नियोजन का अर्थ, प्रभाव, योजना एवं नीति आयोग
नियोजन का अर्थ एवं अवधारणा (Meaning and Concept of Planning)
- नियोजन (Planning) वह प्रक्रिया है जिसमें निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उपलब्ध संसाधनों, प्राथमिकताओं, नीतियों और कार्यों की योजना बनाई जाती है। लोक प्रशासन में इसमें लक्ष्य निर्धारण, संसाधन आवंटन, विभागों के बीच समन्वय, क्रियान्वयन और परिणामों का मूल्यांकन शामिल है।
- आर्थिक नियोजन (Economic Planning) में उत्पादन, निवेश, रोजगार, कृषि, उद्योग और राष्ट्रीय आय जैसे विषयों पर ध्यान दिया जाता है। व्यापक सार्वजनिक नियोजन में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय, पर्यावरण और क्षेत्रीय विकास भी शामिल होते हैं।
- भारत में नियोजन के प्रमुख उद्देश्य रहे हैं—आर्थिक विकास, गरीबी में कमी, रोजगार सृजन, आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना। इन उद्देश्यों के बीच संतुलन आवश्यक है, क्योंकि आर्थिक वृद्धि अपने आप समान वितरण या सामाजिक कल्याण सुनिश्चित नहीं करती।
भारत में नियोजन का ऐतिहासिक विकास
1. स्वतंत्रता से पहले नियोजन संबंधी विचार
स्वतंत्रता से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था में गरीबी, कृषि पर निर्भरता और औद्योगिक पिछड़ापन प्रमुख समस्याएँ थीं। राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं और अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक विकास के लिए नियोजित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
- एम. विश्वेश्वरैया: 1934 में प्रकाशित Planned Economy for India में योजनाबद्ध औद्योगिक विकास पर जोर दिया।
- राष्ट्रीय नियोजन समिति, 1938: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में इसका गठन किया। समिति ने औद्योगीकरण और आर्थिक विकास में राज्य की भूमिका को महत्व दिया।
- बॉम्बे प्लान, 1944: प्रमुख उद्योगपतियों द्वारा प्रस्तुत इस योजना में औद्योगिक विकास के लिए राज्य के बड़े निवेश की आवश्यकता स्वीकार की गई।
- पीपुल्स प्लान: एम. एन. रॉय से संबंधित इस योजना में व्यापक आर्थिक पुनर्गठन और जनकल्याण पर बल दिया गया।
- गांधीवादी योजना: श्रीमन नारायण अग्रवाल से संबंधित इस दृष्टिकोण ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कुटीर उद्योगों और विकेंद्रीकरण को महत्व दिया।
इन योजनाओं में विकास के साधनों और प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद थे, लेकिन आर्थिक विकास के लिए नियोजित प्रयासों की आवश्यकता पर व्यापक सहमति उभर रही थी।
2. योजना आयोग की स्थापना
- भारत सरकार ने 15 मार्च 1950 को कार्यपालिका संकल्प द्वारा योजना आयोग (Planning Commission) की स्थापना की। यह न तो संवैधानिक निकाय था और न ही संसद के अधिनियम से गठित वैधानिक निकाय। प्रधानमंत्री इसका अध्यक्ष होता था। इसके प्रमुख कार्य राष्ट्रीय संसाधनों का आकलन करना, विकास की प्राथमिकताएँ निर्धारित करना, पंचवर्षीय योजनाएँ तैयार करना और आर्थिक विकास के लिए समन्वय स्थापित करना था।
- प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951–1956) में कृषि, सिंचाई, बिजली और पुनर्वास को प्राथमिकता दी गई। द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956–1961) में पी. सी. महालनोबिस के मॉडल से प्रभावित होकर भारी उद्योगों और पूँजीगत वस्तुओं के विकास पर बल दिया गया।
3. नियोजन के प्रमुख चरण
अवधि/चरण – प्रमुख विशेषता
- 1951–1956: प्रथम योजना – कृषि, सिंचाई और आधारभूत सुविधाएँ
- 1956–1961: द्वितीय योजना – महालनोबिस मॉडल और भारी उद्योग
- 1961–1966: तृतीय योजना – आत्मनिर्भरता और कृषि-औद्योगिक विकास
