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Non-Alignment से Multi-Alignment तक भारत की विदेश नीति

Non-Alignment से Multi-Alignment तक भारत की विदेश नीति का geopolitical illustration

Non-Alignment से Multi-Alignment तक भारत की विदेश नीति: गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक स्वायत्तता तक का सफर

Introduction

क्या भारत अब किसी एक खेमे में है? कल्पना कीजिए कि दुनिया में दो बड़े शक्ति-केंद्र हैं। एक देश अमेरिका के नेतृत्व वाले खेमे में है और दूसरा सोवियत संघ के नेतृत्व वाले खेमे में। ऐसे समय में एक नया-नया स्वतंत्र हुआ देश कहता है “हम किसी गुट का हिस्सा नहीं बनेंगे। हम हर मुद्दे पर अपने हित और अपने विवेक के आधार पर फैसला करेंगे।” स्वतंत्र भारत ने शीत युद्ध के दौर में लगभग यही रास्ता चुना। इसे गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) कहा गया।

लेकिन दुनिया बदल गई। 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और शीत युद्ध समाप्त हो गया। इसके बाद भारत के सामने पुराना सवाल नहीं रहा कि अमेरिका के साथ जाए या सोवियत संघ के साथ। अब सवाल यह था कि बदलती और तेजी से बहुध्रुवीय होती दुनिया में भारत अपने राष्ट्रीय हित, सुरक्षा, आर्थिक विकास और रणनीतिक स्वतंत्रता को कैसे सुरक्षित रखे? इसी बदलती परिस्थिति में भारतीय विदेश नीति में Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता और आगे चलकर Multi-Alignment यानी बहु-संरेखण/बहु-समायोजन जैसे विचार अधिक महत्वपूर्ण हुए।

आज भारत एक तरफ अमेरिका और Quad के साथ सहयोग करता है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ अपने पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखता है। भारत BRICS और SCO जैसे मंचों में भी सक्रिय है और साथ ही यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ASEAN तथा पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी अपने संबंध मजबूत करता है। इसलिए भारत की विदेश नीति को केवल “किसी एक खेमे में जाना” समझना गलत होगा। अधिक सही समझ यह है कि भारत अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग देशों के साथ सहयोग करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हित को बनाए रखने का प्रयास करता है। भारतीय विदेश मंत्रालय भी Non-Alignment, multilateralism, peaceful coexistence और strategic decision-making autonomy को भारतीय विदेश नीति की व्यापक परंपरा से जोड़ता है।

गुटनिरपेक्षता की परिभाषा

Non-Alignment का अर्थ यह नहीं था कि भारत दुनिया से अलग रहेगा या किसी देश से संबंध नहीं रखेगा। इसका मूल विचार था कि भारत किसी सैन्य या शक्ति-गुट का स्थायी सदस्य बने बिना अपनी विदेश नीति के फैसले स्वतंत्र रूप से करेगा। शीत युद्ध के दौरान दुनिया मुख्यतः दो शक्ति-गुटों में विभाजित थी। पहला अमेरिका और उसके सहयोगी और दूसरा सोवियत संघ और उसके सहयोगी। नवस्वतंत्र एशियाई और अफ्रीकी देशों के सामने चुनौती थी कि वे इन दोनों शक्ति-केंद्रों में से किसी एक के साथ जाएँ या अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखें। भारत ने दूसरा रास्ता चुना।

भारत ने Non-Alignment क्यों अपनाया?

