लोक प्रशासन के शास्त्रीय सिद्धांत: हेनरी फेयोल, लूथर गुलिक और मैरी पार्कर फॉलेट
लोक प्रशासन के शास्त्रीय सिद्धांत का उदय एवं विकास
लोक प्रशासन के शास्त्रीय सिद्धांत (Classical Theory) का विकास उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में हुआ। औद्योगिक क्रांति के कारण बड़े औद्योगिक संगठनों और सरकारी प्रशासन का विस्तार हुआ। इससे कार्य-विभाजन, अधिकार, उत्तरदायित्व, नियंत्रण, समन्वय और कार्यकुशलता की समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
शास्त्रीय विचारकों ने माना कि संगठन को कुछ सामान्य प्रशासनिक सिद्धांतों के आधार पर अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाया जा सकता है। इस दृष्टिकोण के
शास्त्रीय सिद्धांत के तीन प्रमुख आयाम थे—वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रशासनिक प्रबंधन और संगठन सिद्धांत।
- एफ. डब्ल्यू. टेलर (F. W. Taylor) – वैज्ञानिक प्रबंधन – श्रमिकों की दक्षता और कार्य-विधि
- हेनरी फेयोल (Henri Fayol) – प्रशासनिक प्रबंधन – प्रबंधन के कार्य एवं सिद्धांत
- लूथर गुलिक (Luther Gulick) – POSDCORB और संगठन सिद्धांत – प्रशासनिक कार्य एवं संगठनात्मक संरचना
- मैरी पार्कर फॉलेट (Mary Parker Follett) – सहयोग, एकीकरण और शक्ति – मानवीय संबंध एवं समूह-प्रक्रिया
फेयोल और गुलिक ने मुख्यतः प्रशासनिक कार्यों तथा संगठन की संरचना पर ध्यान दिया। फॉलेट ने सहयोग, संघर्ष-समाधान और मानवीय संबंधों को महत्त्व दिया। इस कारण उनके विचार शास्त्रीय संगठन सिद्धांत को मानवीय और सहभागी दृष्टिकोण से समझने में भी सहायक हैं।
हेनरी फेयोल: प्रशासनिक प्रबंधन सिद्धांत
हेनरी फेयोल (1841–1925) की प्रमुख कृति: Administration industrielle et générale (1916) है। फेयोल फ्रांसीसी खनन अभियंता और प्रबंधन विचारक थे। उन्होंने प्रबंधन को एक व्यवस्थित ज्ञान के रूप में विकसित करने पर जोर दिया।
प्रशासनिक प्रबंधन का अर्थ
फेयोल का प्रशासनिक प्रबंधन सिद्धांत (Administrative Management Theory) पूरे संगठन के प्रबंधन से संबंधित है। टेलर ने मुख्यतः श्रमिकों और उत्पादन की कार्य-विधियों पर ध्यान दिया, जबकि फेयोल ने संगठन के समग्र प्रबंधन तथा उच्च अधिकारियों के कार्यों का अध्ययन किया। फेयोल के अनुसार प्रबंधन केवल व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित कला नहीं है, बल्कि इसे सिद्धांतों और प्रशिक्षण के माध्यम से सीखा जा सकता है। उन्होंने संगठन की तकनीकी, वित्तीय और अन्य गतिविधियों के साथ प्रबंधकीय गतिविधियों को भी अलग महत्त्व दिया।
संगठन की छह प्रमुख गतिविधियाँ
फेयोल ने संगठन की गतिविधियों को छह वर्गों में बाँटा:
- तकनीकी गतिविधियाँ (Technical): उत्पादन और निर्माण।
- वाणिज्यिक गतिविधियाँ (Commercial): खरीद, बिक्री और विनिमय।
- वित्तीय गतिविधियाँ (Financial): पूँजी और वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था।
- सुरक्षा गतिविधियाँ (Security): व्यक्ति और संपत्ति की सुरक्षा।
- लेखांकन गतिविधियाँ (Accounting): लेखे, लागत और सांख्यिकी।
- प्रबंधकीय गतिविधियाँ (Managerial): नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय और नियंत्रण।
इनमें प्रबंधकीय गतिविधियाँ विशेष महत्त्व रखती हैं, क्योंकि वे संगठन के अन्य सभी कार्यों को एक साझा उद्देश्य से जोड़ती हैं।
