानों ने राजनीतिक तथा प्रशासनिक व्यवहार का आर्थिक विश्लेषण किया। इस दृष्टिकोण के अनुसार, सार्वजनिक अधिकारियों और संस्थाओं के व्यवहार को समझते समय व्यक्तिगत हितों, प्रोत्साहनों और संस्थागत नियमों की भूमिका पर भी ध्यान देना चाहिए।
इस सिद्धांत से NPM में प्रतिस्पर्धा, स्पष्ट जवाबदेही और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों को बौद्धिक आधार मिला।
3. प्रबंधकीयतावाद (Managerialism)
प्रबंधकीयतावाद स्पष्ट लक्ष्यों, पेशेवर नेतृत्व, संसाधनों के उचित उपयोग और प्रदर्शन मूल्यांकन को महत्त्व देता है। इसके अनुसार, प्रशासनिक अधिकारियों को लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पर्याप्त निर्णयात्मक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन उनके परिणामों की जवाबदेही भी निर्धारित होनी चाहिए।
4. प्रधान-अभिकर्ता सिद्धांत (Principal-Agent Theory)
इस सिद्धांत में प्रधान (Principal) किसी अभिकर्ता (Agent) को अपनी ओर से कार्य करने की जिम्मेदारी देता है। सार्वजनिक प्रशासन में निर्वाचित प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के संबंध को इस दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। जब प्रधान को अभिकर्ता के कार्यों की पूरी जानकारी नहीं मिलती, तो सूचना विषमता (Information Asymmetry) की समस्या उत्पन्न होती है। स्पष्ट लक्ष्य, प्रदर्शन रिपोर्ट और निगरानी इस समस्या को कम करने के उपाय हैं।
5. निजी क्षेत्र की प्रबंधन तकनीकें
NPM ने रणनीतिक नियोजन, वित्तीय अनुशासन, गुणवत्ता प्रबंधन, मानव संसाधन प्रबंधन और प्रदर्शन मूल्यांकन जैसी तकनीकों को सरकारी संस्थाओं में अपनाने पर जोर दिया। लेकिन सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उद्देश्य अलग हैं। निजी कंपनियाँ लाभ को प्राथमिकता दे सकती हैं, जबकि सरकार को सामाजिक न्याय, समानता, वैधानिकता और नागरिक अधिकारों की रक्षा भी करनी होती है।
Christopher Hood के अनुसार NPM की सात विशेषताएँ
Christopher Hood ने 1991 के अपने लेख A Public Management for All Seasons? में NPM की सात प्रमुख विशेषताओं की पहचान की।
- पेशेवर प्रबंधन (Hands-on Professional Management) – अधिकारियों को सक्रिय प्रबंधकीय भूमिका और निर्णय लेने की स्वतंत्रता देना, ताकि वे परिणामों के लिए जिम्मेदार हो सकें।
- स्पष्ट प्रदर्शन मानक (Explicit Standards of Performance) – प्रशासनिक लक्ष्यों को स्पष्ट करना तथा समय, लागत और सेवा की गुणवत्ता जैसे संकेतकों से प्रदर्शन मापना।
- आउटपुट पर नियंत्रण (Output Control) – केवल नियमों और खर्च की जाँच करने के बजाय प्राप्त सेवाओं तथा परिणामों पर ध्यान देना।
- संगठनात्मक इकाइयों का विभाजन (Disaggregation) – बड़े विभागों के कार्यों को स्पष्ट जिम्मेदारियों वाली छोटी या अपेक्षाकृत स्वायत्त एजेंसियों में बाँटना।
- प्रतिस्पर्धा (Competition) – उपयुक्त परिस्थितियों में सार्वजनिक और निजी सेवा-प्रदाताओं के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना।
- निजी क्षेत्र की प्रबंधन पद्धतियाँ (Private-Sector Management Styles) – सरकारी संस्थाओं में लक्ष्य निर्धारण, गुणवत्ता प्रबंधन और प्रदर्शन समीक्षा जैसी तकनीकों का उपयोग करना।
- संसाधनों में अनुशासन (Discipline and Parsimony) – सार्वजनिक धन का विवेकपूर्ण उपयोग करना और अनावश्यक खर्च कम करना।
नोट: आउटपुट (Output) किसी कार्यक्रम से सीधे प्राप्त सेवा या उत्पाद है, जबकि आउटकम (Outcome) उस कार्यक्रम से उत्पन्न वास्तविक परिवर्तन है। उदाहरणतः आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों की संख्या आउटपुट है, जबकि उससे कौशल या रोजगार में हुआ सुधार आउटकम है।
