अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में पर्यावरणवाद (Environmentalism)
पर्यावरणवाद का अर्थ एवं अवधारणा
पर्यावरणवाद एक राजनीतिक विचार एवं आंदोलन है, जो प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता की रक्षा तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल देता है। यह मानता है कि आर्थिक विकास का मूल्यांकन केवल उत्पादन और आय की वृद्धि से नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभावों से भी किया जाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पर्यावरणवाद का महत्त्व इसलिए बढ़ा क्योंकि जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, समुद्री प्रदूषण और जैव विविधता का विनाश राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। इन समस्याओं के समाधान के लिए राज्यों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, वैज्ञानिक संस्थाओं और नागरिक समाज के बीच सहयोग आवश्यक है।
पर्यावरणवाद और पारिस्थितिकतावाद में अंतर: पर्यावरणवाद (Environmentalism) सामान्यतः कानूनों, तकनीक और नीतिगत सुधारों से पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान करने पर बल देता है। इसके विपरीत, पारिस्थितिकतावाद (Ecologism) प्रकृति के प्रति मानव के दृष्टिकोण तथा मौजूदा आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन की आवश्यकता पर भी जोर दे सकता है। एंड्रयू डॉब्सन ने Green Political Thought में इस अंतर का व्यवस्थित विश्लेषण किया है।
पर्यावरणवाद का ऐतिहासिक विकास
1. प्रारंभिक संरक्षणवादी दृष्टिकोण
आधुनिक पर्यावरणवाद से पहले भी अनेक समाजों में वन, जल और भूमि संरक्षण की परंपराएँ थीं। औद्योगिक क्रांति के बाद कारखानों, खनन, शहरीकरण और जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से प्रदूषण तथा संसाधनों के क्षरण की समस्याएँ बढ़ीं। इससे औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के संबंध पर बहस शुरू हुई।
2. आधुनिक पर्यावरण आंदोलन: 1960 का दशक
1962 में रैचेल कार्सन की पुस्तक Silent Spring प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने कीटनाशकों, विशेषकर DDT, के पर्यावरणीय प्रभावों पर ध्यान आकर्षित किया। इस पुस्तक ने आधुनिक पर्यावरण चेतना और रासायनिक प्रदूषण के नियमन से संबंधित बहस को व्यापक बनाया। 1972 में क्लब ऑफ रोम से संबंधित शोध रिपोर्ट The Limits to Growth प्रकाशित हुई। इसमें जनसंख्या, औद्योगिक उत्पादन, संसाधनों और प्रदूषण के बीच संबंधों का विश्लेषण किया गया। इसने सीमित प्राकृतिक संसाधनों वाले ग्रह पर निरंतर भौतिक विकास की संभावनाओं पर बहस को बढ़ावा दिया।
3. स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972
संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन (United Nations Conference on the Human Environment) जून 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित हुआ। इसकी घोषणा में 26 सिद्धांत थे। इस सम्मेलन ने पर्यावरण को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख विषय के रूप में स्थापित किया और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।ससम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद सामने आए। विकसित देशों ने प्रदूषण नियंत्रण पर बल दिया, जबकि विकासशील देशों ने गरीबी उन्मूलन, विकास के अधिकार और विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी को महत्त्व दिया।
4. ब्रुंटलैंड रिपोर्ट, 1987
विश्व पर्यावरण एवं विकास आयोग की रिपोर्ट Our Common Future (1987) ने सतत विकास की प्रसिद्ध परिभाषा प्रस्तुत की। इसके अनुसार सतत विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे, लेकिन भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता न करे। इस अवधारणा ने पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक-सामाजिक विकास के बीच समन्वय पर बल दिया।
5. रियो पृथ्वी सम्मेलन, 1992