- 1966–1969: योजना-अवकाश – वार्षिक योजनाएँ; आर्थिक कठिनाइयों और सूखे का प्रभाव
- 1969–1990: चौथी से सातवीं योजना – विकास, गरीबी उन्मूलन, कृषि उत्पादकता और आत्मनिर्भरता पर बदलता जोर
- 1991 के बाद – उदारीकरण, निजी निवेश और बाजार की बढ़ती भूमिका
- 2012–2017 – बारहवीं और अंतिम पंचवर्षीय योजना
- 1 जनवरी 2015 के बाद – योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग
4. महालनोबिस मॉडल
पी. सी. महालनोबिस का मॉडल द्वितीय पंचवर्षीय योजना में प्रभावशाली रहा। इसमें पूँजीगत वस्तुओं और भारी उद्योगों के विकास को प्राथमिकता दी गई। इसका तर्क था कि मशीनों और औद्योगिक उपकरणों का घरेलू उत्पादन बढ़ने से दीर्घकाल में देश की उत्पादन क्षमता और आत्मनिर्भरता मजबूत होगी। इस रणनीति से भारत के औद्योगिक आधार के निर्माण में सहायता मिली। हालांकि, पूँजी-प्रधान उद्योगों पर जोर देने से रोजगार, कृषि और उपभोक्ता वस्तुओं की तत्कालीन आवश्यकताओं के साथ संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण रहा।
5. मिश्रित अर्थव्यवस्था
स्वतंत्र भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) अपनाई, जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की भूमिका स्वीकार की गई। राज्य ने भारी उद्योगों, ऊर्जा और आधारभूत संरचना में निवेश किया, जबकि निजी क्षेत्र को भी आर्थिक गतिविधियों में स्थान मिला।
इस मॉडल का उद्देश्य आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना था। लेकिन समय के साथ अत्यधिक नियंत्रण, लाइसेंस-परमिट व्यवस्था, प्रशासनिक विलंब और कुछ सार्वजनिक उपक्रमों की कम उत्पादकता जैसी समस्याएँ सामने आईं। ये समस्याएँ बाद में आर्थिक उदारीकरण के पक्ष में प्रमुख तर्क बनीं।
उदारीकरण (Liberalization): अर्थ एवं पृष्ठभूमि
उदारीकरण का अर्थ आर्थिक गतिविधियों पर सरकारी प्रतिबंधों को कम करना, औद्योगिक लाइसेंसिंग में ढील देना, प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और निजी निवेश के अवसरों का विस्तार करना है। इसका अर्थ सरकार की भूमिका पूरी तरह समाप्त करना नहीं है।
उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) में अंतर है:
- उदारीकरण (Liberalization): आर्थिक प्रतिबंधों और नियंत्रणों में कमी।
- निजीकरण (Privatization): आर्थिक गतिविधियों में निजी स्वामित्व या प्रबंधन की भूमिका बढ़ाना।
- वैश्वीकरण (Globalization): राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और तकनीक से बढ़ता जुड़ाव।
1991 के आर्थिक सुधार
1991 में भारत को गंभीर भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis) का सामना करना पड़ा। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव, बाहरी ऋण और राजकोषीय असंतुलन ने आर्थिक सुधारों की आवश्यकता बढ़ाई। प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव की सरकार में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने व्यापक आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया। इनमें औद्योगिक लाइसेंसिंग में कमी, व्यापार नीति में बदलाव, आयात प्रतिबंधों में ढील और विदेशी निवेश के अवसरों का विस्तार शामिल था। इन सुधारों का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा और निवेश बढ़ाना, आर्थिक दक्षता में सुधार करना तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अधिक जोड़ना था। 1991 के सुधार निर्णायक मोड़ थे, हालांकि कुछ उदारीकरण संबंधी कदम इससे पहले भी उठाए गए थे।
उदारीकरण का नियोजन पर प्रभाव
उदारीकरण ने नियोजन को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके साधनों और प्राथमिकताओं में बदलाव किया।
1. केंद्रीकृत नियोजन से नीतिगत मार्गदर्शन
