यथार्थवाद और नव-यथार्थवाद (Realism and Neo-Realism)
यथार्थवाद का अर्थ एवं परिचय
यथार्थवाद (Realism) अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक प्रमुख सिद्धांत है। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति को शक्ति, राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा के आधार पर समझता है। इसके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में राज्यों के ऊपर कोई सर्वोच्च विश्व-सरकार नहीं है जो सभी राज्यों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। इसलिए प्रत्येक राज्य को अपने अस्तित्व और सुरक्षा के लिए स्वयं प्रयास करना पड़ता है। यथार्थवाद का अर्थ यह नहीं है कि राज्य हमेशा युद्ध करते हैं या सहयोग नहीं कर सकते। इसका तर्क है कि सहयोग, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका को भी शक्ति तथा राष्ट्रीय हित के संदर्भ में समझना चाहिए। यथार्थवाद की प्रमुख मान्यताएँ हैं कि राज्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मुख्य अभिकर्ता हैं, राष्ट्रीय हित विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण आधार है और सुरक्षा के लिए शक्ति आवश्यक है। हालाँकि, सभी यथार्थवादी शक्ति और राज्य के व्यवहार की व्याख्या एक ही प्रकार से नहीं करते।
यथार्थवाद का ऐतिहासिक विकास
1. प्राचीन एवं आरंभिक आधुनिक विचार
- थ्यूसीडाइड्स (Thucydides) की पुस्तक History of the Peloponnesian War में एथेंस और स्पार्टा के संघर्ष के माध्यम से शक्ति, भय और राजनीतिक हितों की भूमिका स्पष्ट होती है। मेलियन संवाद (Melian Dialogue) शक्ति-असमानता और कमजोर राज्यों की सीमित विकल्प-क्षमता को समझने का प्रमुख उदाहरण है।
- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य की सुरक्षा, कूटनीति, सैन्य शक्ति और मंडल सिद्धांत का विवेचन मिलता है। इन विचारों में यथार्थवादी चिंतन से समानताएँ हैं, लेकिन कौटिल्य के प्राचीन भारतीय राज्यचिंतन को आधुनिक यथार्थवाद के समान मानना उचित नहीं है।
- निकोलो मैकियावेली (Niccolò Machiavelli) ने The Prince में राजनीतिक सत्ता, राज्य की स्थिरता और व्यावहारिक राज्यकला पर बल दिया। थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) ने Leviathan (1651) में केंद्रीय सत्ता के अभाव से उत्पन्न असुरक्षा और भय का विश्लेषण किया। हॉब्स के विचार अंतरराष्ट्रीय अराजकता को समझने में उपयोगी हैं, हालाँकि उनका मुख्य उद्देश्य राज्य और राजनीतिक सत्ता की आवश्यकता को स्पष्ट करना था।
2. बीसवीं शताब्दी में यथार्थवाद का विकास
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए सामूहिक सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानून और राष्ट्र संघ (League of Nations) पर बल दिया गया। लेकिन राष्ट्र संघ की सीमाओं और द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभव ने इस विचार पर प्रश्न खड़े किए कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और नैतिक आदर्श अपने आप युद्ध रोक सकते हैं। इसी संदर्भ में ई. एच. कार (E. H. Carr) और हांस जे. मॉर्गेन्थाऊ (Hans J. Morgenthau) ने यथार्थवादी दृष्टिकोण को व्यवस्थित रूप दिया। आगे चलकर केनेथ वॉल्ट्ज (Kenneth Waltz) ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की व्याख्या में व्यवस्था की संरचना को केंद्रीय स्थान दिया। उनके विचारों से संरचनात्मक यथार्थवाद या नव-यथार्थवाद का विकास हुआ।
शास्त्रीय यथार्थवाद (Classical Realism)