रियो डी जेनेरियो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन के प्रमुख परिणामों में रियो घोषणा, एजेंडा 21, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) और जैव विविधता अभिसमय शामिल थे। इस सम्मेलन ने सतत विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा किंतु विभेदित जिम्मेदारियों की अवधारणा को वैश्विक पर्यावरणीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया।
6. क्योटो प्रोटोकॉल, 1997
क्योटो प्रोटोकॉल ने विकसित देशों के एक समूह के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए। इसमें विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी को विशेष महत्त्व दिया गया।
7. पेरिस समझौता, 2015
पेरिस समझौते का उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को औद्योगिक-पूर्व स्तर से काफी नीचे 2°C तक सीमित रखना तथा इसे 1.5°C तक सीमित करने के प्रयास करना है। इसके अंतर्गत देश राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions—NDCs) प्रस्तुत करते हैं। इस समझौते ने व्यापक अंतरराष्ट्रीय भागीदारी और राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं को महत्त्व दिया।
पर्यावरणवाद के प्रमुख विचारक
1. रैचेल कार्सन (Rachel Carson)
कार्सन की Silent Spring (1962) ने कीटनाशकों के अनियंत्रित प्रयोग और उनके पारिस्थितिक प्रभावों की आलोचना की। उनका योगदान यह समझाने में है कि तकनीकी प्रगति का मूल्यांकन उसके पर्यावरणीय परिणामों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
2. गैरेट हार्डिन (Garrett Hardin)
हार्डिन ने अपने लेख The Tragedy of the Commons (1968) में साझा संसाधनों की त्रासदी की अवधारणा प्रस्तुत की। जब व्यक्ति अपने निजी लाभ के लिए किसी साझा संसाधन का अत्यधिक उपयोग करते हैं और उसकी क्षति की लागत सभी को उठानी पड़ती है, तो संसाधन का क्षरण हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि सभी देश आर्थिक विकास के लिए वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ाते रहें, तो सामूहिक रूप से जलवायु परिवर्तन गंभीर हो सकता है।
आलोचना:– एलिनॉर ऑस्ट्रॉम ने दिखाया कि उचित नियमों, निगरानी और सामुदायिक सहयोग से साझा संसाधनों का सफल प्रबंधन संभव है। इसलिए साझा संसाधनों का विनाश अनिवार्य नहीं है।
3. आर्ने नेस (Arne Næss)
नेस ने 1973 में अपने लेख The Shallow and the Deep, Long-Range Ecology Movement: A Summary में सतही पारिस्थितिकी और गहन पारिस्थितिकी के बीच अंतर स्पष्ट किया। सतही पारिस्थितिकी मुख्यतः मानव स्वास्थ्य और कल्याण के लिए पर्यावरण संरक्षण पर बल देती है। गहन पारिस्थितिकी प्रकृति के अंतर्निहित मूल्य को स्वीकार करती है और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण की आलोचना करती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रकृति का महत्त्व केवल उसकी मानवीय उपयोगिता तक सीमित नहीं है। इसकी आलोचना यह है कि प्रकृति के व्यापक हितों और गरीब समुदायों की तात्कालिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
4. एलिनॉर ऑस्ट्रॉम (Elinor Ostrom)
ऑस्ट्रॉम की पुस्तक Governing the Commons (1990) साझा संसाधनों के प्रबंधन का प्रमुख अध्ययन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समुदाय उचित नियमों, निगरानी और विवाद-समाधान की व्यवस्थाओं से साझा संसाधनों का संरक्षण कर सकते हैं। उनका दृष्टिकोण हार्डिन की समस्या को संस्थागत आधार पर आगे बढ़ाता है। हार्डिन साझा संसाधनों के अत्यधिक दोहन के जोखिम पर बल देते हैं, जबकि ऑस्ट्रॉम यह समझाती हैं कि प्रभावी संस्थाएँ इस जोखिम को कम कर सकती हैं।
5. एंड्रयू डॉब्सन (Andrew Dobson)
डॉब्सन की पुस्तक Green Political Thought पर्यावरणवाद और पारिस्थितिकतावाद के अध्ययन की प्रमुख कृति है। उनके अनुसार पर्यावरणवाद मौजूदा संस्थाओं में सुधार के माध्यम से पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान खोज सकता है, जबकि पारिस्थितिकतावाद सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था और प्रकृति के साथ मानव संबंधों में बुनियादी परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दे सकता है। उनका योगदान पर्यावरणीय चिंतन को एक व्यापक राजनीतिक विचारधारा के रूप में समझने में है।