भारत की गुटनिरपेक्षता अचानक पैदा हुई नीति नहीं थी। इसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन का अनुभव, औपनिवेशिक विरोध, शांति की आवश्यकता और राष्ट्रीय हित जैसे कई कारण थे।

1 औपनिवेशिक अनुभव

भारत लंबे समय तक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन रहा। इसलिए स्वतंत्र भारत की विदेश नीति में Anti-Colonialism यानी उपनिवेशवाद-विरोधी भावना महत्वपूर्ण रही। भारत केवल अपनी स्वतंत्रता नहीं चाहता था, बल्कि एशिया और अफ्रीका के अन्य देशों की स्वतंत्रता का भी समर्थन करता था।

2 किसी महाशक्ति पर निर्भरता से बचना

1947 में स्वतंत्रता के समय भारत आर्थिक और सैन्य रूप से बहुत मजबूत नहीं था। यदि भारत किसी एक महाशक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ जाता, तो उसकी विदेश नीति पर उस शक्ति का प्रभाव बढ़ सकता था। इसलिए स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता भारत के लिए महत्वपूर्ण थी।

3 विकास प्राथमिकता थी

भारत के सामने गरीबी, बेरोजगारी, औद्योगीकरण और विकास जैसी बड़ी समस्याएँ थीं। उसे युद्ध या शक्ति-संघर्ष की बजाय विकास पर ध्यान देना था। इसलिए भारत को ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहिए थी जिसमें वह विभिन्न देशों से आर्थिक, तकनीकी और औद्योगिक सहयोग ले सके।

4 शांति और सह-अस्तित्व

भारत ने Panchsheel और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे सिद्धांतों पर जोर दिया। भारतीय विदेश नीति में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, बहुपक्षवाद और विकासशील देशों के सहयोग जैसे तत्व लंबे समय से मौजूद रहे हैं।

Bandung से NAM तक: गुटनिरपेक्ष आंदोलन की पृष्ठभूमि

1955 का Bandung Conference एशिया-अफ्रीका एकजुटता और आगे चलकर Non-Aligned Movement के विकास में महत्वपूर्ण पड़ाव था। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस प्रक्रिया के प्रमुख नेताओं में थे। Bandung ने उपनिवेशवाद-विरोध, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और स्वतंत्र विदेश नीति की सोच को मजबूत किया। भारत के विदेश मंत्रालय के ऐतिहासिक दस्तावेज भी Bandung Conference को Non-Alignment के विकास से जोड़ते हैं। 1961 में Belgrade Conference के साथ Non-Aligned Movement को संस्थागत रूप मिला।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। Non-Alignment का अर्थ Neutrality नहीं था Neutrality का सामान्य अर्थ किसी युद्ध या संघर्ष में पक्ष न लेना हो सकता है। लेकिन Non-Alignment इससे व्यापक राजनीतिक अवधारणा थी। गुटनिरपेक्ष देश अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय रख सकते थे और औपनिवेशिकता, नस्लवाद, निरस्त्रीकरण और विकास जैसे मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभा सकते थे। इसलिए Non-Alignment को केवल “तटस्थ रहना” कहना अधूरा होगा।

क्या भारत हमेशा दोनों महाशक्तियों से समान दूरी पर रहा?

यहाँ एक महत्वपूर्ण conceptual point है। Non-Alignment का अर्थ यह नहीं था कि भारत हर समय अमेरिका और सोवियत संघ से समान दूरी बनाए रखता था। भारत ने अलग-अलग समय में अपने राष्ट्रीय हित के अनुसार दोनों से संबंध बनाए। उदाहरण के लिए भारत ने सोवियत संघ के साथ रक्षा, औद्योगिक और तकनीकी सहयोग विकसित किया। दूसरी तरफ पश्चिमी देशों के साथ भी भारत के संबंध बने रहे।
1971 की India-Soviet Treaty of Peace, Friendship and Cooperation इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। उस संधि में भी सोवियत संघ ने भारत की Non-Alignment नीति को मान्यता दी थी। इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है कि भारत की Non-Alignment नीति विचारधारा से अधिक राष्ट्रीय हित और रणनीतिक स्वतंत्रता से जुड़ी थी।