शास्त्रीय यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मानव स्वभाव, राजनीतिक सत्ता, राष्ट्रीय हित और शक्ति के लिए संघर्ष को महत्त्व देता है। इसके प्रमुख विचारकों में ई. एच. कार, हांस जे. मॉर्गेन्थाऊ और रेनहोल्ड नीबुहर शामिल हैं।
1. ई. एच. कार: यथार्थवाद और आदर्शवाद
कार की प्रमुख पुस्तक The Twenty Years’ Crisis, 1919–1939 (1939) है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यूटोपियनवाद (Utopianism) की आलोचना की। यूटोपियन दृष्टिकोण पर उनकी आपत्ति यह थी कि वह वास्तविक शक्ति-संबंधों और राज्यों के हितों की उपेक्षा करके शांति तथा सहयोग की संभावनाओं पर अधिक भरोसा करता है। कार ने यथार्थवाद को भी पूर्ण समाधान नहीं माना। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए वास्तविक शक्ति-संबंधों और आदर्शों, दोनों पर विचार करना चाहिए। किसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि उससे किन राज्यों को लाभ मिलता है और कौन-से राज्य उसमें परिवर्तन चाहते हैं।
2. हांस जे. मॉर्गेन्थाऊ: राष्ट्रीय हित और शक्ति
मॉर्गेन्थाऊ की प्रमुख पुस्तक Politics Among Nations: The Struggle for Power and Peace (1948) है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को शक्ति के लिए संघर्ष के रूप में समझाया। उनके अनुसार, राष्ट्रीय हित को शक्ति के संदर्भ में समझना विदेश नीति के विश्लेषण का महत्त्वपूर्ण आधार है।
मॉर्गेन्थाऊ के राजनीतिक यथार्थवाद के छह प्रमुख सिद्धांत हैं:-
- राजनीति के वस्तुनिष्ठ नियम:– राजनीतिक व्यवहार में कुछ नियमितताएँ होती हैं, जिनका अध्ययन तर्क और अनुभव के आधार पर किया जा सकता है।
- राष्ट्रीय हित और शक्ति:– राष्ट्रीय हित को शक्ति के संदर्भ में समझना अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषण का केंद्रीय आधार है।
- हित की परिवर्तनशीलता:– राष्ट्रीय हित की मूल अवधारणा उपयोगी है, लेकिन उसका विशिष्ट अर्थ समय और परिस्थिति के अनुसार बदलता है।
- नैतिकता और राजनीतिक विवेक:– राजनीतिक निर्णयों में नैतिक उद्देश्यों के साथ संभावित परिणामों पर भी विचार करना चाहिए।
- राष्ट्रीय नैतिकता की सीमा:– कोई राज्य अपने राष्ट्रीय हित को संपूर्ण मानवता का हित नहीं मान सकता।
- राजनीति की सापेक्ष स्वायत्तता:– अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विश्लेषण शक्ति और राष्ट्रीय हित जैसी राजनीतिक अवधारणाओं के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
मॉर्गेन्थाऊ के अनुसार, शक्ति केवल सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है। कूटनीति, आर्थिक संसाधन, राजनीतिक प्रभाव और प्रतिष्ठा भी राज्य की शक्ति को प्रभावित करते हैं। उनके चिंतन में राजनीतिक विवेक (Prudence) महत्त्वपूर्ण है, अर्थात किसी नीति को अपनाने से पहले उसके संभावित परिणामों और जोखिमों का आकलन करना।
3. रेनहोल्ड नीबुहर
नीबुहर ने मानव स्वभाव, नैतिकता और राजनीतिक सत्ता के संबंध का विश्लेषण किया। उनके अनुसार, राजनीतिक समूह अपने हितों को प्राथमिकता दे सकते हैं और दूसरों के हितों की उपेक्षा कर सकते हैं। उनका चिंतन बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिक आदर्शों के साथ शक्ति और सामूहिक स्वार्थ की भूमिका को भी समझना आवश्यक है।
यथार्थवाद की प्रमुख अवधारणाएँ
1. राज्य और राष्ट्रीय हित