पहले केंद्र सरकार औद्योगिक लाइसेंसिंग, सार्वजनिक निवेश और योजनागत संसाधनों के आवंटन के माध्यम से अर्थव्यवस्था को दिशा देती थी। उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र और बाजार संकेतों की भूमिका बढ़ी। सरकार का जोर अब प्रतिस्पर्धा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाने, नियमन सुधारने, आधारभूत संरचना विकसित करने और सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध कराने पर भी बढ़ा। हालांकि, बाजार की भूमिका बढ़ने के बावजूद सामाजिक कल्याण और सार्वजनिक वस्तुओं के लिए सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक बना रहा।
2. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की बदलती भूमिका
उदारीकरण के बाद निजी निवेश और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership—PPP) का महत्व बढ़ा। इससे पूँजी, तकनीक और प्रबंधन क्षमता जुटाने के अवसर मिले। लेकिन निजी भागीदारी अपने आप दक्षता सुनिश्चित नहीं करती। इसके लिए पारदर्शी अनुबंध, प्रभावी नियमन, उपभोक्ता हितों की रक्षा और जवाबदेही आवश्यक हैं।
3. पंचवर्षीय योजनाओं से रणनीतिक नियोजन
पारंपरिक नियोजन में पाँच वर्ष की अवधि के लिए क्षेत्रवार लक्ष्य और निवेश प्राथमिकताएँ तय की जाती थीं। उदारीकरण के बाद बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार नीतियों में लचीलापन और परिणामों के मूल्यांकन पर अधिक जोर दिया गया। उदाहरण के लिए, शिक्षा में केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों की उपस्थिति, सीखने का स्तर और शिक्षक उपलब्धता भी मापना आवश्यक है। यह परिणाम-आधारित नियोजन (Outcome-Based Planning) का उदाहरण है।
4. संघवाद पर प्रभाव
उदारीकरण के बाद राज्यों के बीच निवेश आकर्षित करने, आधारभूत संरचना सुधारने और आर्थिक विकास बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा अधिक महत्वपूर्ण हुई। साथ ही, राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के लिए केंद्र और राज्यों के सहयोग की आवश्यकता बनी रही। इसी संदर्भ में नीति आयोग सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) और प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। हालाँकि, विकसित राज्यों के पास निवेश आकर्षित करने के लिए बेहतर संसाधन और प्रशासनिक क्षमता हो सकती है। इसलिए पिछड़े राज्यों को क्षमता-विकास और उचित सहायता देना भी आवश्यक है।
5. सामाजिक न्याय और असमानता
आर्थिक उदारीकरण से निवेश, प्रतिस्पर्धा और उत्पादकता बढ़ने के अवसर मिल सकते हैं। लेकिन आर्थिक वृद्धि से लाभों का समान वितरण स्वतः सुनिश्चित नहीं होता। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास में सरकारी नीतियों की भूमिका बनी रहती है। इसलिए नियोजन को आर्थिक दक्षता के साथ सामाजिक न्याय और समावेशी विकास पर भी ध्यान देना चाहिए।
6. समग्र प्रभाव
उदारीकरण के बाद नियोजन में प्रमुख परिवर्तन इस प्रकार हैं:
- सरकारी नियंत्रण से नियमन और नीतिगत मार्गदर्शन की ओर बढ़ता जोर।
- सार्वजनिक निवेश के साथ निजी निवेश और PPP का विस्तार।
- केंद्रीकृत लक्ष्यों के साथ राज्यों की आवश्यकताओं को अधिक महत्व।
- व्यय के साथ परिणामों और कार्यक्रमों के मूल्यांकन पर ध्यान।
- आर्थिक दक्षता के साथ सामाजिक सुरक्षा और असमानता की चुनौती।
इन परिवर्तनों का अर्थ राज्य की भूमिका का अंत नहीं, बल्कि उसके कार्यों और साधनों में बदलाव है।
नीति आयोग (NITI Aayog)
1. स्थापना और अर्थ
- नीति आयोग का पूरा नाम National Institution for Transforming India है। इसकी स्थापना 1 जनवरी 2015 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के कार्यपालिका संकल्प द्वारा की गई। इसने योजना आयोग का स्थान लिया।