प्रबंधन के पाँच तत्व
फेयोल ने प्रबंधन के पाँच प्रमुख तत्व बताए:
- पूर्वानुमान एवं नियोजन (Planning) – भविष्य की आवश्यकताओं का अनुमान लगाकर योजना बनाना।
- संगठन (Organizing) – कार्यों, संसाधनों और अधिकारों की व्यवस्था करना।
- आदेश देना (Commanding) – कर्मचारियों को कार्य के लिए निर्देशित करना।
- समन्वय (Coordinating) – विभिन्न गतिविधियों में तालमेल स्थापित करना।
- नियंत्रण (Controlling) – कार्यों की निर्धारित योजना और मानकों से तुलना करना।
ये पाँच तत्व एक-दूसरे से जुड़े हैं। उदाहरण के लिए, किसी सरकारी योजना में पहले लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं, फिर संसाधन और जिम्मेदारियाँ तय होती हैं, कर्मचारियों को निर्देश दिए जाते हैं, विभागों के बीच समन्वय किया जाता है और अंत में परिणामों की समीक्षा होती है।
फेयोल के चौदह प्रशासनिक सिद्धांत
फेयोल ने प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए चौदह सिद्धांत प्रस्तुत किए। इन्हें कठोर और हर परिस्थिति में समान रूप से लागू होने वाले नियमों के बजाय सामान्य प्रशासनिक मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में समझना चाहिए।
- कार्य-विभाजन (Division of Work) – विशेषज्ञता के अनुसार कार्य बाँटने से दक्षता बढ़ती है। अत्यधिक विभाजन से विभागीय अलगाव उत्पन्न हो सकता है।
- अधिकार एवं उत्तरदायित्व (Authority and Responsibility) – अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी होना चाहिए। अधिकार के बिना उत्तरदायित्व प्रभावी कार्य में बाधा डालता है।
- अनुशासन (Discipline) – नियमों, समझौतों और निर्धारित दायित्वों का पालन संगठन के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक है।
- आदेश की एकता (Unity of Command) – एक कर्मचारी को सामान्यतः एक ही अधिकारी से आदेश प्राप्त होने चाहिए। इससे भ्रम और परस्पर विरोधी निर्देशों की समस्या कम होती है।
- निर्देशन की एकता (Unity of Direction) – समान उद्देश्य वाली गतिविधियों के लिए एक योजना और एक निर्देशन होना चाहिए। यह आदेश की एकता से अलग है: आदेश की एकता कर्मचारी-अधिकारी संबंध से, जबकि निर्देशन की एकता योजना और गतिविधियों से संबंधित है।
- सामान्य हित की प्रधानता (Subordination of Individual Interest to General Interest) – व्यक्तिगत हित को संगठन के सामान्य हित के अधीन होना चाहिए। लोक प्रशासन में इसका संबंध सार्वजनिक हित और पद के उचित उपयोग से है।
- पारिश्रमिक (Remuneration) – कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए, जिससे कर्मचारी और संगठन दोनों के हितों में संतुलन बना रहे।
- केंद्रीकरण (Centralization) – निर्णय लेने की शक्ति के केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण में संगठन की आवश्यकताओं के अनुसार संतुलन होना चाहिए।
- पदसोपान श्रृंखला (Scalar Chain) – उच्चतम अधिकारी से निम्नतम कर्मचारी तक अधिकार और संचार की औपचारिक श्रृंखला होनी चाहिए। आपातकालीन स्थिति में निर्धारित व्यवस्था के अंतर्गत सीधे संपर्क की अनुमति को Gang Plank कहा जाता है।
- व्यवस्था (Order) – प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु का उचित स्थान होना चाहिए। इसमें उपयुक्त व्यक्ति को उपयुक्त कार्य देना भी शामिल है।