यथार्थवाद में राज्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख इकाई है। राज्य अपनी सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता, राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए विदेश नीति बनाते हैं। राष्ट्रीय हित (National Interest) राज्य के प्रमुख उद्देश्यों और प्राथमिकताओं को व्यक्त करता है। इसमें सुरक्षा के साथ आर्थिक विकास, अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव भी शामिल हो सकते हैं। राष्ट्रीय हित हमेशा स्थिर नहीं होता; घरेलू राजनीति, नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ इसे प्रभावित करती हैं।
2. शक्ति (Power)
शक्ति का अर्थ दूसरे राज्यों के व्यवहार को प्रभावित करने और अपने हितों की रक्षा करने की क्षमता है। सैन्य क्षमता इसका महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन आर्थिक संसाधन, प्रौद्योगिकी, कूटनीति और राजनीतिक प्रभाव भी महत्त्वपूर्ण हैं। शक्ति-संपन्न राज्य भी हमेशा अपने सभी उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर पाते। भौगोलिक स्थिति, नेतृत्व, सहयोगियों का समर्थन और विरोधी की प्रतिक्रिया भी परिणामों को प्रभावित करती है।
3. अंतरराष्ट्रीय अराजकता (International Anarchy)
अंतरराष्ट्रीय अराजकता का अर्थ राज्यों के ऊपर किसी सर्वोच्च विश्व-सरकार का अभाव है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में नियम, संस्थाएँ या सहयोग नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियाँ मौजूद हैं, लेकिन इनके ऊपर घरेलू सरकार जैसी सर्वोच्च विश्व-सत्ता नहीं है। इस स्थिति में राज्यों को अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं व्यवस्था करनी पड़ती है। यही कारण है कि यथार्थवादी सिद्धांत में सुरक्षा, शक्ति और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को महत्त्व दिया जाता है।
4. आत्म-सहायता (Self-Help)
आत्म-सहायता का अर्थ है कि राज्य अपनी सुरक्षा के लिए मुख्यतः अपनी क्षमताओं और रणनीतियों पर निर्भर रहते हैं। वे गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से सहायता ले सकते हैं, लेकिन अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह दूसरों को नहीं सौंप सकते। उदाहरण के लिए, रक्षा गठबंधन में शामिल राज्य भी अपनी सैन्य क्षमता विकसित कर सकता है, क्योंकि संकट के समय सहयोगी की सहायता निश्चित नहीं होती।
5. शक्ति-संतुलन (Balance of Power)
शक्ति-संतुलन ऐसी स्थिति या नीति है जिसमें किसी एक राज्य को अत्यधिक प्रभुत्व स्थापित करने से रोकने का प्रयास किया जाता है। राज्य अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाकर या अन्य राज्यों के साथ गठबंधन बनाकर संतुलन स्थापित कर सकते हैं। शक्ति-संतुलन आक्रमण को महँगा बनाकर युद्ध की संभावना घटा सकता है, लेकिन हथियारों की प्रतिस्पर्धा और गलत आकलन के कारण अस्थिरता भी बढ़ा सकता है।
6. सुरक्षा-दुविधा (Security Dilemma)
जॉन हर्ज़ (John H. Herz) सुरक्षा-दुविधा की अवधारणा से संबंधित प्रमुख विद्वान हैं। सुरक्षा-दुविधा तब उत्पन्न होती है जब एक राज्य अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए सैन्य क्षमता विकसित करता है, लेकिन दूसरा राज्य इसे अपने लिए खतरा समझता है। इसके परिणामस्वरूप दूसरा राज्य भी हथियार बढ़ाता है और दोनों की असुरक्षा बढ़ सकती है। इस प्रकार संघर्ष केवल आक्रामक इरादों के कारण नहीं, बल्कि भय, अनिश्चितता और रक्षात्मक कदमों के अनपेक्षित परिणामों से भी उत्पन्न हो सकता है।
नव-यथार्थवाद (Neo-Realism)
