वैज्ञानिक प्रबंधन का सिद्धांत (Scientific Management Theory) — एफ. डब्ल्यू. टेलर
परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
वैज्ञानिक प्रबंधन का सिद्धांत (Scientific Management Theory) के प्रमुख प्रतिपादक फ्रेडरिक विंसलो टेलर (Frederick Winslow Taylor, 1856–1915) थे। इसे प्रबंध के शास्त्रीय दृष्टिकोण (Classical Approach) का एक प्रमुख भाग माना जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औद्योगीकरण और बड़े कारखानों के विस्तार के कारण उत्पादन बढ़ाने, श्रम का उचित उपयोग करने और कार्य-प्रक्रियाओं को व्यवस्थित बनाने की आवश्यकता बढ़ी। उस समय काम करने की विधियाँ अक्सर अनुभव, परंपरा और व्यक्तिगत अनुमान पर निर्भर थीं।
टेलर ने माना कि कार्य का वैज्ञानिक अध्ययन करके अधिक प्रभावी विधि विकसित की जा सकती है। उनके अनुसार, प्रबंधन को काम करने की विधि निर्धारित करने, कर्मचारियों का उचित चयन करने, प्रशिक्षण देने और कार्य-प्रदर्शन के मानक तय करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। टेलर की प्रमुख पुस्तक The Principles of Scientific Management 1911 में प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने वैज्ञानिक प्रबंध को केवल तकनीकों का समूह नहीं, बल्कि प्रबंधन की एक व्यवस्थित पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया।
वैज्ञानिक प्रबंधन का अर्थ
वैज्ञानिक प्रबंधन का अर्थ है कार्य का व्यवस्थित अध्ययन करके ऐसी विधि निर्धारित करना जिससे समय, श्रम और संसाधनों का बेहतर उपयोग हो तथा कार्य-दक्षता बढ़े। टेलर ने पारंपरिक अनुभव-आधारित कार्य-विधियों के स्थान पर निरीक्षण, मापन, परीक्षण और मानकीकरण पर बल दिया। उनका उद्देश्य था कि काम करने की विधि व्यक्तिगत अनुमान के बजाय व्यवस्थित अध्ययन से निर्धारित हो।
उदाहरण के लिए, किसी सरकारी कार्यालय में आवेदन निस्तारण में देरी हो रही हो, तो प्रत्येक चरण में लगने वाले समय, अनावश्यक प्रक्रियाओं और जिम्मेदारियों का अध्ययन करके सुधार किया जा सकता है। हालाँकि, सरकारी प्रशासन में दक्षता के साथ कानून, समानता, नागरिक अधिकार और उत्तरदायित्व का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
टेलर के वैज्ञानिक प्रबंधन के चार सिद्धांत
1. अनुभव के स्थान पर वैज्ञानिक अध्ययन
टेलर का पहला सिद्धांत था कि कार्य करने की विधि केवल परंपरा या व्यक्तिगत अनुभव से निर्धारित नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक कार्य का व्यवस्थित अध्ययन करके उसकी अधिक प्रभावी विधि विकसित की जानी चाहिए। इसके लिए कार्य को छोटे चरणों में बाँटकर समय, गतिविधियों, उपकरणों और अनावश्यक श्रम का अध्ययन किया जाता है। फिर उपयुक्त विधि को मानक बनाकर कर्मचारियों को उसका प्रशिक्षण दिया जाता है। यह सिद्धांत सरकारी कार्यालयों में भी उपयोगी है। उदाहरण के लिए, प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में अनावश्यक चरणों को हटाकर समय बचाया जा सकता है। लेकिन जटिल प्रशासनिक मामलों में नियमों के साथ विवेकपूर्ण निर्णय भी आवश्यक हैं।
2. कर्मचारियों का वैज्ञानिक चयन एवं प्रशिक्षण