- नीति आयोग भारत सरकार का प्रमुख सार्वजनिक नीति थिंक टैंक (Public Policy Think Tank) है। यह सरकार को नीतिगत सलाह, शोध, रणनीतिक योजना और कार्यक्रमों के मूल्यांकन में सहयोग देता है।
- यह योजना आयोग की तरह पंचवर्षीय योजनाएँ तैयार करने वाला संस्थान नहीं है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना 2012–2017 के लिए थी और इसके बाद पंचवर्षीय योजनाओं की व्यवस्था जारी नहीं रखी गई।
2. स्थापना के प्रमुख उद्देश्य
नीति आयोग की स्थापना के प्रमुख उद्देश्य हैं:
राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं पर साझा दृष्टि विकसित करना।
केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग बढ़ाना।
दीर्घकालीन नीतियों और रणनीतियों पर सलाह देना।
सरकारी कार्यक्रमों की निगरानी और मूल्यांकन को प्रोत्साहित करना।
शोध, नवाचार और बेहतर प्रशासनिक पद्धतियों को बढ़ावा देना।
नीति आयोग का महत्व इस बात में है कि वह विकास संबंधी नीतियों को विशेषज्ञता, आँकड़ों और राज्यों की आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास करता है।
3. संगठनात्मक संरचना
नीति आयोग की प्रमुख संरचना में निम्नलिखित शामिल हैं:-
पद/निकाय – प्रमुख भूमिका
- अध्यक्ष – भारत के प्रधानमंत्री
- गवर्निंग काउंसिल – राज्यों और संबंधित केंद्रशासित प्रदेशों की भागीदारी
- उपाध्यक्ष – नीतिगत नेतृत्व और समन्वय
- पूर्णकालिक सदस्य – विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता और नीति संबंधी कार्य
- अंशकालिक एवं पदेन सदस्य – निर्धारित व्यवस्था के अनुसार विशेषज्ञता और संस्थागत प्रतिनिधित्व
- मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) – प्रशासनिक संचालन और समन्वय
- DMEO – कार्यक्रमों की निगरानी और मूल्यांकन
नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल में राज्यों के मुख्यमंत्री तथा विधानमंडल वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री और अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल/प्रशासक शामिल होते हैं। सदस्यता और संगठनात्मक व्यवस्था सरकारी संकल्पों तथा संबंधित अधिसूचनाओं के अनुसार निर्धारित होती है।
4. नीति आयोग के प्रमुख कार्य
- नीतिगत सलाह: आर्थिक विकास, सामाजिक क्षेत्र, आधारभूत संरचना और अन्य राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर सरकार को सलाह देना।
- सहकारी संघवाद: केंद्र और राज्यों के बीच संवाद तथा साझा नीति-निर्माण को बढ़ावा देना।
- प्रतिस्पर्धी संघवाद: राज्यों के प्रदर्शन की तुलना और अच्छे प्रशासनिक प्रयोगों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना।
- निगरानी एवं मूल्यांकन: योजनाओं और कार्यक्रमों की प्रगति तथा परिणामों का आकलन करने में सहयोग देना।
- शोध और नवाचार: नीति-निर्माण में विशेषज्ञता, आँकड़ों और नए विचारों के उपयोग को बढ़ावा देना।
5. नीति आयोग की प्रमुख पहलें
- आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme) – जनवरी 2018 में शुरू इस कार्यक्रम का उद्देश्य अपेक्षाकृत पिछड़े जिलों में स्वास्थ्य एवं पोषण, शिक्षा, कृषि, वित्तीय समावेशन और आधारभूत संरचना में सुधार को गति देना है। इसमें विकास संकेतकों के आधार पर प्रगति की निगरानी की जाती है।
- सतत विकास लक्ष्य (SDGs) – नीति आयोग भारत में सतत विकास लक्ष्यों की प्रगति की निगरानी तथा केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- अटल नवाचार मिशन (Atal Innovation Mission—AIM) – इसका उद्देश्य विद्यालयों, नवप्रवर्तकों और उद्यमियों के बीच नवाचार तथा उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करना है।