नव-यथार्थवाद को संरचनात्मक यथार्थवाद (Structural Realism) भी कहा जाता है। केनेथ वॉल्ट्ज ने अपनी पुस्तक Theory of International Politics (1979) में इसे व्यवस्थित सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। वॉल्ट्ज के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्यों के व्यवहार को केवल मानव स्वभाव, नेताओं की महत्त्वाकांक्षा या घरेलू राजनीति से नहीं समझा जा सकता। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना और राज्यों के बीच क्षमताओं का वितरण भी उनके व्यवहार को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, दो राज्यों की राजनीतिक व्यवस्था और नेतृत्व अलग हो सकते हैं, लेकिन यदि दोनों को अपनी सुरक्षा के लिए समान प्रकार की बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तो वे सैन्य क्षमता बढ़ाने या गठबंधन बनाने जैसे समान कदम उठा सकते हैं। इस प्रकार शास्त्रीय यथार्थवाद जहाँ मानव स्वभाव और राजनीतिक विवेक पर बल देता है, वहीं नव-यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचनात्मक बाध्यताओं पर केंद्रित है।
1. वॉल्ट्ज की तीन छवियाँ (Three Images)
वॉल्ट्ज की पुस्तक Man, the State, and War (1959) में युद्ध के कारणों के अध्ययन के लिए तीन विश्लेषणात्मक स्तर दिए गए हैं।
- व्यक्ति (First Image):– युद्ध के कारणों को मानव स्वभाव, नेताओं की महत्त्वाकांक्षा, मनोवैज्ञानिक कारकों और गलत निर्णयों में खोजा जाता है।
- राज्य (Second Image):– युद्ध की व्याख्या राज्य की घरेलू राजनीति, आर्थिक व्यवस्था, संस्थाओं और विचारधारा के आधार पर की जाती है।
- अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (Third Image):– युद्ध और संघर्ष की संभावना को अंतरराष्ट्रीय अराजकता, राज्यों की पारस्परिक स्थिति और व्यवस्था की संरचना के आधार पर समझा जाता है।
वॉल्ट्ज के संरचनात्मक यथार्थवाद का विशेष संबंध तीसरी छवि से है। इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति और राज्य अप्रासंगिक हैं, बल्कि यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यवहार के नियमित प्रतिरूपों को समझने के लिए संरचनात्मक विश्लेषण आवश्यक है।
2. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना
वॉल्ट्ज के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना को तीन प्रमुख तत्वों से समझा जा सकता है।
- आयोजन सिद्धांत (Ordering Principle):– घरेलू व्यवस्था में सरकार और अन्य संस्थाओं के बीच पदानुक्रम होता है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अराजक है, क्योंकि राज्यों के ऊपर कोई सर्वोच्च संप्रभु सत्ता नहीं है।
- इकाइयों के कार्य (Character of Units):– संप्रभु राज्य अपनी सुरक्षा और अस्तित्व के लिए जिम्मेदार होते हैं। वॉल्ट्ज इन्हें कार्यात्मक रूप से समान मानते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी राज्यों की सैन्य या आर्थिक क्षमता समान है।
- क्षमताओं का वितरण (Distribution of Capabilities):– राज्यों के बीच शक्ति और संसाधनों का वितरण व्यवस्था की संरचना को प्रभावित करता है। इसी आधार पर एकध्रुवीय, द्विध्रुवीय और बहुध्रुवीय व्यवस्था में अंतर किया जाता है।
3. द्विध्रुवीयता और बहुध्रुवीयता
- द्विध्रुवीय व्यवस्था (Bipolarity) में दो प्रमुख शक्तियाँ अंतरराष्ट्रीय राजनीति की संरचना को निर्धारित करती हैं। शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ इसके प्रमुख उदाहरण थे।
- बहुध्रुवीय व्यवस्था (Multipolarity) में दो से अधिक प्रमुख शक्तियाँ होती हैं। इसमें राज्यों को अनेक शक्तियों की क्षमताओं, गठबंधनों और संभावित नीतियों का आकलन करना पड़ता है।