- समता (Equity) – अधिकारियों को कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए।
- कर्मचारियों के कार्यकाल की स्थिरता (Stability of Tenure) – अनावश्यक स्थानांतरण और बार-बार कर्मचारियों को बदलने से दक्षता तथा संस्थागत अनुभव प्रभावित होते हैं।
- पहल (Initiative) – कर्मचारियों को विचार प्रस्तुत करने और योजनाओं में योगदान देने के अवसर मिलने चाहिए।
- दल-भावना (Esprit de Corps) – सहयोग, विश्वास और सामूहिक भावना से संगठन की कार्यक्षमता बढ़ती है।
फेयोल के सिद्धांतों का मूल्यांकन
फेयोल का प्रमुख योगदान प्रबंधन के कार्यों और सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप देना है। उनके विचार आज भी विभागीय जिम्मेदारियों, अनुशासन, समन्वय और प्रशासनिक नियंत्रण को समझने में उपयोगी हैं।
आलोचना:
उनके सिद्धांत औपचारिक संरचना और कार्यकुशलता पर अधिक जोर देते हैं। वास्तविक संगठनों में अनौपचारिक समूह, राजनीतिक दबाव, मानवीय व्यवहार और परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है। इसलिए उनके सिद्धांतों को परिस्थितियों के अनुसार लागू करना चाहिए।
लूथर गुलिक: प्रशासनिक संगठन और POSDCORB
लूथर हाल्सी गुलिक (1892–1993) का प्रमुख लेख: “Notes on the Theory of Organization” (1937) है। गुलिक अमेरिकी लोक प्रशासन के प्रमुख विद्वान थे। उन्होंने प्रशासनिक प्रमुख के कार्यों और संगठनात्मक संरचना को व्यवस्थित रूप दिया।
POSDCORB का अर्थ
गुलिक ने प्रशासनिक प्रमुख के कार्यों को सात श्रेणियों में समझाया। इन्हें POSDCORB कहा जाता है। यह शब्द सात अंग्रेजी शब्दों के प्रथम अक्षरों से बना है। POSDCORB के का फुल फॉर्म और उसके प्रशासनिक कार्य व व्याख्या की सूची दी गई है।
- P – Planning — नियोजन – लक्ष्य निर्धारित करना और कार्ययोजना बनाना।
- O – Organizing — संगठन – कार्यों, विभागों और अधिकारों की व्यवस्था करना।
- S – Staffing — कर्मचारी व्यवस्था – भर्ती, चयन, प्रशिक्षण और कर्मचारियों की नियुक्ति।
- D – Directing — निर्देशन – निर्णय लेना और कर्मचारियों को निर्देश देना।
- CO – Coordinating — समन्वय – विभिन्न विभागों के कार्यों में तालमेल स्थापित करना।
- R – Reporting — प्रतिवेदन – कार्य-प्रगति, अभिलेख और परिणामों की जानकारी देना।
- B – Budgeting — बजट निर्माण – वित्तीय योजना, लेखांकन और व्यय-नियंत्रण।
POSDCORB की व्याख्या एवं उपयोग
POSDCORB प्रशासनिक कार्यों को समझने का एक व्यवस्थित ढाँचा है। उदाहरण के लिए, किसी जिले में स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू करने के लिए प्रशासन को योजना बनानी होगी, कर्मचारियों की नियुक्ति करनी होगी, विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना होगा, बजट का उपयोग करना होगा और प्रगति की रिपोर्ट तैयार करनी होगी। इन कार्यों को अलग-अलग समझा जा सकता है, लेकिन व्यवहार में वे परस्पर जुड़े होते हैं। रिपोर्ट के आधार पर योजना बदली जा सकती है और बजट की कमी से कर्मचारी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
गुलिक के संगठनात्मक विचार
विभागीकरण (Departmentation): संगठन के कार्यों को व्यवस्थित करने के लिए गुलिक ने चार प्रमुख आधारों पर ध्यान दिया।
- उद्देश्य (Purpose): समान उद्देश्य वाले कार्यों को एक विभाग में रखना, जैसे शिक्षा विभाग।