टेलर के अनुसार, कर्मचारी का चयन कार्य की आवश्यकताओं और उसकी योग्यता के आधार पर होना चाहिए। चयन के बाद उसे व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वह कार्य को निर्धारित विधि से कर सके। इस सिद्धांत से स्पष्ट होता है कि कार्य-दक्षता केवल कर्मचारी के प्रयास पर निर्भर नहीं करती। सही चयन, प्रशिक्षण, उपकरण और प्रबंधकीय सहायता भी आवश्यक हैं। लोक प्रशासन में इसका संबंध योग्यता-आधारित भर्ती, प्रशासनिक प्रशिक्षण और कर्मचारियों की कार्य-कुशलता बढ़ाने से है।
3. प्रबंधन एवं कर्मचारियों के बीच सहयोग
टेलर ने प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच सहयोग को महत्त्व दिया। प्रबंधन को केवल आदेश नहीं देने चाहिए, बल्कि कर्मचारियों को आवश्यक निर्देश, प्रशिक्षण और संसाधन भी उपलब्ध कराने चाहिए। टेलर ने श्रमिकों द्वारा जानबूझकर कार्य-गति सीमित रखने की प्रवृत्ति के लिए Soldiering शब्द का प्रयोग किया। उनका मानना था कि वैज्ञानिक कार्य-विधि, उचित प्रोत्साहन और सहयोग से इस समस्या को कम किया जा सकता है। हालाँकि, सहयोग केवल निर्देशों का पालन कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए। कर्मचारियों के सुझाव, अनुभव और भागीदारी भी संगठन की कार्यक्षमता बढ़ा सकते हैं।
4. कार्य एवं उत्तरदायित्व का विभाजन
टेलर के अनुसार, कार्य की योजना बनाने और कार्य को पूरा करने की जिम्मेदारी के बीच स्पष्ट विभाजन होना चाहिए। प्रबंधन को योजना, कार्य-विधि के निर्धारण और प्रशिक्षण की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, जबकि कर्मचारियों को निर्धारित विधि के अनुसार कार्य करना चाहिए। इसे Almost Equal Division of Work and Responsibility कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों पक्षों का कार्यभार ठीक आधा-आधा हो, बल्कि यह है कि प्रबंधन अपनी जिम्मेदारियों को कर्मचारियों पर न डाले। यदि किसी सरकारी कार्यालय में काम समय पर पूरा नहीं होता, तो केवल कर्मचारियों को दोष देने के बजाय कर्मचारियों की संख्या, प्रशिक्षण, तकनीकी सुविधाओं और प्रक्रिया की कमियों की भी जाँच करनी चाहिए।
वैज्ञानिक प्रबंध की प्रमुख तकनीकें
टेलर के सिद्धांतों को लागू करने के लिए कार्य-विश्लेषण, समय-मापन, मानकीकरण और प्रोत्साहन जैसी तकनीकों का उपयोग किया गया। सिद्धांत प्रबंधन की दिशा बताते हैं, जबकि तकनीकें उन्हें व्यवहार में लागू करने के साधन हैं।
1. समय अध्ययन (Time Study)
समय अध्ययन में किसी कार्य को पूरा करने में लगने वाले समय का मापन किया जाता है। इसका उद्देश्य कार्य के लिए उचित समय-मानक निर्धारित करना और अनावश्यक देरी की पहचान करना है। उदाहरण के लिए, सरकारी कार्यालय में आवेदन की जाँच, सत्यापन और अनुमोदन में लगने वाले समय का अध्ययन करके देरी के कारण पहचाने जा सकते हैं।
2. गति अध्ययन (Motion Study)
गति अध्ययन में कार्य करते समय होने वाली गतिविधियों का विश्लेषण किया जाता है, ताकि अनावश्यक गतिविधियों को हटाकर काम अधिक सरल बनाया जा सके।
महत्त्वपूर्ण तथ्य: गति अध्ययन के विकास में फ्रैंक गिलब्रेथ और लिलियन गिलब्रेथ का विशेष योगदान था। इसलिए गति अध्ययन की सभी तकनीकों का श्रेय केवल टेलर को देना सही नहीं है।
3. मानकीकरण (Standardization)