वॉल्ट्ज ने द्विध्रुवीय व्यवस्था को अपेक्षाकृत स्थिर मानने का तर्क दिया, क्योंकि इसमें दो प्रमुख शक्तियों के बीच संतुलन का आकलन तुलनात्मक रूप से सरल हो सकता है। फिर भी द्विध्रुवीयता युद्ध को असंभव नहीं बनाती और बहुध्रुवीयता अनिवार्य रूप से युद्ध पैदा नहीं करती।
4. उत्तरजीविता (Survival)
वॉल्ट्ज के अनुसार, राज्य के लिए उत्तरजीविता एक मूलभूत आवश्यकता है। यदि राज्य का अस्तित्व और स्वतंत्रता खतरे में हों, तो उसके अन्य उद्देश्यों को प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसलिए राज्य अपनी सुरक्षा के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाते हैं। राज्य आर्थिक विकास, प्रतिष्ठा और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी चाहते हैं, लेकिन नव-यथार्थवाद में इन उद्देश्यों को सुरक्षा और अस्तित्व के संदर्भ में समझा जाता है।
5. सापेक्ष लाभ और निरपेक्ष लाभ
निरपेक्ष लाभ (Absolute Gains) में राज्य यह देखता है कि सहयोग से उसे कितना लाभ प्राप्त होगा। सापेक्ष लाभ (Relative Gains) में वह अपने लाभ की तुलना दूसरे राज्य के लाभ से भी करता है। उदाहरण के लिए, दो राज्य तकनीकी सहयोग से आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यदि एक राज्य को आशंका हो कि दूसरा राज्य अधिक लाभ प्राप्त करके भविष्य में सामरिक बढ़त हासिल कर लेगा, तो वह सहयोग सीमित कर सकता है। यह बहस नव-यथार्थवाद और नव-उदार संस्थागतवाद के बीच महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि, सभी यथार्थवादी हर परिस्थिति में सापेक्ष लाभ को निरपेक्ष लाभ से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं मानते।
नव-यथार्थवाद के प्रमुख प्रकार
1. रक्षात्मक यथार्थवाद (Defensive Realism)
रक्षात्मक यथार्थवाद के अनुसार, राज्य सामान्यतः अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं। शक्ति का अत्यधिक विस्तार दूसरे राज्यों में भय पैदा कर सकता है, जिससे वे विरोधी गठबंधन बना सकते हैं। परिणामस्वरूप, शक्ति बढ़ाने वाले राज्य की सुरक्षा कमजोर भी हो सकती है। केनेथ वॉल्ट्ज का सिद्धांत अक्सर रक्षात्मक यथार्थवादी परंपरा से जोड़ा जाता है। रॉबर्ट जर्विस ने सुरक्षा-दुविधा का विश्लेषण किया, जबकि चार्ल्स ग्लेज़र ने सुरक्षा और रणनीति के संबंध में इस दृष्टिकोण को आगे विकसित किया। इस सिद्धांत का मुख्य तर्क है कि सुरक्षा के लिए पर्याप्त शक्ति आवश्यक है, लेकिन हर परिस्थिति में अधिकतम शक्ति प्राप्त करने का प्रयास उचित नहीं होता।
2. आक्रामक यथार्थवाद (Offensive Realism)
- जॉन जे. मियर्शाइमर (John J. Mearsheimer) आक्रामक यथार्थवाद के प्रमुख विचारक हैं। उनकी पुस्तक The Tragedy of Great Power Politics (2001) इस दृष्टिकोण की प्रमुख कृति है।
- मियर्शाइमर के अनुसार, महान शक्तियाँ ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कार्य करती हैं जहाँ अन्य राज्यों के भविष्य के इरादों के बारे में निश्चित जानकारी नहीं होती और कोई विश्व-सरकार उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं देती। इसलिए वे अपनी शक्ति बढ़ाने और जहाँ संभव हो क्षेत्रीय प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास कर सकती हैं।
- वॉल्ट्ज और मियर्शाइमर में मुख्य अंतर यह है कि वॉल्ट्ज अंतरराष्ट्रीय संरचना और उसकी बाध्यताओं की व्याख्या करते हैं, जबकि मियर्शाइमर का आक्रामक यथार्थवाद महान शक्तियों के शक्ति-अधिकतमकरण पर अधिक बल देता है।
