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लोक प्रशासन का विकास

लोक प्रशासन का विकास और इसके प्रमुख ऐतिहासिक चरणों को दर्शाता शैक्षिक चित्र

लोक प्रशासन का एक अकादमिक विषय के रूप में विकास (Evolution of Public Administration as a Discipline)

लोक प्रशासन का अर्थ और विषय के रूप में विकास

लोक प्रशासन का अर्थ सरकारी नीतियों और निर्णयों को लागू करने तथा सार्वजनिक सेवाओं का संचालन करने से है। प्रशासनिक गतिविधियाँ प्राचीन काल से मौजूद थीं, लेकिन लोक प्रशासन का स्वतंत्र अकादमिक विषय के रूप में व्यवस्थित विकास 19वीं शताब्दी के अंत में शुरू हुआ। एक अकादमिक विषय के रूप में लोक प्रशासन के विकास का संबंध प्रशासनिक दक्षता, संगठन, निर्णय-निर्माण, मानवीय व्यवहार, सामाजिक समानता और सुशासन के अध्ययन से है।
इसके विकास को समझने के लिए दो बातों में अंतर करना आवश्यक है पहली, प्रशासनिक व्यवहार: सरकार और संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले वास्तविक प्रशासनिक कार्य। दूसरी, लोक प्रशासन का अकादमिक अध्ययन: प्रशासन के सिद्धांतों, प्रक्रियाओं, संस्थाओं और व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन।

लोक प्रशासन के विकास के प्रमुख चरण

प्रथम चरण: राजनीति और प्रशासन का पृथक्करण (1887–1926)

लोक प्रशासन को स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित करने में वुडरो विल्सन का महत्त्वपूर्ण योगदान था। वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson) ने 1887 में The Study of Administration नामक लेख प्रकाशित किया। उन्होंने प्रशासन के व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन पर जोर दिया। उनके अनुसार, प्रशासन का अध्ययन राजनीति के दैनिक संघर्षों से अलग करके किया जाना चाहिए, ताकि सरकारी कार्यों में दक्षता और उत्तरदायित्व बढ़ाया जा सके।
फ्रैंक जे. गुडनाउ (Frank J. Goodnow) ने अपनी पुस्तक Politics and Administration (1900) में राजनीति और प्रशासन के कार्यों के बीच अंतर स्पष्ट किया। उनके अनुसार, राजनीति राज्य की इच्छा व्यक्त करती है, जबकि प्रशासन उस इच्छा को लागू करता है। इस चरण में प्रशासनिक दक्षता, राजनीतिक हस्तक्षेप से प्रशासन की स्वतंत्रता और प्रशासनिक अध्ययन की अलग पहचान पर जोर दिया गया।

प्रमुख विशेषताएँ

  • लोक प्रशासन को स्वतंत्र अध्ययन-विषय बनाने का प्रयास।
  • राजनीति और प्रशासन के कार्यों में अंतर पर जोर।
  • प्रशासन में दक्षता और व्यावसायिकता को महत्त्व।

सीमा:

राजनीति और प्रशासन को पूरी तरह अलग करना व्यावहारिक नहीं है। प्रशासनिक अधिकारी नीतियों को लागू करते समय उनकी व्याख्या करते हैं और निर्णय भी लेते हैं।

द्वितीय चरण: प्रशासन के सिद्धांत और शास्त्रीय दृष्टिकोण (1927–1937)

इस चरण में प्रशासनिक संगठन, कार्य-विभाजन, नियंत्रण, समन्वय और दक्षता पर जोर दिया गया। माना गया कि प्रशासन के कुछ सामान्य सिद्धांत विकसित किए जा सकते हैं, जिनका उपयोग विभिन्न संगठनों में किया जा सकता है। एल. डी. व्हाइट (L. D. White) की पुस्तक Introduction to the Study of Public Administration (1926) लोक प्रशासन की प्रारंभिक व्यवस्थित पाठ्यपुस्तकों में प्रमुख है। इसमें प्रशासन के अध्ययन को व्यवस्थित रूप देने का प्रयास किया गया।
डब्ल्यू. एफ. विलॉबी (W. F. Willoughby) ने Principles of Public Administration (1927) में प्रशासनिक सिद्धांतों के व्यवस्थित अध्ययन पर बल दिया।

इस दौर के प्रमुख विचारकों और उनके योगदान को समझना आवश्यक है:

  • एफ. डब्ल्यू. टेलर (F. W. Taylor): वैज्ञानिक प्रबंधन; कार्यों की वैज्ञानिक जाँच और दक्षता में वृद्धि।
  • हेनरी फेयोल (Henri Fayol): प्रशासनिक प्रबंधन और संगठन के सिद्धांत।
  • लूथर गुलिक (Luther Gulick): प्रशासनिक कार्यों को समझाने के लिए POSDCORB सूत्र।
  • लिंडल उर्विक (Lyndall Urwick): संगठन और प्रबंधन के सिद्धांतों को व्यवस्थित करने में योगदान।

गुलिक का POSDCORB प्रशासनिक कार्यों के सात प्रमुख पक्षों को दर्शाता है:
अक्षर – प्रशासनिक कार्य
P — Planning नियोजन
O — Organizing संगठन
S — Staffing कर्मचारी व्यवस्था
D — Directing निर्देशन
CO — Coordinating समन्वय
R — Reporting प्रतिवेदन
B — Budgeting बजट निर्माण

इस चरण का मुख्य उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों को व्यवस्थित करना और संगठन की कार्यक्षमता बढ़ाना था।

सीमा:

शास्त्रीय दृष्टिकोण ने मानवीय व्यवहार, अनौपचारिक समूहों, संगठनात्मक परिस्थितियों और सामाजिक मूल्यों को अपेक्षाकृत कम महत्त्व दिया। इसके सिद्धांतों को सभी परिस्थितियों में समान रूप से लागू करना कठिन है।

तृतीय चरण: मानवीय संबंध और व्यवहारवादी दृष्टिकोण (1938–1950)

शास्त्रीय सिद्धांतों में संगठन की संरचना और दक्षता पर अधिक जोर था। इसके बाद विद्वानों ने प्रशासन में मानवीय व्यवहार, प्रेरणा, समूह-संबंधों और निर्णय-निर्माण का अध्ययन शुरू किया। चेस्टर बर्नार्ड (Chester Barnard) ने The Functions of the Executive (1938) में संगठन को सहयोगात्मक व्यवस्था के रूप में समझाया। उन्होंने संचार, सहयोग और संगठन में व्यक्तियों की भागीदारी को महत्त्व दिया।
हर्बर्ट साइमन (Herbert A. Simon) ने Administrative Behavior (1947) में प्रशासनिक निर्णय-निर्माण का विश्लेषण किया। उन्होंने प्रशासनिक सिद्धांतों की आलोचना करते हुए बताया कि कई पारंपरिक सिद्धांत अस्पष्ट हैं और एक-दूसरे के विपरीत निष्कर्ष भी दे सकते हैं। साइमन के अनुसार, प्रशासनिक निर्णय लेने वाले व्यक्ति के पास न तो पूरी जानकारी होती है और न ही असीमित बौद्धिक क्षमता। इसलिए वे प्रायः सभी विकल्पों में सर्वोत्तम विकल्प खोजने के बजाय एक पर्याप्त रूप से संतोषजनक विकल्प चुनते हैं। इसे सीमित विवेकशीलता (Bounded Rationality) कहा जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • निर्णय-निर्माण को प्रशासन के अध्ययन का केंद्र बनाया गया।
  • मानवीय व्यवहार और संगठन में सहयोग को महत्त्व मिला।
  • प्रशासनिक सिद्धांतों की तार्किक और अनुभवजन्य जाँच पर जोर दिया गया।

सीमा:

व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने निर्णय और व्यवहार के वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा दिया, लेकिन प्रशासन में सामाजिक न्याय, नैतिकता और मूल्यों जैसे प्रश्नों को पर्याप्त महत्त्व न देने की आलोचना भी हुई।

चतुर्थ चरण: लोक प्रशासन की पहचान और मूल्यों पर बहस (1948–1960 के दशक)

इस चरण में यह प्रश्न प्रमुख हुआ कि लोक प्रशासन केवल प्रबंधन की तकनीक है या उसका अपना सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य भी है। ड्वाइट वाल्डो (Dwight Waldo) ने The Administrative State (1948) में प्रशासन को केवल दक्षता और तकनीकी नियमों तक सीमित रखने का विरोध किया। उनके अनुसार, प्रशासनिक निर्णयों में लोकतंत्र, समानता और राजनीतिक मूल्यों का प्रभाव होता है। इस विचार ने लोक प्रशासन में मूल्यों और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के महत्त्व को रेखांकित किया।

हर्बर्ट साइमन और ड्वाइट वाल्डो के दृष्टिकोण में अंतर:

साइमन ने प्रशासनिक निर्णयों के वैज्ञानिक और व्यवहारवादी अध्ययन पर जोर दिया। वाल्डो ने प्रशासन के राजनीतिक, नैतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों को महत्त्व दिया।