मानकीकरण का अर्थ कार्य-विधि, उपकरणों, प्रक्रियाओं और अपेक्षित परिणामों के लिए निश्चित मानक निर्धारित करना है। इससे कार्य में अनावश्यक विविधता कम होती है और प्रदर्शन का मूल्यांकन आसान बनता है।
लोक प्रशासन में मानकीकृत आवेदन-प्रपत्र, सेवा-प्रक्रियाएँ और समय-सीमाएँ इसके उदाहरण हैं। हालाँकि, विशेष परिस्थितियों और कानूनी अपवादों के लिए उचित व्यवस्था आवश्यक है।
4. विभेदात्मक कार्य-दर प्रणाली (Differential Piece-Rate System)
टेलर ने कार्य-मानक के अनुसार अलग-अलग भुगतान-दर देने की व्यवस्था का समर्थन किया। निर्धारित मानक पूरा करने या उससे बेहतर प्रदर्शन करने वाले श्रमिक को अधिक दर तथा कम प्रदर्शन करने वाले को कम दर दी जा सकती थी। इसका उद्देश्य आर्थिक प्रोत्साहन द्वारा उत्पादकता बढ़ाना था। इसकी सीमा यह है कि केवल कार्य की मात्रा पर जोर देने से गुणवत्ता, सुरक्षा और कर्मचारी-कल्याण की उपेक्षा हो सकती है।
5. कार्यात्मक फोरमैनशिप (Functional Foremanship)
टेलर ने पर्यवेक्षण के कार्य को विशेषज्ञता के आधार पर विभाजित करने का सुझाव दिया। इसमें अलग-अलग पर्यवेक्षक योजना, कार्य की गति, गुणवत्ता और तकनीकी निर्देशन जैसे क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे विशेषज्ञता बढ़ सकती है, लेकिन एक कर्मचारी को अनेक पर्यवेक्षकों से निर्देश मिलने पर भ्रम भी उत्पन्न हो सकता है।
टेलर की प्रबंध-दृष्टि
टेलर का मानना था कि वैज्ञानिक विधियों से उत्पादकता बढ़ाकर संगठन और श्रमिकों, दोनों को लाभ पहुँचाया जा सकता है। कार्य की बर्बादी कम होने और उत्पादन बढ़ने से बेहतर पारिश्रमिक तथा संगठनात्मक लाभ की संभावना उत्पन्न हो सकती है। लेकिन उत्पादकता बढ़ने से लाभ का न्यायपूर्ण वितरण अपने आप सुनिश्चित नहीं होता। लाभ किसे और कितना मिलेगा, यह वेतन-नीति, संगठन की शक्ति-संरचना और श्रमिकों की सौदेबाजी की क्षमता पर भी निर्भर करता है। इसलिए दक्षता और न्यायपूर्ण वितरण अलग-अलग, लेकिन परस्पर संबंधित प्रश्न हैं। लोक प्रशासन में भी लागत और समय घटाने के साथ नागरिकों को निष्पक्ष एवं गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ देना आवश्यक है।
लोक प्रशासन के विकास में वैज्ञानिक प्रबंध का स्थान
टेलर का वैज्ञानिक प्रबंध औद्योगिक संगठनों में विकसित हुआ, लेकिन इसके विचारों ने प्रशासन को व्यवस्थित और दक्ष बनाने संबंधी चर्चाओं को प्रभावित किया।
1. वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson)
वुडरो विल्सन ने 1887 में The Study of Administration नामक निबंध प्रकाशित किया। उन्होंने लोक प्रशासन के व्यवस्थित अध्ययन को महत्त्व दिया। उनका कार्य टेलर की 1911 की पुस्तक से पहले प्रकाशित हुआ था। इसलिए दोनों को प्रशासन के व्यवस्थित अध्ययन की व्यापक प्रवृत्ति से जोड़ना उचित है, न कि एक को दूसरे का प्रत्यक्ष परिणाम मानना।
2. एफ. डब्ल्यू. टेलर (F. W. Taylor)
टेलर ने कार्य-विधि, समय और गति के अध्ययन, कर्मचारी-चयन, प्रशिक्षण तथा कार्य-मानकों पर जोर दिया। उनका मुख्य ध्यान कार्यस्थल पर दक्षता बढ़ाने पर था।
3. हेनरी फेयोल (Henri Fayol)
फेयोल ने संगठन के व्यापक प्रबंधन और प्रशासनिक सिद्धांतों का अध्ययन किया। उनकी पुस्तक Administration industrielle et générale 1916 में प्रकाशित हुई। इसका अंग्रेजी अनुवाद General and Industrial Management के नाम से प्रसिद्ध है।