1991: वह मोड़ जिसने भारतीय विदेश नीति बदल दी

1991 भारतीय विदेश नीति के इतिहास में निर्णायक वर्ष था। सोवियत संघ का विघटन हुआ और Cold War समाप्त हो गया। अब वह द्विध्रुवीय दुनिया नहीं रही जिसमें भारत को दो महाशक्तियों के बीच अपनी जगह बनानी थी। साथ ही भारत को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई।
इसका विदेश नीति पर भी प्रभाव पड़ा। भारत ने अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, जापान और अन्य आर्थिक शक्तियों के साथ अपने संबंधों को अधिक व्यापक बनाया।भारतीय विदेश मंत्रालय स्वयं स्वीकार करता है कि Cold War के अंत और सोवियत संघ के विघटन ने भारत को अपनी विदेश नीति का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित किया और इससे अमेरिका, पश्चिमी यूरोप तथा जापान जैसे देशों के साथ संबंधों को विस्तार देने की नई संभावनाएँ खुलीं।

Non-Alignment से Strategic Autonomy तक

1991 के बाद धीरे-धीरे Strategic Autonomy की अवधारणा अधिक महत्वपूर्ण हुई।

  • Strategic Autonomy क्या है? सरल भाषा में, किसी दूसरे देश के दबाव में आए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विदेश नीति और रणनीतिक फैसले लेने की क्षमता को Strategic Autonomy कहा जा सकता है।
  • इसमें तीन बातें महत्वपूर्ण हैं, पहली स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता, दूसरी किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचना और तीसरी अपने राष्ट्रीय हित के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ सहयोग करना। इस दृष्टि से Strategic Autonomy को Non-Alignment का बिल्कुल नया और पूरी तरह अलग सिद्धांत मानना उचित नहीं होगा।
  • इसे बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में Non-Alignment की मूल भावना—स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता—के आधुनिक रूप के रूप में समझा जा सकता है। MP-IDSA के विश्लेषण में भी Strategic Autonomy को Non-Alignment के बाद विकसित हुई ऐसी अवधारणा के रूप में देखा गया है जो रणनीतिक निर्णयों में स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने पर केंद्रित है।

Multi-Alignment की परिभाषा

Multi-Alignment का अर्थ है एक ही समय में अलग-अलग देशों और समूहों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध और सहयोग बनाए रखना, बिना किसी एक शक्ति-केंद्र पर पूरी तरह निर्भर हुए। इसे एक रोजमर्रा के उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी विद्यार्थी के तीन मित्र हैं, एक पढ़ाई में बहुत अच्छा है। दूसरा खेल में अच्छा है। तीसरा तकनीक में अच्छा है। विद्यार्थी केवल इसलिए एक मित्र को नहीं चुनता कि बाकी दोनों उसके मित्र हैं। वह आवश्यकता के अनुसार तीनों से सहयोग लेता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी कुछ हद तक यही तर्क काम करता है। भारत अलग-अलग देशों के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग करता है।

Multi-Alignment का सबसे बड़ा आधार: Issue-Based Partnerships

आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संबंध हमेशा “दोस्त या दुश्मन” के आधार पर नहीं चलते। एक देश किसी मुद्दे पर आपका partner हो सकता है और दूसरे मुद्दे पर competitor। इसीलिए भारत की विदेश नीति में Issue-Based Alignment महत्वपूर्ण दिखाई देता है। उदाहरण के लिए किस क्षेत्र में भारत के लिए प्रमुख साझेदार कौन है यह निम्न प्रकार है –

  1. रक्षा एवं सुरक्षा – अमेरिका, रूस, फ्रांस, इज़राइल आदि
  2. ऊर्जा – रूस, पश्चिम एशिया, अमेरिका आदि
  3. Indo-Pacific – अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ASEAN
  4. Global South – BRICS, G20, विकासशील देश
  5. Eurasia – रूस, Central Asia, SCO
  6. व्यापार एवं तकनीक – अमेरिका, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया आदि
  7. बहुपक्षीय मंच – UN, BRICS, SCO, G20 आदि

यह सूची किसी स्थायी “गुट” को नहीं दर्शाती। यह बताती है कि भारत अलग-अलग राष्ट्रीय हितों के लिए अलग-अलग साझेदारियों का इस्तेमाल करता है।

भारत एक साथ अमेरिका और रूस के करीब कैसे रह सकता है?