इसी दौर में लोक प्रशासन की पहचान को लेकर बहस बढ़ी। एक ओर इसे सामान्य प्रबंधन विज्ञान का हिस्सा मानने की प्रवृत्ति थी, जबकि दूसरी ओर इसे सार्वजनिक संस्थाओं, लोकतंत्र और सार्वजनिक हित से जुड़ा विशिष्ट विषय माना गया।

पंचम चरण: नवीन लोक प्रशासन (New Public Administration), 1968 के बाद

1968 में अमेरिका के मिनोब्रुक सम्मेलन (Minnowbrook Conference) को नवीन लोक प्रशासन के विकास में महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस सम्मेलन से जुड़े विचारकों ने प्रशासन को केवल दक्षता और नियमों के पालन तक सीमित रखने का विरोध किया। जॉर्ज फ्रेडरिकसन (H. George Frederickson) नवीन लोक प्रशासन के प्रमुख विचारकों में शामिल हैं। इस दृष्टिकोण ने सामाजिक समानता (Social Equity) को प्रशासन का महत्त्वपूर्ण लक्ष्य माना। नवीन लोक प्रशासन के अनुसार, प्रशासन को कमजोर और वंचित वर्गों की आवश्यकताओं पर ध्यान देना चाहिए। केवल कम लागत में काम पूरा करना पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना चाहिए कि प्रशासनिक सेवाओं और संसाधनों का लाभ किन लोगों तक पहुँच रहा है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • सामाजिक समानता और न्याय पर जोर।
  • नागरिकों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशीलता।
  • प्रशासन में परिवर्तन और नवाचार का समर्थन।
  • दक्षता के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों पर ध्यान।

सीमा:

सामाजिक समानता के लक्ष्यों को लागू करते समय संसाधनों, प्रशासनिक निष्पक्षता और अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाना कठिन हो सकता है।

षष्ठ चरण: नवीन लोक प्रबंधन (New Public Management—NPM), 1980 के दशक से

1980 के दशक में कई देशों में सरकारी संस्थाओं की लागत, कार्यक्षमता और सेवा-प्रदाय में सुधार पर जोर बढ़ा। इसी संदर्भ में नवीन लोक प्रबंधन का विकास हुआ। क्रिस्टोफर हुड (Christopher Hood) ने 1991 के लेख A Public Management for All Seasons? में नवीन लोक प्रबंधन की प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण किया। NPM में निजी क्षेत्र की कुछ प्रबंधन-पद्धतियों को सरकारी संस्थाओं में अपनाने पर जोर दिया गया। इसमें स्पष्ट प्रदर्शन-लक्ष्य, परिणामों का मूल्यांकन, प्रबंधकीय स्वतंत्रता और नागरिकों को बेहतर सेवाएँ देने पर ध्यान दिया जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • परिणाम और प्रदर्शन पर जोर।
  • लागत में कमी तथा संसाधनों का प्रभावी उपयोग।
  • प्रबंधकों को कार्य करने की अधिक स्वतंत्रता।
  • सेवा की गुणवत्ता और नागरिकों की संतुष्टि का मूल्यांकन।
  • जहाँ उपयुक्त हो, प्रतिस्पर्धा और अनुबंध-आधारित सेवा-प्रदान का उपयोग।
  • नवीन लोक प्रशासन और नवीन लोक प्रबंधन में अंतर: नवीन लोक प्रशासन सामाजिक समानता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व पर विशेष जोर देता है, जबकि नवीन लोक प्रबंधन प्रदर्शन, परिणाम और प्रबंधकीय दक्षता पर अधिक ध्यान देता है।

सीमा:

निजी क्षेत्र की तकनीकों को सरकारी संस्थाओं में सीधे लागू नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक प्रशासन को लाभ के अतिरिक्त कानून, समानता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का भी पालन करना होता है।

सप्तम चरण: सुशासन और नवीन लोक सेवा (Governance and New Public Service)

बाद के विकास में प्रशासन का अध्ययन केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं रहा। सरकार, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज और समुदायों के बीच सहयोग को भी महत्त्व दिया जाने लगा। इस व्यापक दृष्टिकोण को शासन (Governance) कहा जाता है। शासन का अर्थ केवल सरकार द्वारा आदेश देना नहीं है। इसमें सार्वजनिक समस्याओं को हल करने के लिए विभिन्न संस्थाओं और हितधारकों के बीच समन्वय, सहयोग और उत्तरदायित्व भी शामिल हैं।
जेनेट और रॉबर्ट डेनहार्ट (Janet V. Denhardt and Robert B. Denhardt) ने The New Public Service: Serving, Not Steering (2003) में नवीन लोक सेवा के विचार को प्रस्तुत किया। इस दृष्टिकोण के अनुसार, लोक सेवकों का उद्देश्य केवल प्रशासन को नियंत्रित करना या सेवाओं को बाजार की तरह उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि नागरिकों की सेवा करना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाना है।