टेलर और फेयोल में मुख्य अंतर यह है कि टेलर ने कार्य-प्रक्रिया और श्रम-दक्षता पर जोर दिया, जबकि फेयोल ने प्रबंध के सामान्य कार्यों और संगठन के संचालन पर ध्यान केंद्रित किया।
4. लूथर गुलिक (Luther Gulick)
गुलिक ने 1937 में प्रकाशित Papers on the Science of Administration में प्रशासनिक चिंतन के विकास में योगदान दिया। उनसे संबंधित प्रसिद्ध अवधारणा POSDCORB है, जिसमें प्रशासनिक कार्यों को सात भागों में समझाया गया है:-
- P — Planning: नियोजन
- O — Organizing: संगठन
- S — Staffing: कर्मचारी व्यवस्था
- D — Directing: निर्देशन
- CO — Coordinating: समन्वय
- R — Reporting: प्रतिवेदन
- B — Budgeting: बजट निर्माण
POSDCORB को टेलर के सिद्धांतों का दूसरा नाम नहीं मानना चाहिए। टेलर का मुख्य जोर कार्य-विधि और श्रम-दक्षता पर था, जबकि गुलिक ने प्रशासनिक कार्यों का वर्गीकरण किया।
5. कालक्रम का सार
- 1887 – वुडरो विल्सन – The Study of Administration — लोक प्रशासन के व्यवस्थित अध्ययन पर जोर।
- 1911 – एफ. डब्ल्यू. टेलर – The Principles of Scientific Management — कार्य-दक्षता और वैज्ञानिक कार्य-विधि।
- 1916 – हेनरी फेयोल – Administration industrielle et générale — सामान्य प्रबंध एवं प्रशासनिक सिद्धांत।
- 1937 – लूथर गुलिक और लिंडल उर्विक – Papers on the Science of Administration — शास्त्रीय प्रशासनिक चिंतन; गुलिक का POSDCORB।
यह कालक्रम प्रशासन को व्यवस्थित अध्ययन का विषय बनाने, कार्य-दक्षता बढ़ाने और प्रशासनिक कार्यों को वर्गीकृत करने के बीच अंतर स्पष्ट करता है।
वैज्ञानिक प्रबंधन की आलोचनाएँ
वैज्ञानिक प्रबंध ने कार्य-दक्षता के अध्ययन को व्यवस्थित बनाया, लेकिन इसकी कुछ महत्त्वपूर्ण सीमाएँ भी हैं।
1. मानवीय पक्ष की उपेक्षा
वैज्ञानिक प्रबंधन में कार्य-मानकों, समय, गति और उत्पादकता पर अधिक जोर दिया गया। इससे कर्मचारियों की भावनाओं, सामाजिक संबंधों, मनोबल और कार्य-संतुष्टि को अपेक्षाकृत कम महत्त्व मिलने की संभावना रही। एल्टन मेयो (Elton Mayo) से संबंधित मानव संबंध दृष्टिकोण (Human Relations Approach) ने संगठन में सामाजिक संबंधों, समूह-व्यवहार और मनोबल के महत्त्व को सामने रखा। इससे स्पष्ट हुआ कि कार्य-दक्षता को केवल तकनीकी विधियों और आर्थिक प्रोत्साहन से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
2. कर्मचारी का यंत्रीकरण
कार्य को छोटे-छोटे चरणों में बाँटने और निर्धारित गति से करने पर जोर देने से काम एकरस हो सकता है। यदि कर्मचारियों को कार्य-विधि तय करने में कोई भूमिका न मिले, तो उनकी स्वायत्तता और पहल करने की क्षमता सीमित हो सकती है। हालाँकि, मानकीकरण हमेशा नकारात्मक नहीं होता। उचित मानक काम को सरल बना सकते हैं और अनावश्यक श्रम कम कर सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब मानकों को कर्मचारियों की वास्तविक परिस्थितियों की उपेक्षा करके लागू किया जाता है।
3. आर्थिक प्रोत्साहन की सीमाएँ