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। यदि अमेरिका और रूस के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है तो भारत दोनों के साथ संबंध कैसे रख सकता है? इसका उत्तर Strategic Autonomy + National Interest है। भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक, Indo-Pacific और आर्थिक सहयोग बढ़ा सकता है। उसी समय रूस के साथ ऊर्जा, रक्षा और अन्य रणनीतिक संबंध बनाए रख सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अमेरिका या रूस की हर नीति का समर्थन करता है। इसका अर्थ यह है कि भारत अपने संबंधों को किसी एक देश के साथ पूर्ण राजनीतिक संरेखण में बदलने से बचाने का प्रयास करता है। यही Multi-Alignment की केंद्रीय भावना है।

Quad और Multi-Alignment

Quad यानी India, United States, Japan और Australia का समूह Indo-Pacific में महत्वपूर्ण मंच है। भारत Quad के माध्यम से maritime security, connectivity, technology, critical and emerging technologies तथा Indo-Pacific cooperation जैसे मुद्दों पर काम करता है। लेकिन भारत का Quad में होना अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि भारत किसी सैन्य गठबंधन का सदस्य बन गया है। (यही अंतर समझना जरूरी है Partnership ≠ Alliance)। भारत किसी देश या समूह के साथ रणनीतिक साझेदारी कर सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति छोड़ दे। MEA की multilateral relations listing में Quad, BRICS, SCO, BIMSTEC और अन्य अनेक क्षेत्रीय एवं वैश्विक मंचों के साथ भारत की भागीदारी दर्ज है।

BRICS और Multi-Alignment

दूसरी तरफ भारत BRICS में भी सक्रिय है। यहाँ दिलचस्प स्थिति दिखाई देती है। भारत एक ऐसे मंच पर अमेरिका का हिस्सा नहीं है जिसमें रूस और चीन जैसे देश शामिल हैं, जबकि दूसरी ओर भारत अमेरिका के साथ Quad में भी सहयोग करता है। इसे विरोधाभास की तरह देखने के बजाय multi-aligned foreign policy के उदाहरण के रूप में समझना अधिक उपयोगी है। भारत BRICS के माध्यम से Global South, आर्थिक सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर काम कर सकता है। वहीं दूसरी तरफ Quad के माध्यम से Indo-Pacific से जुड़े रणनीतिक मुद्दों पर सहयोग कर सकता है। अर्थात, एक मंच का सदस्य होना दूसरे मंच के साथ सहयोग को स्वतः समाप्त नहीं करता। 2026 में BRICS से जुड़े आधिकारिक और अकादमिक विमर्श में भी बहु-संरेखित वैश्विक व्यवस्था (multi-aligned order) की चर्चा दिखाई देती है।

SCO: एक और महत्वपूर्ण उदाहरण

भारत Shanghai Cooperation Organisation (SCO) में भी भाग लेता है। SCO में चीन और रूस जैसे महत्वपूर्ण शक्ति-केंद्र भी हैं। यदि भारत की विदेश नीति केवल “पश्चिम के साथ alignment” होती तो SCO में भारत की सक्रियता को समझाना मुश्किल होता। इसी तरह यदि भारत केवल रूस-चीन केंद्रित विदेश नीति अपनाता, तो Quad, Indo-Pacific और अमेरिका के साथ बढ़ते संबंधों को समझाना मुश्किल होता। इसलिए भारत की विदेश नीति को निम्न शब्दों में समझ सकते है, “एक देश के साथ संबंध” नहीं, बल्कि “संबंधों का पूरा network” देखें।