3. स्टीफन वॉल्ट और खतरा-संतुलन सिद्धांत
स्टीफन एम. वॉल्ट (Stephen M. Walt) ने The Origins of Alliances (1987) में खतरा-संतुलन सिद्धांत (Balance of Threat Theory) प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, राज्य केवल दूसरे राज्य की कुल शक्ति के आधार पर गठबंधन नहीं बनाते। भौगोलिक निकटता, आक्रामक क्षमता और उसकी मंशा के बारे में धारणा भी महत्त्वपूर्ण होती है। इस प्रकार गठबंधन-निर्माण को समझने के लिए शक्ति के साथ खतरे की प्रकृति का अध्ययन भी आवश्यक है।
यथार्थवाद और नव-यथार्थवाद में अंतर
शास्त्रीय यथार्थवाद
- प्रमुख विचारक – ई. एच. कार, मॉर्गेन्थाऊ, नीबुहर
- प्रमुख पुस्तक – Politics Among Nations (1948)
- विश्लेषण का केंद्र – मानव स्वभाव, शक्ति, राष्ट्रीय हित और राजनीतिक विवेक
- संघर्ष का स्पष्टीकरण – मानवीय प्रवृत्तियाँ, राजनीतिक सत्ता और हित
- शक्ति का महत्त्व – सुरक्षा तथा व्यवस्था में राज्य की स्थिति का आधार
- प्रमुख प्रश्न – राज्य शक्ति और हित के लिए संघर्ष क्यों करते हैं?
- प्रमुख सीमा – संरचनात्मक बाध्यताओं की व्याख्या सीमित हो सकती है
नव-यथार्थवाद
- प्रमुख विचारक – केनेथ वॉल्ट्ज
- प्रमुख पुस्तक – Theory of International Politics (1979)
- विश्लेषण का केंद्र – अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना
- संघर्ष का स्पष्टीकरण – अराजकता तथा क्षमताओं का वितरण
- शक्ति का महत्त्व – सुरक्षा तथा व्यवस्था में राज्य की स्थिति का आधार
- प्रमुख प्रश्न – अंतरराष्ट्रीय संरचना राज्यों के व्यवहार को कैसे प्रभावित करती है?
- प्रमुख सीमा – घरेलू राजनीति और नेतृत्व की भूमिका की व्याख्या सीमित हो सकती है
दोनों दृष्टिकोण शक्ति, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को महत्त्व देते हैं। मुख्य अंतर उनके विश्लेषण के स्तर में है। मॉर्गेन्थाऊ राजनीतिक व्यवहार में मानव स्वभाव और राजनीतिक विवेक पर बल देते हैं, जबकि वॉल्ट्ज अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना पर केंद्रित हैं।
यथार्थवाद की आलोचना
- यथार्थवाद की पहली प्रमुख आलोचना यह है कि वह कभी-कभी मानव स्वभाव, शक्ति और राष्ट्रीय हित को अत्यधिक महत्त्व देता है। इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सहयोग, संस्थाओं और आर्थिक परस्पर निर्भरता की भूमिका कम स्पष्ट हो सकती है।
- उदारवादी विचारक मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ सूचना उपलब्ध कराकर, समझौतों की निगरानी करके और सहयोग की लागत घटाकर राज्यों के बीच सहयोग बढ़ा सकती हैं। यथार्थवादी इसके उत्तर में कहते हैं कि संस्थाएँ राज्यों की सहमति और संसाधनों पर निर्भर होती हैं तथा प्रमुख शक्तियों के हितों में गंभीर टकराव होने पर उनकी सीमाएँ सामने आ सकती हैं।
- मार्क्सवादी और आलोचनात्मक दृष्टिकोण यथार्थवाद की आलोचना करते हैं कि वह वैश्विक पूँजीवाद, वर्ग-संबंधों और आर्थिक असमानताओं को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता। इन दृष्टिकोणों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति को केवल राज्य और सैन्य शक्ति के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
- यथार्थवाद की एक अन्य सीमा यह है कि शक्ति-संतुलन हमेशा शांति की गारंटी नहीं देता। हथियारों की प्रतिस्पर्धा, गलत आकलन और सुरक्षा-दुविधा के कारण संतुलन की कोशिशें भी संघर्ष पैदा कर सकती हैं।
नव-यथार्थवाद की आलोचना