मुख्य विशेषताएँ

  • नागरिकों को केवल ग्राहक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदार मानना।
  • सार्वजनिक हित को महत्त्व देना।
  • नागरिक सहभागिता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व बढ़ाना।
  • सरकार और गैर-सरकारी संस्थाओं के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना।
  • शासन और नवीन लोक सेवा में अंतर: शासन एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें अनेक संस्थाएँ सार्वजनिक समस्याओं के समाधान में भाग लेती हैं। नवीन लोक सेवा एक ऐसा दृष्टिकोण है जो नागरिकता, सार्वजनिक हित और लोकतांत्रिक सहभागिता पर विशेष जोर देता है।

अष्टम चरण: डिजिटल शासन और समकालीन लोक प्रशासन

समकालीन लोक प्रशासन में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी, ऑनलाइन सेवाओं, डिजिटल अभिलेखों और डेटा-आधारित निर्णयों का महत्त्व बढ़ा है। ई-गवर्नेंस (E-Governance) के माध्यम से सरकारी सेवाएँ नागरिकों तक ऑनलाइन पहुँचाई जाती हैं। इससे सेवा-प्रदान में सुविधा और पारदर्शिता बढ़ सकती है। हालाँकि, डिजिटल असमानता, डेटा की गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और तकनीक तक असमान पहुँच जैसी चुनौतियाँ भी बनी रहती हैं। भारत में डिजिटल शासन के उदाहरणों में डिजिटल इंडिया, ऑनलाइन सरकारी सेवा-पोर्टल और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) शामिल हैं। इन पहलों का अध्ययन करते समय उनके उद्देश्यों के साथ-साथ पहुँच, पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रभाव का भी मूल्यांकन करना चाहिए।

लोक प्रशासन के विकास में निकोलस हेनरी का योगदान

निकोलस हेनरी (Nicholas Henry) ने अपने लेख Public Administration and Public Affairs के विभिन्न संस्करणों में लोक प्रशासन के विकास को समझने के लिए प्रतिमानों (Paradigms) का वर्गीकरण प्रस्तुत किया। यह वर्गीकरण विषय के विकास को समझने के लिए उपयोगी है। जिसमें प्रतिमान उसकी अवधि और उसका मुख्य विचार दिया गया है।

प्रतिमान 1 – 1900–1926 – राजनीति-प्रशासन द्वैत
प्रतिमान 2 – 1927–1937 – प्रशासन के सिद्धांत
प्रतिमान 3 – 1950–1970 – राजनीति विज्ञान के रूप में लोक प्रशासन
प्रतिमान 4 – 1956–1970 – प्रबंधन विज्ञान के रूप में लोक प्रशासन
प्रतिमान 5 – 1970 के बाद – लोक प्रशासन की स्वतंत्र पहचान

नोट – इन प्रतिमानों की अवधियाँ एक-दूसरे से आंशिक रूप से मिलती हैं। इन्हें कठोर और सर्वसम्मत ऐतिहासिक सीमाओं के बजाय लोक प्रशासन के बौद्धिक विकास को समझने के लिए प्रस्तुत वर्गीकरण के रूप में पढ़ना चाहिए।

भारत में लोक प्रशासन का विकास

भारत में प्रशासनिक व्यवस्था का इतिहास प्राचीन काल से मिलता है। आधुनिक लोक प्रशासन के विकास को निम्न चरणों में समझा जा सकता है।

प्राचीन भारत:

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य-व्यवस्था, राजस्व, अधिकारियों, दंड-व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण पर विचार मिलते हैं। यह प्राचीन भारतीय प्रशासनिक चिंतन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

औपनिवेशिक काल:

ब्रिटिश शासन में राजस्व प्रशासन, जिला प्रशासन, सिविल सेवा और नौकरशाही का विस्तार हुआ। यह व्यवस्था मुख्यतः औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुई।

स्वतंत्रता के बाद:

भारत में प्रशासन का उद्देश्य संवैधानिक शासन चलाने के साथ-साथ विकास, कल्याणकारी योजनाओं और सार्वजनिक सेवाओं का विस्तार करना भी बना। प्रशासनिक सुधार, पंचवर्षीय योजनाएँ, ग्रामीण विकास और स्थानीय स्वशासन इस विकास के महत्त्वपूर्ण पक्ष रहे।

समकालीन भारत:

ई-गवर्नेंस, डिजिटल सेवाओं, पारदर्शिता, नागरिक-केंद्रित प्रशासन और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने प्रशासन की कार्यप्रणाली को प्रभावित किया है।

भारत में लोक प्रशासन को समझने के लिए संवैधानिक व्यवस्था, संघवाद, संसदीय उत्तरदायित्व, लोक सेवाओं और सामाजिक-आर्थिक विकास के संबंधों का अध्ययन भी आवश्यक है।

लोक प्रशासन के विकास का आलोचनात्मक मूल्यांकन

लोक प्रशासन का विकास किसी एक सिद्धांत या विचारधारा तक सीमित नहीं रहा। प्रत्येक चरण ने कुछ प्रश्नों के उत्तर दिए और कुछ नई समस्याएँ सामने रखीं।
शास्त्रीय दृष्टिकोण ने संगठन, कार्य-विभाजन और दक्षता को व्यवस्थित रूप दिया, लेकिन मानवीय व्यवहार को कम महत्त्व दिया।
व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने निर्णय-निर्माण और मानवीय व्यवहार का अध्ययन विकसित किया, लेकिन मूल्यों और सामाजिक न्याय पर अपेक्षाकृत कम ध्यान देने की आलोचना हुई।
नवीन लोक प्रशासन ने सामाजिक समानता और नागरिकों की आवश्यकताओं को प्रमुखता दी।
नवीन लोक प्रबंधन ने प्रदर्शन, परिणाम और लागत-प्रभावशीलता पर जोर दिया, लेकिन सार्वजनिक प्रशासन को निजी प्रबंधन की तरह देखने की सीमाएँ भी सामने आईं।
शासन और नवीन लोक सेवा ने सहयोग, नागरिक सहभागिता, सार्वजनिक हित और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को महत्त्व दिया।
डिजिटल शासन ने सेवाओं की पहुँच और प्रक्रिया में सुधार की संभावनाएँ बढ़ाईं, लेकिन डिजिटल असमानता और गोपनीयता जैसी चुनौतियाँ भी पैदा कीं।
इस प्रकार, आधुनिक लोक प्रशासन में दक्षता, प्रभावशीलता, सामाजिक समानता, पारदर्शिता, नैतिकता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन आवश्यक है।

निष्कर्ष:

लोक प्रशासन का विकास दक्षता और संगठन के अध्ययन से शुरू होकर निर्णय-निर्माण, सामाजिक समानता, प्रदर्शन, नागरिक सहभागिता और डिजिटल शासन तक पहुँचा है। वर्तमान में इसका प्रमुख उद्देश्य कुशल प्रशासन के साथ सार्वजनिक हित, समानता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना है।

प्रमुख विद्वान और उनका योगदान

  • वुडरो विल्सन – 1887 — The Study of Administration
  • फ्रैंक जे. गुडनाउ – 1900 — Politics and Administration
  • एल. डी. व्हाइट – 1926 — Introduction to the Study of Public Administration
  • डब्ल्यू. एफ. विलॉबी – 1927 — Principles of Public Administration
  • चेस्टर बर्नार्ड – 1938 — The Functions of the Executive
  • हर्बर्ट साइमन – 1947 — Administrative Behavior; निर्णय-निर्माण और सीमित विवेकशीलता
  • ड्वाइट वाल्डो – 1948 — The Administrative State; प्रशासनिक मूल्य
  • एच. जॉर्ज फ्रेडरिकसन – नवीन लोक प्रशासन और सामाजिक समानता
  • क्रिस्टोफर हुड – 1991 — A Public Management for All Seasons?; NPM
  • डेनहार्ट दंपति – 2003 — The New Public Service: Serving, Not Steering
  • विकास-क्रम याद रखने का सूत्र – राजनीति-प्रशासन द्वैत → शास्त्रीय सिद्धांत → व्यवहारवादी दृष्टिकोण → प्रशासनिक मूल्य → नवीन लोक प्रशासन → नवीन लोक प्रबंधन → शासन एवं नवीन लोक सेवा → डिजिटल शासन

इन्हें भी पढ़े –

लोक प्रशासन की परिभाष

लोक प्रशासन का अर्थ

लोक प्रशासन की प्रकृति

लोक प्रशासन का महत्व (Significance of Public Administration)

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