पश्चिम एशिया: Multi-Alignment का सबसे अच्छा उदाहरण

भारत की Multi-Alignment को समझने के लिए पश्चिम एशिया अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत के संबंध Israel, Iran, UAE, Saudi Arabia, Qatar, अन्य Gulf देशों से अलग-अलग स्तर पर हैं। यहाँ भारत के हित बहुत व्यापक हैं जैसे ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय प्रवासी, व्यापार, निवेश, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद, connectivity, रणनीतिक साझेदारी आदि। इसलिए भारत को पश्चिम एशिया में किसी एक पक्ष के साथ पूर्ण रूप से जुड़ने की बजाय कई देशों के साथ संबंध बनाए रखने की आवश्यकता होती है। 2026 के विश्लेषणों में भी पश्चिम एशिया में भारत की नीति को calibrated multi-alignment के रूप में वर्णित किया गया है। विशेषकर अमेरिका, ईरान, Gulf देशों और Israel के साथ समानांतर संबंधों के संदर्भ में।

Multi-Alignment का अर्थ “सबसे दोस्ती” नहीं है

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण भ्रम दूर करना जरूरी है। Multi-Alignment का अर्थ यह नहीं है कि भारत हर देश का दोस्त बनना चाहता है। International Relations में National Interest सबसे महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है। यदि किसी देश की कोई नीति भारत के हितों के विरुद्ध है तो भारत उसका विरोध कर सकता है। इसलिए Multi-Alignment को इस प्रकार समझें, “हर देश से दोस्ती” नहीं, बल्कि “हर महत्वपूर्ण शक्ति के साथ अपने हित के अनुसार संबंध।” यही distinction परीक्षा में भी बहुत उपयोगी है।

भारत की विदेश नीति में China Factor

भारत की Multi-Alignment को चीन के संदर्भ के बिना समझना अधूरा होगा। चीन भारत के लिए एक आर्थिक साझेदार, पड़ोसी, क्षेत्रीय competitor, सीमा विवाद से जुड़ा देश, Indo-Pacific में strategic competitor इन सभी भूमिकाओं में दिखाई देता है। इसलिए भारत चीन के साथ संवाद और आर्थिक संबंधों को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, लेकिन दूसरी तरफ अपनी सुरक्षा और strategic partnerships को भी मजबूत करता है। यही कारण है कि भारत, Quad में सहयोग करता है, Indo-Pacific पर जोर देता है, अमेरिका और जापान के साथ संबंध बढ़ाता है, लेकिन BRICS और SCO जैसे मंचों पर चीन के साथ भी बैठता है। यह Multi-Alignment की जटिलता को दिखाता है।

रूस क्यों अभी भी महत्वपूर्ण है?

भारत-रूस संबंधों की जड़ें Cold War काल तक जाती हैं। रक्षा सहयोग इसका प्रमुख आधार रहा है। इसके अलावा ऊर्जा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग भी महत्वपूर्ण हैं। आज भारत के अमेरिका के साथ बढ़ते संबंधों के बावजूद रूस के साथ संबंध समाप्त नहीं हुए हैं। यही बात Multi-Alignment को समझने में महत्वपूर्ण है। भारत किसी एक देश के साथ बढ़ते संबंधों को दूसरे पुराने संबंधों को समाप्त करने का कारण नहीं मानता।

Strategic Autonomy और Multi-Alignment में अंतर

दोनों शब्द एक-दूसरे से जुड़े हैं, लेकिन समान नहीं हैं।

Strategic Autonomy

मुख्य अर्थ – स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता
मुख्य लक्ष्य – Policy freedom
जोर – स्वतंत्रता
प्रकृति – रणनीतिक सिद्धांत
आधार – National Interest
संबंध – किसी एक शक्ति पर निर्भरता से बचना

Multi-Alignment

मुख्य अर्थ – अनेक देशों/समूहों से समानांतर सहयोग
मुख्य लक्ष्य – Multiple partnerships
जोर – विविध संबंध
प्रकृति – विदेश नीति का व्यवहार/approach
आधार – Issue-based cooperation
संबंध – अलग-अलग शक्तियों के साथ काम करना

आसान भाषा में Strategic Autonomy = फैसला अपना। तथा Multi-Alignment = साझेदार कई। और दोनों का संबंध इस तरह समझें, भारत कई देशों के साथ साझेदारी इसलिए करता है ताकि वह किसी एक देश पर निर्भर हुए बिना अपने फैसले स्वयं ले सके।

क्या Multi-Alignment, Non-Alignment का नया रूप है?

इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह “हाँ” या “नहीं” में देना उचित नहीं होगा।कुछ विद्वानों के अनुसार Multi-Alignment को Non-Alignment की बदलती परिस्थितियों में विकसित हुई नई अभिव्यक्ति माना जा सकता है।इस दृष्टिकोण में दोनों के बीच मुख्य समानता Strategic independence है। दूसरे विद्वानों के अनुसार Cold War के समय की Non-Alignment और आज की Multi-Alignment को एक ही चीज नहीं माना जा सकता।

क्योंकि आज की दुनिया Cold War जैसी द्विध्रुवीय नहीं है। आज – अनेक शक्ति-केंद्र हैं।, आर्थिक interdependence अधिक है।, technology geopolitics महत्वपूर्ण है।, supply chains रणनीतिक मुद्दा हैं।, regional organisations की भूमिका बढ़ी है।, non-state actors और global challenges भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए Multi-Alignment आधुनिक multipolar world की आवश्यकता के अनुरूप एक अलग policy approach है। MP-IDSA के विश्लेषण में भी यह तर्क मिलता है कि आज Strategic Autonomy और issue-based multi-alignment केवल भारत तक सीमित अवधारणाएँ नहीं हैं; अनेक देश बदलती वैश्विक व्यवस्था में अपनी strategic space सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं।

Multi-Alignment के पीछे भारत के प्रमुख राष्ट्रीय हित

1 सुरक्षा

भारत को एक साथ अनेक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए विभिन्न देशों के साथ defence और intelligence cooperation उपयोगी है।

2 ऊर्जा सुरक्षा

भारत की बड़ी आबादी और बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति आवश्यक है। इसलिए भारत को अलग-अलग energy partners की आवश्यकता है।

3 Technology

AI, semiconductor, space, cyber security और critical technologies आज राष्ट्रीय शक्ति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। भारत इन क्षेत्रों में अलग-अलग देशों के साथ सहयोग करता है।

4 Trade और Investment

भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए वैश्विक व्यापार और निवेश आवश्यक हैं। इसलिए विदेश नीति और economic diplomacy एक-दूसरे से जुड़ गए हैं।

5 Global South

भारत विकासशील देशों के साथ अपनी भूमिका को भी मजबूत करना चाहता है। भारत की development partnership और capacity-building initiatives कई देशों तक पहुँची हैं। MEA के अनुसार भारतीय development cooperation में Lines of Credit, ITEC training, experts, projects और humanitarian assistance जैसे माध्यम शामिल हैं।

Multi-Alignment के लाभ

  1. रणनीतिक विकल्प बढ़ते हैं – भारत किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता।
  2. संकट के समय विकल्प उपलब्ध रहते हैं – यदि किसी एक देश के साथ संबंध प्रभावित हों तो भारत के पास अन्य साझेदार होते हैं।
  3. Bargaining Power बढ़ सकती है – जब किसी देश के कई strategic partners हों तो उसकी negotiating capacity बढ़ सकती है।
  4. Technology और investment के अवसर बढ़ते हैं – विभिन्न देशों से अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग लिया जा सकता है।
  5. भारत की Global Role मजबूत होती है – भारत केवल किसी शक्ति-केंद्र का follower बनने के बजाय कई platforms पर agenda-shaping role निभाने की कोशिश कर सकता है।

Multi-Alignment की सीमाएँ और चुनौतियाँ

हर नीति की तरह Multi-Alignment की भी सीमाएँ हैं।

1 सभी साझेदारों के हित हमेशा समान नहीं होते

अमेरिका, रूस, चीन, यूरोप और पश्चिम एशिया के देशों के अपने-अपने strategic interests हैं। भारत के लिए इन सभी के साथ संबंधों को संतुलित रखना आसान नहीं है।