टेलर ने आर्थिक प्रोत्साहन को उत्पादकता बढ़ाने का महत्त्वपूर्ण साधन माना। लेकिन कर्मचारी केवल धन से प्रेरित नहीं होते। सम्मान, नौकरी की सुरक्षा, पदोन्नति, सामाजिक संबंध और निर्णयों में भागीदारी भी महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए आर्थिक प्रोत्साहन उपयोगी है, लेकिन उसे मानव प्रेरणा की संपूर्ण व्याख्या नहीं माना जा सकता।
4. मात्रा पर अत्यधिक जोर
यदि किसी संगठन में सफलता का माप केवल कार्य की मात्रा हो, तो गुणवत्ता और निष्पक्षता की उपेक्षा हो सकती है। उदाहरण के लिए, सरकारी कर्मचारियों का मूल्यांकन केवल निपटाई गई फाइलों की संख्या से करने पर जटिल मामलों की उचित जाँच प्रभावित हो सकती है। इसलिए प्रशासनिक मूल्यांकन में मात्रा के साथ गुणवत्ता, नागरिक-संतुष्टि और वास्तविक परिणामों को भी शामिल करना चाहिए।
5. सार्वभौमिकता की सीमा
टेलर की कार्य-विधियाँ दोहरावपूर्ण और मापे जा सकने वाले कार्यों में अधिक उपयोगी हैं। लेकिन नीति-निर्माण, आपदा प्रबंधन और सामाजिक विवादों जैसे क्षेत्रों में परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना आवश्यक होता है। अतः हर प्रशासनिक समस्या का समाधान एक निश्चित वैज्ञानिक कार्य-विधि से नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिक प्रबंधन और मानव संबंध दृष्टिकोण में अंतर
वैज्ञानिक प्रबंधन
- प्रमुख विचारक – एफ. डब्ल्यू. टेलर
- मुख्य जोर – कार्य-दक्षता और उत्पादकता
- प्रमुख उपाय – समय अध्ययन, मानकीकरण, प्रशिक्षण
- कर्मचारी की भूमिका – निर्धारित कार्य-विधि के अनुसार कार्य
- प्रमुख सीमा – मानवीय पक्ष की अपर्याप्त व्याख्या
मानव संबंध दृष्टिकोण
- प्रमुख विचारक – एल्टन मेयो प्रमुख प्रतिनिधि
- मुख्य जोर – सामाजिक संबंध और मनोबल
- प्रमुख उपाय – समूह-व्यवहार, संवाद और नेतृत्व
- कर्मचारी की भूमिका – सामाजिक संबंधों और समूहों से प्रभावित व्यक्ति
- प्रमुख सीमा – सामाजिक कारकों पर जोर के बावजूद सभी संगठनात्मक समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं
निष्कर्ष: वैज्ञानिक प्रबंध और मानव संबंध दृष्टिकोण को पूरी तरह विरोधी मानना उचित नहीं है। प्रभावी संगठन के लिए कार्य-प्रक्रिया की दक्षता और कर्मचारियों के मानवीय पक्ष, दोनों महत्त्वपूर्ण हैं।
भारतीय लोक प्रशासन में प्रासंगिकता
भारत में वैज्ञानिक प्रबंधन के कुछ सिद्धांत प्रशासनिक सुधार में उपयोगी हैं। कार्य-प्रक्रिया का विश्लेषण, कर्मचारियों का प्रशिक्षण, स्पष्ट जिम्मेदारियाँ, मानकीकृत प्रक्रियाएँ और समयबद्ध सेवा-प्रदान सरकारी कार्यालयों की कार्यक्षमता बढ़ा सकते हैं। उदाहरण के लिए, प्रमाणपत्र जारी करने या पेंशन आवेदन के निस्तारण में अनावश्यक चरणों को कम करके नागरिकों को समय पर सेवा दी जा सकती है। डिजिटल प्रशासन में कार्य-प्रवाह का विश्लेषण और सेवा-समय का मूल्यांकन भी उपयोगी हो सकता है। लेकिन भारतीय लोक प्रशासन का उद्देश्य केवल कम लागत में अधिक काम करना नहीं है। प्रशासन को संविधान, कानून, समानता, नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के अनुरूप कार्य करना चाहिए। इसलिए दक्षता को न्याय और जनहित के साथ संतुलित करना आवश्यक है।
समकालीन प्रासंगिकता