- नव-यथार्थवाद की प्रमुख आलोचना यह है कि उसका संरचनात्मक विश्लेषण कई बार अत्यधिक अमूर्त हो जाता है। राज्यों के व्यवहार पर अंतरराष्ट्रीय संरचना का प्रभाव महत्त्वपूर्ण है, लेकिन घरेलू राजनीति, नेतृत्व, विचारधारा और ऐतिहासिक अनुभव भी विदेश नीति को प्रभावित करते हैं।
- उदाहरण के लिए, शीतयुद्ध का अंत केवल अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शक्ति-वितरण से नहीं समझा जा सकता। सोवियत संघ की आंतरिक समस्याएँ, नेतृत्व के निर्णय और वैचारिक परिवर्तन भी महत्त्वपूर्ण थे।
- रचनावादी विचारक, विशेषकर अलेक्जेंडर वेंड्ट, यह तर्क देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को केवल भौतिक शक्ति से नहीं समझा जा सकता। राज्यों की पहचान, विचार और पारस्परिक धारणाएँ भी यह निर्धारित करती हैं कि वे दूसरे राज्यों को मित्र या शत्रु के रूप में देखते हैं।
- इस आलोचना के बावजूद नव-यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, शक्ति-संतुलन और महान शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण करने के लिए उपयोगी सिद्धांत है।
प्रमुख सैद्धांतिक बहसें
1. यथार्थवाद बनाम उदारवाद
यथार्थवाद शक्ति, सुरक्षा और प्रतिस्पर्धा पर बल देता है। उदारवाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, आर्थिक परस्पर निर्भरता और सहयोग की संभावनाओं को अधिक महत्त्व देता है। दोनों दृष्टिकोण शक्ति और संस्थाओं के अस्तित्व को स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन उनकी व्याख्यात्मक प्राथमिकताएँ अलग हैं। रॉबर्ट कीओहेन ने After Hegemony (1984) में समझाया कि प्रमुख शक्ति की स्थिति बदलने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ सहयोग बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।
2. यथार्थवाद बनाम रचनावाद
रचनावाद विचारों, पहचान और मानदंडों की भूमिका पर बल देता है। अलेक्जेंडर वेंड्ट की पुस्तक Social Theory of International Politics (1999) इस दृष्टिकोण की प्रमुख कृति है। रचनावाद के अनुसार, किसी राज्य की सैन्य क्षमता दूसरे राज्य को किस प्रकार का खतरा लगेगी, यह केवल भौतिक शक्ति पर निर्भर नहीं करता; दोनों के ऐतिहासिक संबंध और पारस्परिक धारणाएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं।
3. नव-यथार्थवाद बनाम नव-उदार संस्थागतवाद
दोनों दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय अराजकता और राज्य की भूमिका को स्वीकार करते हैं। नव-यथार्थवाद सुरक्षा तथा सापेक्ष शक्ति पर अधिक बल देता है, जबकि नव-उदार संस्थागतवाद यह समझाता है कि संस्थाएँ सूचना, निगरानी और नियमों के माध्यम से सहयोग को कैसे बढ़ा सकती हैं।
भारतीय संदर्भ
1. गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता
स्वतंत्रता के बाद भारत ने गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) की नीति अपनाई। इसका उद्देश्य शीतयुद्ध के दोनों महाशक्ति गुटों में स्थायी रूप से शामिल हुए बिना स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना था। यह नीति उपनिवेशवाद-विरोध, शांति और नवस्वतंत्र राज्यों की स्वायत्तता से भी जुड़ी थी। यथार्थवादी दृष्टिकोण से इसे महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के राष्ट्रीय हित और निर्णय-स्वतंत्रता की रक्षा के प्रयास के रूप में भी समझा जा सकता है। लेकिन गुटनिरपेक्षता को केवल शक्ति-राजनीति का परिणाम मानना उसके वैचारिक और ऐतिहासिक पक्षों की उपेक्षा होगी।
2. भारत-चीन संबंध