2 Strategic Pressure

महाशक्तियाँ कई बार चाहती हैं कि दूसरे देश किसी विशेष मुद्दे पर स्पष्ट पक्ष लें। ऐसी स्थिति में भारत की strategic autonomy की परीक्षा होती है।

3 China-US Rivalry

यदि अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और बढ़ती है तो भारत के लिए दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखना अधिक कठिन हो सकता है।

4 Defence Dependence

यदि किसी विशेष देश से रक्षा उपकरणों पर अत्यधिक निर्भरता हो तो strategic autonomy सीमित हो सकती है। इसलिए Atmanirbharta और defence diversification भी strategic autonomy से जुड़ जाते हैं।

5 Policy Complexity

जितने अधिक partnerships होंगे, उतनी ही अधिक diplomatic complexity भी होगी। एक मंच पर लिया गया निर्णय दूसरे partner के साथ संबंधों को प्रभावित कर सकता है।

क्या भारत की Multi-Alignment वास्तव में सफल है?

इसका उत्तर एक शब्द में नहीं दिया जा सकता। एक तरफ भारत ने अलग-अलग शक्ति-केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखने की क्षमता दिखाई है। दूसरी तरफ global politics में बढ़ती rivalry के कारण balancing लगातार कठिन होती जा रही है। इसलिए Multi-Alignment की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत; अपनी economic power कितनी बढ़ाता है, defence capabilities कितनी मजबूत करता है, technology में कितना आत्मनिर्भर होता है, energy dependence कैसे manage करता है, diplomatic capacity कितनी बढ़ाता है, और बदलते power structure में कितनी strategic flexibility बनाए रखता है।

2026 के संदर्भ में भारत की विदेश नीति को कैसे समझें?

2026 की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में multipolarity, strategic competition, technology, supply chains, energy security और regional conflicts जैसे मुद्दे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस वातावरण में भारत की विदेश नीति को केवल पुराने “Non-Aligned” या नए “Pro-West” जैसे लेबल से समझना पर्याप्त नहीं होगा।

भारत एक साथ Indo-Pacific में सक्रिय है, Quad में सहयोग करता है, BRICS में भाग लेता है, SCO में सक्रिय है, Russia के साथ संबंध बनाए रखता है, United States के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाता है, Europe के साथ संबंध मजबूत करता है, West Asia के अनेक देशों से संबंध रखता है, Global South में अपनी भूमिका बढ़ाता है। MEA की वर्तमान multilateral relations framework में Quad, BRICS, SCO, BIMSTEC, ASEAN और अन्य संगठनों के साथ भारत की भागीदारी दर्ज है।

इसे देखकर एक बात स्पष्ट होती है कि आज भारत की विदेश नीति का मूल प्रश्न “हम किस गुट में हैं?” से बदलकर “किस मुद्दे पर किसके साथ और क्यों सहयोग करना हमारे राष्ट्रीय हित में है?” हो गया है।

एक आसान उदाहरण से पूरी कहानी समझें पूरी यात्रा को चार चरणों में समझिए:-

चरण 1 — Cold War – Non-Alignment। “हम किसी महाशक्ति के गुट में नहीं जाएंगे।”

चरण 2 — Cold War के बाद – Strategic Autonomy। “दुनिया बदल गई है, लेकिन विदेश नीति के निर्णय स्वतंत्र रहने चाहिए।”

चरण 3 — Multipolar World – Strategic Partnerships। “हम विभिन्न शक्तियों के साथ आवश्यकता के अनुसार गहरे संबंध बनाएंगे।”

चरण 4 — वर्तमान – Multi-Alignment। “हम एक साथ कई देशों और समूहों के साथ अलग-अलग मुद्दों पर सहयोग करेंगे, लेकिन अंतिम निर्णय अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर लेंगे।”