- प्रक्रिया (Process): समान तकनीकी विशेषज्ञता वाले कार्यों को एक साथ रखना, जैसे इंजीनियरिंग।
- व्यक्ति या ग्राहक-वर्ग (Persons): किसी विशेष वर्ग की आवश्यकताओं के अनुसार विभाग बनाना, जैसे बाल कल्याण।
- क्षेत्र (Place): भौगोलिक आधार पर कार्यों का विभाजन, जैसे जिला या क्षेत्रीय कार्यालय।
वास्तविक प्रशासन में इन आधारों का मिश्रित उपयोग किया जा सकता है।
नियंत्रण का विस्तार (Span of Control):– इससे आशय उन अधीनस्थों की संख्या से है जिनका कोई अधिकारी प्रभावी ढंग से निर्देशन और पर्यवेक्षण कर सकता है। बहुत अधिक अधीनस्थ होने पर निगरानी कठिन हो सकती है, जबकि बहुत कम अधीनस्थ होने पर प्रशासनिक स्तर और लागत बढ़ सकते हैं। उपयुक्त नियंत्रण-विस्तार कार्य की जटिलता, कर्मचारियों की क्षमता और संचार-व्यवस्था पर निर्भर करता है।
समन्वय (Coordination):- विभागों और कर्मचारियों के कार्यों में तालमेल आवश्यक है। उदाहरण के लिए, आपदा प्रबंधन में पुलिस, स्वास्थ्य, राजस्व और स्थानीय प्रशासन को मिलकर काम करना पड़ता है।
POSDCORB का आलोचनात्मक मूल्यांकन
गुलिक का योगदान प्रशासनिक कार्यों का स्पष्ट वर्गीकरण है। इससे नियोजन, कर्मचारी व्यवस्था, समन्वय, प्रतिवेदन और बजट की भूमिकाओं को समझना आसान होता है। लेकिन POSDCORB की सीमा यह है कि यह मुख्यतः प्रशासनिक कार्यों पर केंद्रित है। यह अपने आप में यह निर्धारित नहीं करता कि कौन-सा निर्णय न्यायपूर्ण होगा या प्रशासन नागरिकों के प्रति कितना उत्तरदायी है। इसके अतिरिक्त, वास्तविक प्रशासन में सातों कार्य अलग-अलग क्रम में नहीं चलते। इसलिए POSDCORB को लोक प्रशासन की संपूर्ण व्याख्या के बजाय प्रशासनिक कार्यों का उपयोगी विश्लेषणात्मक ढाँचा माना जाना चाहिए।
मैरी पार्कर फॉलेट: सहयोग, शक्ति और संघर्ष-समाधान
मैरी पार्कर फॉलेट (1868–1933) की प्रमुख कृतियाँ: The New State (1918), Creative Experience (1924) हैं। फॉलेट ने संगठनात्मक संबंधों, समूह-प्रक्रिया, सहयोग, शक्ति और संघर्ष के रचनात्मक समाधान पर विचार किया।
संगठन के प्रति फॉलेट का दृष्टिकोण
फॉलेट ने संगठन को केवल पदों और नियमों की व्यवस्था नहीं माना। उनके अनुसार संगठन की प्रभावशीलता व्यक्तियों और समूहों के बीच सहयोग, संवाद तथा सामूहिक समस्या-समाधान पर भी निर्भर करती है। फेयोल और गुलिक ने प्रबंधन तथा संगठनात्मक संरचना को व्यवस्थित किया, जबकि फॉलेट ने यह समझने का प्रयास किया कि संगठन में मतभेदों को कैसे सुलझाया जाए और लोगों की क्षमताओं का सामूहिक उपयोग कैसे हो।
संघर्ष-समाधान के तीन तरीके
फॉलेट ने संघर्ष के समाधान के तीन प्रमुख तरीकों में अंतर किया। यहां पर तरीका और उसका अर्थ तथा उसकी सीमा का विवरण दिया गया है।
- प्रभुत्व (Domination) – एक पक्ष दूसरे पर अपनी इच्छा थोपता है। – दूसरे पक्ष की आवश्यकताएँ अनसुलझी रह सकती हैं।
- समझौता (Compromise) – दोनों पक्ष कुछ माँगें छोड़कर बीच का रास्ता अपनाते हैं। – किसी पक्ष की मूल आवश्यकता अधूरी रह सकती है।
- एकीकरण (Integration) – ऐसा नया समाधान खोजना जो पक्षों की वास्तविक आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करे। – इसके लिए समय, संवाद और रचनात्मक प्रयास आवश्यक हैं।