आधुनिक संगठनों में कार्य-प्रक्रिया विश्लेषण, प्रदर्शन-मूल्यांकन, मानक संचालन प्रक्रियाएँ और डिजिटल कार्य-प्रवाह जैसी व्यवस्थाएँ वैज्ञानिक प्रबंध के कुछ मूल विचारों से मेल खाती हैं। फिर भी हर आधुनिक प्रबंध तकनीक को टेलर का प्रत्यक्ष योगदान नहीं माना जा सकता। उनका स्थायी योगदान यह है कि उन्होंने कार्य-विधि के व्यवस्थित अध्ययन और मापन को प्रबंधन का महत्त्वपूर्ण आधार बनाया। आज प्रशासनिक दक्षता का मूल्यांकन केवल कार्य की मात्रा से नहीं, बल्कि गुणवत्ता, निष्पक्षता, समयबद्धता और नागरिकों को मिलने वाले वास्तविक लाभ से भी किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
एफ. डब्ल्यू. टेलर का वैज्ञानिक प्रबंधन सिद्धांत शास्त्रीय प्रबंध चिंतन का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसने कार्य के वैज्ञानिक अध्ययन, समय एवं गति के विश्लेषण, मानकीकरण, कर्मचारी-चयन, प्रशिक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी पर जोर दिया। इसकी प्रमुख सीमा यह है कि कार्य-दक्षता पर अत्यधिक जोर देने से मानवीय संबंधों, कर्मचारी-स्वायत्तता और कार्य की गुणवत्ता की उपेक्षा हो सकती है। मानव संबंध दृष्टिकोण ने संगठन के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों को महत्त्व देकर इस समझ का विस्तार किया। इसलिए वैज्ञानिक प्रबंध लोक प्रशासन में दक्षता बढ़ाने का उपयोगी आधार है, लेकिन इसका प्रयोग संवैधानिक मूल्यों, मानवीय आवश्यकताओं और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के साथ किया जाना चाहिए।
परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य
- प्रमुख विचारक: एफ. डब्ल्यू. टेलर (1856–1915)।
- प्रमुख पुस्तक: The Principles of Scientific Management (1911)।
- चार सिद्धांत: वैज्ञानिक कार्य-विधि, वैज्ञानिक चयन एवं प्रशिक्षण, प्रबंधन-कर्मचारी सहयोग, कार्य एवं उत्तरदायित्व का विभाजन।
- प्रमुख तकनीकें: समय अध्ययन, गति अध्ययन, मानकीकरण, विभेदात्मक कार्य-दर प्रणाली और कार्यात्मक फोरमैनशिप।
- गति अध्ययन: फ्रैंक और लिलियन गिलब्रेथ का विशेष योगदान।
- वुडरो विल्सन: The Study of Administration (1887)।
- हेनरी फेयोल: सामान्य प्रबंध एवं प्रशासनिक सिद्धांत; उनकी मूल फ्रांसीसी कृति 1916 में प्रकाशित हुई।
- लूथर गुलिक: POSDCORB।
- मानव संबंध दृष्टिकोण: एल्टन मेयो से संबंधित; संगठन में सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक कारकों पर जोर।
- प्रमुख आलोचना: मानवीय पक्ष की अपर्याप्त व्याख्या, कार्य की एकरसता और मात्रा-केंद्रित मूल्यांकन।
- लोक प्रशासन में उपयोगिता: कार्य-प्रक्रिया सुधार, प्रशिक्षण, मानकीकरण और समयबद्ध सेवा-प्रदान।
पुस्तकें –
- Frederick Winslow Taylor, — The Principles of Scientific Management (1911)। मूल पुस्तक — Project Gutenberg
- Luther Gulick, and Lyndall Urwick, — Papers on the Science of Administration (1937)।
- Woodrow Wilson, — “The Study of Administration” (1887)।
- Henri Fayol, — Administration industrielle et générale (1916)।
- Elton Mayo, — The Human Problems of an Industrial Civilization (1933)।
इन्हें भी पढ़े –
नवीन लोक प्रशासन का विकास (Evolution of New Public Administration)
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