भारत-चीन संबंधों में सीमा-विवाद, सैन्य तैनाती और रणनीतिक अविश्वास महत्त्वपूर्ण हैं। एक राज्य द्वारा सुरक्षा के लिए सैन्य क्षमता बढ़ाने को दूसरा राज्य खतरे के रूप में देख सकता है। यह स्थिति सुरक्षा-दुविधा की अवधारणा से समझी जा सकती है। हालाँकि, वास्तविक घटनाओं की व्याख्या के लिए ऐतिहासिक विवादों, राजनीतिक उद्देश्यों और कूटनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन भी आवश्यक है।
3. रक्षा नीति और शक्ति-संतुलन
भारत की रक्षा क्षमता और सामरिक साझेदारियों का विश्लेषण शक्ति-संतुलन की अवधारणा से किया जा सकता है। राज्य संभावित खतरों का सामना करने और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए सैन्य तथा कूटनीतिक साधनों का उपयोग करते हैं। लेकिन भारत की विदेश नीति केवल सैन्य शक्ति से निर्धारित नहीं होती। आर्थिक विकास, तकनीकी क्षमता, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भूमिका भी महत्त्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष
शास्त्रीय यथार्थवाद और नव-यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित की भूमिका को समझने के दो संबंधित, लेकिन अलग दृष्टिकोण हैं। कार और मॉर्गेन्थाऊ ने शक्ति तथा राजनीतिक हितों को केंद्र में रखा, जबकि वॉल्ट्ज ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना और क्षमताओं के वितरण को महत्त्व दिया। रक्षात्मक यथार्थवाद पर्याप्त सुरक्षा पर और आक्रामक यथार्थवाद महान शक्तियों के शक्ति-अधिकतमकरण पर बल देता है। इन सिद्धांतों की सीमाएँ भी हैं, विशेषकर घरेलू राजनीति, विचारधारा, संस्थाओं और सामाजिक पहचान की व्याख्या के संबंध में। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति के व्यापक अध्ययन में यथार्थवाद को अन्य सिद्धांतों के साथ पढ़ना आवश्यक है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य
विचारक – पुस्तक / सिद्धांत – वर्ष
- थॉमस हॉब्स – Leviathan – 1651
- ई. एच. कार – The Twenty Years’ Crisis – 1939
- हांस जे. मॉर्गेन्थाऊ – Politics Among Nations – 1948
- केनेथ वॉल्ट्ज – Man, the State, and War – 1959
- स्टीफन वॉल्ट – The Origins of Alliances – 1987
- रॉबर्ट कीओहेन – After Hegemony – 1984
- केनेथ वॉल्ट्ज – Theory of International Politics – 1979
- जॉन जे. मियर्शाइमर – The Tragedy of Great Power Politics – 2001
- अलेक्जेंडर वेंड्ट – Social Theory of International Politics – 1999
- E. H. Carr — The Twenty Years’ Crisis, 1919–1939.
- Hans J. Morgenthau — Politics Among Nations: The Struggle for Power and Peace.
- Kenneth N. Waltz — Man, the State, and War.
- Kenneth N. Waltz — Theory of International Politics.
- Stephen M. Walt — The Origins of Alliances.
- Robert Jervis — Perception and Misperception in International Politics.
- John J. Mearsheimer — The Tragedy of Great Power Politics.
- Robert O. Keohane — After Hegemony.
- Alexander Wendt — Social Theory of International Politics.
- Robert Jackson and Georg Sørensen — Introduction to International Relations: Theories and Approaches.
- Kautilya — Arthashastra.
- Thucydides — History of the Peloponnesian War.
इन्हें भी पढ़े –
विकास प्रशासन एवं कल्याण प्रशासन (Development and Welfare Administration)
नियोजन का अर्थ, प्रभाव, योजना एवं नीति आयोग
कार्मिक प्रशासन: भर्ती, प्रशिक्षण एवं पदोन्नति तथा UPSC और राज्य लोक सेवा आयोग की भूमिका