उदाहरण के लिए, किसी सरकारी कार्यालय में अधिकारी कार्य-समय बढ़ाना चाहता है, जबकि कर्मचारी लचीले समय की माँग करते हैं। एकीकरण के तहत सेवा की आवश्यकताओं और कर्मचारियों की जरूरतों का विश्लेषण करके ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें कार्यालय की सेवाएँ भी प्रभावित न हों और कर्मचारियों को उचित लचीलापन भी मिले।
फॉलेट के अनुसार एकीकरण केवल आधी-आधी माँग छोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि समस्या को नए ढंग से समझकर समाधान खोजने की प्रक्रिया है।
शक्ति की अवधारणा: Power-over और Power-with
फॉलेट ने शक्ति के दो रूपों में अंतर स्पष्ट किया:
- Power-over — दूसरों पर शक्ति: इसमें एक व्यक्ति या अधिकारी अपनी शक्ति का उपयोग दूसरे लोगों को नियंत्रित करने के लिए करता है।
- Power-with — मिलकर विकसित की गई शक्ति: इसमें लोग सहयोग और सामूहिक प्रयास के माध्यम से अपनी क्षमता बढ़ाते हैं।
उदाहरण के लिए, किसी स्थानीय विकास योजना में अधिकारी नागरिकों और विशेषज्ञों को निर्णय-प्रक्रिया में शामिल करता है, तो सामूहिक ज्ञान और सहयोग से बेहतर समाधान मिल सकता है। इसका अर्थ औपचारिक अधिकार समाप्त करना नहीं, बल्कि उसका उपयोग सहभागिता को प्रोत्साहित करने के लिए करना है।
परिस्थितिजन्य कानून (Law of the Situation)
फॉलेट के अनुसार निर्णय केवल अधिकारी की व्यक्तिगत इच्छा या पद पर आधारित नहीं होने चाहिए। उन्हें संबंधित परिस्थिति, उपलब्ध तथ्यों और कार्य की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार उचित ठहराया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, आपदा के समय राहत सामग्री पहुँचाने का मार्ग चुनते हुए सड़क की स्थिति, सुरक्षा और प्रभावित लोगों की आवश्यकताओं को आधार बनाया जाना चाहिए। यह विचार आधुनिक प्रमाण-आधारित निर्णय-प्रक्रिया से मिलता-जुलता है, हालाँकि दोनों पूरी तरह समान नहीं हैं।
लोकतंत्र और सहभागिता
फॉलेट की पुस्तक The New State (1918) में समूह-जीवन और लोकतांत्रिक सहभागिता का महत्त्व दिखाई देता है। उनके लिए लोकतंत्र केवल प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन में भागीदारी भी है। लोक प्रशासन में नागरिक परामर्श, स्थानीय संस्थाओं और सामुदायिक भागीदारी को इस दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। हालाँकि केवल बैठक आयोजित करना पर्याप्त नहीं है; सहभागिता तभी प्रभावी होती है जब लोगों के विचारों पर वास्तव में विचार किया जाए।
फॉलेट के विचारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन
फॉलेट का प्रमुख योगदान सहयोग, रचनात्मक संघर्ष-समाधान और साझा शक्ति पर जोर देना है। उनके विचार सहभागी प्रबंधन और संगठनात्मक व्यवहार को समझने में उपयोगी हैं। लेकिन हर संघर्ष का एकीकरण के माध्यम से समाधान संभव नहीं है। सीमित संसाधनों या परस्पर विरोधी हितों की स्थिति में समझौते अथवा वैध निर्णय की आवश्यकता हो सकती है। इसके अतिरिक्त, अधिकारी और कर्मचारी के बीच शक्ति का असमान वितरण वास्तविक सहभागिता को सीमित कर सकता है। इसलिए फॉलेट का दृष्टिकोण प्रशासन में सहयोग बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसे औपचारिक अधिकार, कानून और जवाबदेही का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
फेयोल, गुलिक और फॉलेट का तुलनात्मक अध्ययन
हेनरी फेयोल
- प्रमुख दृष्टिकोण – प्रशासनिक प्रबंधन
- मुख्य अवधारणा – पाँच तत्व और 14 सिद्धांत
- मुख्य प्रश्न – प्रबंधन कैसे किया जाए?