NPM की तुलना अन्य प्रशासनिक दृष्टिकोणों से
परंपरागत लोक प्रशासन
- मुख्य जोर – नियम और प्रक्रिया
- संगठन – पदसोपान और केंद्रीकरण
- प्रबंधन – नियमों का अनुपालन
- जवाबदेही – कानूनी और प्रक्रियात्मक
- प्रतिस्पर्धा – सीमित भूमिका
NPM
- मुख्य जोर – परिणाम और प्रदर्शन
- संगठन – विकेंद्रीकरण और स्वायत्त इकाइयाँ
- प्रबंधन – पेशेवर प्रबंधन
- जवाबदेही – प्रदर्शन और परिणामों पर अतिरिक्त जोर
- प्रतिस्पर्धा – चयनित क्षेत्रों में प्रोत्साहन
ये आदर्श प्रकार हैं। वास्तविक प्रशासन में नियमों का पालन और परिणामोन्मुख प्रबंधन दोनों आवश्यक हैं।
NPM और NPA में अंतर:
नवीन लोक प्रशासन (NPA) सामाजिक समानता, प्रशासन की प्रासंगिकता और सामाजिक परिवर्तन पर जोर देता है। NPM का मुख्य ध्यान दक्षता, प्रदर्शन और प्रबंधकीय सुधारों पर है।
NPM और सुशासन (Good Governance) में अंतर:
सुशासन में पारदर्शिता, सहभागिता, कानून का शासन, समावेशिता और जवाबदेही भी शामिल हैं। इसलिए NPM को सुशासन का पर्याय नहीं माना जा सकता।
NPM की आलोचनाएँ
1. दक्षता और सामाजिक समानता के बीच तनाव
लागत कम करने के प्रयासों से कभी-कभी गरीब और दूरदराज के नागरिकों की सेवाओं तक पहुँच प्रभावित हो सकती है। इसलिए प्रशासन का मूल्यांकन केवल लागत से नहीं, बल्कि समानता और सेवा की गुणवत्ता से भी होना चाहिए।
2. नागरिक को ग्राहक मानने की सीमा
ग्राहक सेवा की गुणवत्ता और संतुष्टि पर जोर देता है, लेकिन नागरिक के अधिकार, लोकतांत्रिक भागीदारी और समान व्यवहार भी महत्त्वपूर्ण हैं। सरकारी सेवाओं का उद्देश्य केवल ग्राहक संतुष्टि तक सीमित नहीं हो सकता।
3. संस्थागत विखंडन
विभागों को छोटी एजेंसियों में बाँटने से जिम्मेदारी स्पष्ट हो सकती है, लेकिन अत्यधिक विभाजन समन्वय को कमजोर कर सकता है।
Patrick Dunleavy, Helen Margetts, Simon Bastow और Jane Tinkler ने 2006 के लेख New Public Management Is Dead—Long Live Digital-Era Governance में NPM की सीमाओं की चर्चा करते हुए पुनः एकीकरण, समग्र सेवा-प्रदान और डिजिटल तकनीक के महत्त्व को रेखांकित किया।
4. प्रदर्शन मापन की सीमा
मात्रात्मक लक्ष्य कभी-कभी वास्तविक गुणवत्ता को पूरी तरह व्यक्त नहीं करते। यदि अधिकारी का मूल्यांकन केवल निस्तारित शिकायतों की संख्या से हो, तो वह गुणवत्ता के बजाय संख्या पर अधिक ध्यान दे सकता है। इसलिए मात्रात्मक संकेतकों के साथ गुणात्मक मूल्यांकन भी आवश्यक है।
5. बाजार और निजीकरण की सीमाएँ
हर सार्वजनिक सेवा प्रतिस्पर्धा के लिए उपयुक्त नहीं होती। जहाँ पर्याप्त सेवा-प्रदाता नहीं हैं या सार्वभौमिक पहुँच आवश्यक है, वहाँ बाजार-आधारित व्यवस्था सीमित परिणाम दे सकती है। प्रभावी नियमन और सार्वजनिक जवाबदेही आवश्यक हैं।
6. लोकतांत्रिक जवाबदेही
प्रबंधकीय स्वतंत्रता के साथ अधिकारियों की कानूनी, राजनीतिक और सार्वजनिक जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होती है। प्रशासनिक दक्षता संवैधानिक मूल्यों का विकल्प नहीं है।
NPM के बाद का विकास
1. पोस्ट-NPM (Post-NPM)
Post-NPM उन सुधारों और विचारों को व्यक्त करता है जिनमें NPM से उत्पन्न समस्याओं, विशेषकर विभागीय विखंडन और समन्वय की कमी, को दूर करने का प्रयास किया गया।
OECD की 2010 की रिपोर्ट Public Administration after “New Public Management” में NPM के बाद प्रशासनिक सुधारों, समन्वय और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की गई है।
2. डिजिटल-युग शासन (Digital-Era Governance)