6. विकास निगरानी एवं मूल्यांकन कार्यालय (DMEO)
DMEO का पूरा नाम Development Monitoring and Evaluation Office है। यह नीति आयोग से संबद्ध कार्यालय है, जो सरकारी कार्यक्रमों की निगरानी और मूल्यांकन में भूमिका निभाता है। इसका महत्व इसलिए है कि किसी योजना की सफलता केवल उसके बजट या खर्च से नहीं मापी जा सकती। यह देखना भी आवश्यक है कि योजना अपने उद्देश्यों को कितना पूरा कर रही है और लोगों को उससे क्या लाभ मिला है।
सहकारी संघवाद और प्रतिस्पर्धी संघवाद
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) में केंद्र और राज्य सरकारें साझा उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम करती हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में नीतिगत समन्वय इसका उदाहरण है। प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) में राज्य निवेश आकर्षित करने, प्रशासनिक प्रदर्शन सुधारने और बेहतर सार्वजनिक सेवाएँ देने के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। प्रतिस्पर्धा राज्यों को सुधार के लिए प्रेरित कर सकती है, जबकि सहयोग साझा समस्याओं के समाधान में मदद करता है। लेकिन यदि विकसित राज्यों को ही अधिक लाभ मिले, तो क्षेत्रीय असमानताएँ बढ़ सकती हैं। इसलिए प्रतिस्पर्धा के साथ पिछड़े राज्यों की क्षमता बढ़ाना भी आवश्यक है।
योजना आयोग और नीति आयोग में अंतर
योजना आयोग
- स्थापना – 15 मार्च 1950
- गठन – कार्यपालिका संकल्प
- प्रमुख भूमिका – पंचवर्षीय योजनाएँ और नियोजन
- नियोजन का स्वरूप – केंद्रीय योजनागत प्राथमिकताओं पर जोर
- संसाधन आवंटन – योजनागत संसाधन आवंटन में महत्वपूर्ण भूमिका
- संघवाद – केंद्र-प्रमुख नियोजन व्यवस्था
- मूल्यांकन – योजनाओं की प्रगति और विकास लक्ष्यों पर ध्यान
- पंचवर्षीय योजनाएँ – प्रमुख संस्थागत उपकरण
नीति आयोग
- स्थापना – 1 जनवरी 2015
- गठन – केंद्रीय मंत्रिमंडल का कार्यपालिका संकल्प
- प्रमुख भूमिका – रणनीतिक नीति-सलाह और शोध
- नियोजन का स्वरूप – राज्यों की भागीदारी और लचीली नीति पर जोर
- संसाधन आवंटन – योजना आयोग जैसी केंद्रीय योजनागत आवंटन भूमिका नहीं
- संघवाद – सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद पर बल
- मूल्यांकन – निगरानी, मूल्यांकन और परिणामों पर विशेष जोर
- पंचवर्षीय योजनाएँ – पंचवर्षीय योजनाओं की व्यवस्था जारी नहीं रखी गई
विश्लेषण: योजना आयोग ने स्वतंत्रता के बाद औद्योगीकरण और राष्ट्रीय विकास को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नीति आयोग बदलती अर्थव्यवस्था में शोध, नीतिगत सलाह और केंद्र-राज्य सहयोग को महत्व देता है। दोनों की भूमिकाओं का मूल्यांकन उनके अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भों में करना चाहिए।
नीति आयोग का आलोचनात्मक मूल्यांकन
नीति आयोग की प्रमुख संभावनाएँ विशेषज्ञता-आधारित नीति-निर्माण, राज्यों की भागीदारी, प्रशासनिक नवाचार और कार्यक्रमों के मूल्यांकन से जुड़ी हैं। इसके माध्यम से राज्यों के अनुभव साझा करने तथा विकास संबंधी समस्याओं के लिए बेहतर नीतिगत विकल्प खोजने का अवसर मिलता है। हालाँकि, इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं।
- पहली, वित्तीय अधिकारों की सीमा:– नीति आयोग योजना आयोग की तरह योजनागत संसाधनों के आवंटन की भूमिका नहीं निभाता। इसलिए नीतिगत सलाह को वास्तविक वित्तीय संसाधनों से जोड़ने के लिए केंद्र, राज्यों और संबंधित मंत्रालयों के बीच समन्वय आवश्यक है।
- दूसरी, सलाह और क्रियान्वयन का अंतर:– नीति आयोग की सिफारिशों का प्रभाव संबंधित सरकारों और विभागों द्वारा अपनाए जाने पर निर्भर करता है। अच्छी सलाह अपने आप प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित नहीं करती।