- प्रमुख योगदान – प्रबंधन का व्यवस्थित अध्ययन
- प्रमुख सीमा – सिद्धांतों का कठोर प्रयोग
लूथर गुलिक
- प्रमुख दृष्टिकोण – प्रशासनिक कार्य एवं संगठन
- मुख्य अवधारणा – POSDCORB
- मुख्य प्रश्न – प्रशासनिक प्रमुख के कार्य क्या हैं?
- प्रमुख योगदान – प्रशासनिक कार्यों का वर्गीकरण
- प्रमुख सीमा – मानवीय एवं राजनीतिक पक्षों पर सीमित ध्यान
मैरी पार्कर फॉलेट
- प्रमुख दृष्टिकोण – सहयोग एवं समूह-प्रक्रिया
- मुख्य अवधारणा – एकीकरण एवं साझा शक्ति
- मुख्य प्रश्न – संगठन में सहयोग कैसे बढ़ाया जाए?
- प्रमुख योगदान – संघर्ष का रचनात्मक समाधान
- प्रमुख सीमा – शक्ति-असमानता और असंगत हितों की समस्या
तीनों विचारकों के बीच मुख्य अंतर उनके अध्ययन के केंद्र में है। फेयोल ने प्रबंधन के सिद्धांत विकसित किए, गुलिक ने प्रशासनिक कार्यों का वर्गीकरण किया और फॉलेट ने संगठनात्मक संबंधों तथा सहयोग पर बल दिया। इनके विचार परस्पर पूरक हैं, क्योंकि प्रभावी प्रशासन के लिए संरचना, प्रबंधकीय क्षमता और मानवीय सहयोग तीनों आवश्यक हैं।
लोक प्रशासन के शास्त्रीय सिद्धांत की प्रमुख आलोचनाएँ
हर्बर्ट साइमन की आलोचना
- हर्बर्ट साइमन ने अपने लेख The Proverbs of Administration (1946) में पारंपरिक प्रशासनिक सिद्धांतों की आलोचना की। उनके अनुसार, कई प्रशासनिक सिद्धांत सामान्य नियमों की तरह प्रस्तुत किए गए, लेकिन वे कभी-कभी एक-दूसरे के विपरीत निष्कर्ष भी सुझाते हैं।
- उदाहरण के लिए, नियंत्रण का विस्तार सीमित रखने से प्रशासनिक स्तर बढ़ सकते हैं, जबकि स्तर कम रखने के लिए अधिकारी के अधीन अधिक कर्मचारी रखने पड़ सकते हैं। इसलिए किसी सिद्धांत को लागू करने से पहले उसकी परिस्थितियों और परिणामों का परीक्षण आवश्यक है।
- साइमन की आलोचना का अर्थ यह नहीं कि शास्त्रीय सिद्धांत पूरी तरह अनुपयोगी हैं। उनका मुख्य संदेश यह है कि प्रशासनिक सिद्धांतों को संदर्भ और प्रमाण के आधार पर परखा जाना चाहिए।
मानवीय संबंध दृष्टिकोण
मानवीय संबंध दृष्टिकोण (Human Relations Approach) ने कर्मचारियों के मनोबल, सामाजिक संबंधों, समूह-व्यवहार और नेतृत्व के महत्त्व को सामने रखा। यह दृष्टिकोण फॉलेट के सहयोग संबंधी विचारों से कुछ समानता रखता है, लेकिन फॉलेट का चिंतन लोकतंत्र, शक्ति और राजनीतिक समुदाय तक भी विस्तृत था।
व्यवहारवादी एवं परिस्थितिजन्य दृष्टिकोण
व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने वास्तविक प्रशासनिक व्यवहार और निर्णय-प्रक्रिया का अध्ययन किया। परिस्थितिजन्य दृष्टिकोण (Contingency Approach) ने इस विचार पर प्रश्न उठाया कि सभी संगठनों के लिए एक ही संरचना सर्वोत्तम हो सकती है। उदाहरण के लिए, सेना में स्पष्ट कमान महत्त्वपूर्ण है, जबकि विश्वविद्यालय में विशेषज्ञता, अकादमिक स्वतंत्रता और परामर्श की अधिक आवश्यकता होती है। इसलिए संगठनात्मक संरचना कार्य और परिस्थिति के अनुरूप होनी चाहिए।