Dunleavy और उनके सहलेखकों से संबंधित इस दृष्टिकोण में तीन प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं: सरकारी कार्यों का पुनः एकीकरण, नागरिकों की जरूरतों के अनुसार समग्र सेवा-प्रदान और डिजिटल तकनीक का उपयोग।
ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल अभिलेख और सेवाओं की स्थिति की निगरानी इसके उदाहरण हैं। हालाँकि डिजिटल प्रशासन में डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और डिजिटल विभाजन की समस्याओं का समाधान भी आवश्यक है।
भारतीय प्रशासन में NPM की प्रासंगिकता
भारत में NPM से मिलते-जुलते सुधारों को आर्थिक उदारीकरण, नागरिक-केंद्रित सेवाओं, ई-गवर्नेंस और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के संदर्भ में समझा जा सकता है। हालाँकि इन सभी सुधारों को केवल NPM का परिणाम मानना सही नहीं होगा।
आर्थिक उदारीकरण, 1991:
उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र की भूमिका, सार्वजनिक उपक्रमों की कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धा पर बहस बढ़ी। इसका संबंध NPM के बाजारोन्मुख दृष्टिकोण से है।
नागरिक चार्टर (Citizen’s Charter):
सरकारी सेवाओं के मानकों, समय-सीमा और शिकायत निवारण की जानकारी देकर सेवा की गुणवत्ता तथा जवाबदेही सुधारने का प्रयास।
ई-गवर्नेंस (E-Governance):
ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल प्रमाणपत्र और सेवा-स्थिति की निगरानी से प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने का प्रयास।
सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP):
सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए सरकार और निजी क्षेत्र की क्षमताओं का उपयोग। इसकी सफलता उचित अनुबंध, पारदर्शिता और प्रभावी नियमन पर निर्भर करती है।
भारतीय संदर्भ में इन सुधारों का मूल्यांकन संविधान के मूल्यों, समानता, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारियों के आधार पर भी किया जाना चाहिए। केवल लागत घटाना या सेवा की गति बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; यह भी आवश्यक है कि पात्र नागरिकों तक सेवाएँ पहुँचें।
निष्कर्ष
NPM का विकास 1970 के दशक के आर्थिक दबावों और 1980 के दशक के प्रशासनिक सुधारों की पृष्ठभूमि में हुआ। Christopher Hood ने 1991 में इसकी सात प्रमुख विशेषताओं को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया। NPM ने प्रशासन में दक्षता, प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा, प्रबंधकीय स्वतंत्रता और वित्तीय अनुशासन को महत्त्व दिया। इसकी आलोचनाओं ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक दक्षता के साथ सामाजिक समानता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और संस्थागत समन्वय भी आवश्यक हैं। इसी संदर्भ में Post-NPM और Digital-Era Governance जैसे दृष्टिकोण सामने आए। समकालीन लोक प्रशासन में चुनौती इन सभी उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित करना है।
महत्वपूर्ण पुस्तकें –
- Christopher Hood, — “A Public Management for All Seasons?” — Public Administration, 1991,
- Patrick Dunleavy, — “New Public Management Is Dead—Long Live Digital-Era Governance” — Journal of Public Administration Research and Theory, 2006,
- OECD — Public Administration after “New Public Management”, 2010.
- David and Ted Gaebler Osborne, — Reinventing Government, 1992.
- Herbert A. Simon, — Administrative Behavior, 1947.
- Max Weber, — नौकरशाही तथा वैधानिक-तार्किक प्राधिकार संबंधी मूल लेखन।
इन्हें भी पढ़े –
नवीन लोक प्रशासन का विकास (Evolution of New Public Administration)