निष्कर्ष: गुट से अधिक महत्वपूर्ण है स्वतंत्र निर्णय

भारत की विदेश नीति की यात्रा को केवल Non-Alignment से Multi-Alignment की यात्रा कहना थोड़ा सरल बना देना होगा। वास्तविकता यह है कि भारत की विदेश नीति में एक निरंतर तत्व दिखाई देता है—Strategic Autonomy और National Interest के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने की इच्छा। Cold War के समय इसकी अभिव्यक्ति Non-Alignment के रूप में हुई। Cold War समाप्त होने के बाद इसका जोर Strategic Autonomy पर बढ़ा। वर्तमान multipolar विश्व में यही सोच अलग-अलग देशों और समूहों के साथ Multi-Alignment और issue-based partnerships के रूप में दिखाई देती है।

आज भारत को एक साथ कई शक्तियों के साथ संबंध रखने पड़ते हैं। अमेरिका से technology और defence cooperation चाहिए, रूस से पुराने strategic और energy संबंध महत्वपूर्ण हैं, यूरोप व्यापार और technology के लिए महत्वपूर्ण है, जापान और ऑस्ट्रेलिया Indo-Pacific में महत्वपूर्ण साझेदार हैं, जबकि BRICS और SCO जैसे मंच Global South तथा Eurasian engagement के लिए उपयोगी हैं। इसलिए भारतीय विदेश नीति को समझने की सबसे आसान कुंजी है, “भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने की बजाय अनेक साझेदारियों के बीच अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है।” और शायद यही Non-Alignment की मूल भावना का आधुनिक रूप भी है—दुनिया से दूरी नहीं, बल्कि दुनिया के साथ संबंध रखते हुए अपने फैसले स्वयं लेना।

FAQ: Non-Alignment से Multi-Alignment तक

  1. Non-Alignment क्या है?
    Non-Alignment ऐसी विदेश नीति थी जिसमें भारत ने Cold War के दौरान किसी एक महाशक्ति-गुट का स्थायी हिस्सा बनने से बचते हुए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने का प्रयास किया।
  2. क्या Non-Alignment का अर्थ Neutrality था?
    नहीं। Non-Alignment केवल युद्ध में तटस्थ रहने की नीति नहीं थी। यह स्वतंत्र विदेश नीति, उपनिवेशवाद-विरोध, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और विकासशील देशों के सहयोग जैसे व्यापक उद्देश्यों से जुड़ी थी।
  3. Strategic Autonomy क्या है?
    Strategic Autonomy का अर्थ है कि भारत महत्वपूर्ण रणनीतिक और विदेश नीति संबंधी निर्णय किसी बाहरी शक्ति के दबाव में नहीं बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ले सके।
  4. Multi-Alignment क्या है?
    Multi-Alignment का अर्थ है अलग-अलग देशों और समूहों के साथ अपने हितों के अनुसार समानांतर संबंध और सहयोग बनाए रखना।
  5. क्या भारत ने Non-Alignment छोड़ दिया है?
    इसे पूर्ण रूप से “छोड़ना” कहना उचित नहीं है। व्यवहार में भारतीय विदेश नीति ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार नए रूप अपनाए हैं। आज Strategic Autonomy और Multi-Alignment अधिक उपयुक्त analytical concepts हैं।
  6. भारत Quad और BRICS दोनों में क्यों है?
    क्योंकि दोनों मंचों के उद्देश्य और कार्यक्षेत्र अलग हैं। भारत अपने अलग-अलग राष्ट्रीय हितों के अनुसार विभिन्न मंचों में भागीदारी करता है।
  7. क्या Multi-Alignment भारत को किसी एक महाशक्ति से दूर रखता है?
    इसका मुख्य उद्देश्य किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और strategic choices बनाए रखना है। इसका अर्थ किसी देश से दूरी बनाना नहीं है।
  8. भारत की Multi-Alignment की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
    बढ़ती US-China rivalry, रूस-पश्चिम तनाव, क्षेत्रीय संघर्ष, technology competition और आर्थिक-सुरक्षा निर्भरता के बीच अलग-अलग साझेदारों के साथ संतुलन बनाए रखना इसकी प्रमुख चुनौतियों में है।

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