- तीसरी, संघीय चुनौतियाँ:– केंद्र और राज्यों की प्राथमिकताओं में अंतर तथा राजनीतिक मतभेद सहयोग को प्रभावित कर सकते हैं। केवल संवाद का मंच बनाना पर्याप्त नहीं; राज्यों की वास्तविक आवश्यकताओं को नीति-निर्माण में स्थान देना भी आवश्यक है।
- चौथी, संकेतकों की सीमाएँ:– राज्यों और जिलों की रैंकिंग उपयोगी हो सकती है, लेकिन केवल संख्यात्मक संकेतक प्रशासन की पूरी गुणवत्ता नहीं बताते। स्थानीय परिस्थितियों और आँकड़ों की विश्वसनीयता को भी ध्यान में रखना चाहिए।
- पाँचवीं, सामाजिक न्याय:– आर्थिक विकास की प्रतिस्पर्धा में कमजोर राज्यों और वंचित समूहों की आवश्यकताएँ पीछे छूट सकती हैं। इसलिए विकास नीति में समान अवसर, सामाजिक सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन को महत्व देना आवश्यक है।
समग्र रूप से नीति आयोग की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी नीतिगत सलाह, संघीय समन्वय और मूल्यांकन संबंधी कार्य वास्तविक विकास परिणामों में कितना योगदान देते हैं।
भारतीय संविधान में विकेंद्रीकृत नियोजन
भारत में विकास नियोजन केवल केंद्र सरकार तक सीमित नहीं है। संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों ने स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक आधार दिया।
- अनुच्छेद 243G: पंचायतों की शक्तियों और जिम्मेदारियों से संबंधित।
- ग्यारहवीं अनुसूची: पंचायतों से संबंधित 29 विषय।
- अनुच्छेद 243W: नगरपालिकाओं की शक्तियों और जिम्मेदारियों से संबंधित।
- बारहवीं अनुसूची: नगरपालिकाओं से संबंधित 18 विषय।
- अनुच्छेद 243ZD: जिला योजना समिति (District Planning Committee)।
- अनुच्छेद 243ZE: महानगरीय योजना समिति (Metropolitan Planning Committee)।
जिला योजना समिति पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार योजनाओं का समेकन करके जिले के लिए प्रारूप विकास योजना तैयार करती है। महानगरीय योजना समिति महानगरीय क्षेत्र के लिए प्रारूप विकास योजना तैयार करने से संबंधित है। विकेंद्रीकृत नियोजन का उद्देश्य स्थानीय आवश्यकताओं को विकास योजनाओं में स्थान देना है। लेकिन इसकी सफलता वित्तीय संसाधनों, प्रशिक्षित कर्मचारियों, प्रशासनिक अधिकारों और स्थानीय निकायों की वास्तविक निर्णय क्षमता पर निर्भर करती है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
- एम. विश्वेश्वरैया – Planned Economy for India (1934)
- राष्ट्रीय नियोजन समिति – 1938; अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू
- बॉम्बे प्लान – 1944
- योजना आयोग – स्थापना: 15 मार्च 1950
- प्रथम पंचवर्षीय योजना – 1951–1956
- द्वितीय पंचवर्षीय योजना – 1956–1961; महालनोबिस मॉडल
- योजना-अवकाश – 1966–1969
- आर्थिक सुधार – 1991
- अंतिम पंचवर्षीय योजना – बारहवीं योजना, 2012–2017
- नीति आयोग – स्थापना: 1 जनवरी 2015
- NITI का पूरा नाम – National Institution for Transforming India
- नीति आयोग का अध्यक्ष – भारत का प्रधानमंत्री
- DMEO – Development Monitoring and Evaluation Office
- आकांक्षी जिला कार्यक्रम – 2018
- जिला योजना समिति – अनुच्छेद 243ZD
- महानगरीय योजना समिति – अनुच्छेद 243ZE
इन्हें भी पढ़े –
नवीन लोक प्रशासन का विकास (Evolution of New Public Administration)
नवीन लोक प्रबंधन का विकास (Evolution of New Public Management)
लोक प्रशासन के शास्त्रीय सिद्धांत: हेनरी फेयोल, लूथर गुलिक और मैरी पार्कर फॉलेट
नौकरशाही का सिद्धांत: मैक्स वेबर
पारिस्थितिकी का सिद्धांत (Ecological Theory of Public Administration) — एफ. डब्ल्यू. रिग्स
विकास प्रशासन एवं कल्याण प्रशासन (Development and Welfare Administration)