भारतीय लोक प्रशासन में प्रासंगिकता
भारत में शास्त्रीय सिद्धांतों की उपयोगिता सरकारी विभागों, जिला प्रशासन, अस्पतालों, स्थानीय निकायों और सार्वजनिक योजनाओं में देखी जा सकती है। फेयोल के कार्य-विभाजन, अधिकार और उत्तरदायित्व के सिद्धांत विभागीय जिम्मेदारियाँ निर्धारित करने में उपयोगी हैं। गुलिक का POSDCORB सरकारी योजनाओं के नियोजन, कर्मचारी व्यवस्था, समन्वय, बजट और प्रतिवेदन को समझने में मदद करता है। फॉलेट के विचार नागरिक सहभागिता, विभागीय सहयोग और स्थानीय स्तर पर समस्या-समाधान के लिए प्रासंगिक हैं। फिर भी भारतीय लोक प्रशासन में दक्षता के साथ संवैधानिक मूल्यों, पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों का ध्यान रखना आवश्यक है। शास्त्रीय सिद्धांत प्रशासनिक व्यवस्था को समझने में सहायता करते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक शासन की सभी समस्याओं का अकेले समाधान नहीं करते।
निष्कर्ष
शास्त्रीय सिद्धांत ने लोक प्रशासन को व्यवस्थित अध्ययन का आधार प्रदान किया। फेयोल ने प्रबंधन के पाँच तत्व और चौदह सिद्धांत प्रस्तुत किए, गुलिक ने POSDCORB के माध्यम से प्रशासनिक कार्यों का वर्गीकरण किया और फॉलेट ने सहयोग, एकीकरण तथा साझा शक्ति के महत्त्व को स्पष्ट किया।
इन विचारों की सीमाओं के बावजूद वे आज भी उपयोगी हैं। आधुनिक लोक प्रशासन में इनका प्रभावी उपयोग तभी संभव है, जब प्रशासनिक दक्षता के साथ मानवीय व्यवहार, लोकतांत्रिक सहभागिता और जवाबदेही को भी महत्त्व दिया जाए।
परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य
- प्रशासनिक प्रबंधन सिद्धांत – हेनरी फेयोल
- Administration industrielle et générale – फेयोल, 1916
- प्रबंधन के पाँच तत्व – फेयोल
- चौदह प्रशासनिक सिद्धांत – फेयोल
- Gang Plank – फेयोल
- POSDCORB – लूथर गुलिक
- Notes on the Theory of Organization – गुलिक, 1937
- The New State – मैरी पार्कर फॉलेट, 1918
- Creative Experience – मैरी पार्कर फॉलेट, 1924
- Power-over और Power-with – फॉलेट
- प्रभुत्व, समझौता और एकीकरण – फॉलेट के संघर्ष-समाधान संबंधी विचार
- The Proverbs of Administration – हर्बर्ट साइमन, 1946
पुस्तकें –
- Henri Fayol — General and Industrial Management.
- Luther Gulick — “Notes on the Theory of Organization,” Papers on the Science of Administration (1937).
- Mary Parker Follett — The New State (1918).
- Mary Parker Follett — Creative Experience (1924).
- Herbert A. Simon — “The Proverbs of Administration” (1946).
इन्हें भी पढ़े –
नवीन लोक प्रशासन का विकास (Evolution of New Public Administration)
नवीन लोक प्रबंधन का विकास (Evolution of New Public Management)