पर्यावरणवाद और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांत
पर्यावरणवाद कोई एकल, सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत नहीं है। यह विभिन्न सिद्धांतों के माध्यम से पर्यावरणीय समस्याओं को समझने का अवसर देता है।
1. यथार्थवाद (Realism)
यथार्थवाद राज्य, राष्ट्रीय हित, शक्ति और सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र मानता है। इस दृष्टिकोण से देश पर्यावरणीय समझौतों में अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, कोई देश ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास के कारण जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर रह सकता है तथा उत्सर्जन कटौती के कठोर लक्ष्यों का विरोध कर सकता है।
सीमा:– यथार्थवाद राष्ट्रीय हितों को समझने में उपयोगी है, लेकिन केवल राज्य की शक्ति पर ध्यान देने से वैश्विक न्याय और प्रकृति के स्वतंत्र मूल्य की उपेक्षा हो सकती है।
2. उदारवाद एवं नवउदार संस्थावाद (Liberalism and Neoliberal Institutionalism)
यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, सहयोग और परस्पर निर्भरता को महत्त्व देता है। पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए देश वैज्ञानिक जानकारी साझा कर सकते हैं, सामूहिक लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय समझौते कर सकते हैं। UNFCCC, क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता अंतरराष्ट्रीय सहयोग के प्रमुख उदाहरण हैं।
सीमा:– अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ सहयोग को बढ़ावा देती हैं, लेकिन उनकी सफलता सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति, संसाधनों और समझौतों के क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
3. मार्क्सवादी एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण
यह दृष्टिकोण पर्यावरणीय संकटों को उत्पादन व्यवस्था, पूँजी संचय, आर्थिक असमानता और संसाधनों के असमान वितरण से जोड़ता है। इसके अनुसार पर्यावरणीय क्षति केवल व्यक्तिगत व्यवहार या तकनीकी कमियों का परिणाम नहीं है; आर्थिक व्यवस्था भी इसके कारणों को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, किसी उद्योग से लाभ निजी कंपनी को मिल सकता है, जबकि प्रदूषण की लागत स्थानीय समुदाय और समाज को उठानी पड़ सकती है।
सीमा:– पर्यावरणीय समस्याओं को केवल पूँजीवाद से समझने पर शासन की विफलता, तकनीकी विकल्प और अन्य सामाजिक कारणों की भूमिका कम आँकी जा सकती है।
4. रचनावाद (Constructivism)
रचनावाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विचारों, मानदंडों, पहचानों और साझा धारणाओं की भूमिका पर बल देता है। पर्यावरणीय मुद्दों में यह समझाता है कि जलवायु परिवर्तन को केवल आर्थिक समस्या या राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न के बजाय वैश्विक न्याय और भावी पीढ़ियों की जिम्मेदारी के रूप में देखने से नीतिगत प्राथमिकताएँ बदल सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय मानदंडों और सतत विकास की बढ़ती स्वीकृति को इस दृष्टिकोण से समझा जा सकता है।
5. तुलनात्मक सारांश
सिद्धांत – प्रमुख आधार – पर्यावरणीय राजनीति की व्याख्या
- यथार्थवाद – राज्य और राष्ट्रीय हित – प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और शक्ति
- उदार संस्थावाद – सहयोग और संस्थाएँ – समझौते, नियम और सामूहिक कार्रवाई
- मार्क्सवादी दृष्टिकोण – उत्पादन और आर्थिक असमानता – पर्यावरणीय लागतों का असमान वितरण
- रचनावाद – विचार और मानदंड – पर्यावरणीय चेतना तथा साझा मानकों का विकास
पर्यावरणवाद के प्रमुख सिद्धांत
1. सतत विकास (Sustainable Development)
सतत विकास वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता सुरक्षित रखने पर बल देता है। इसका आधार आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण के बीच समन्वय है। इसका अर्थ आर्थिक विकास को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि उसे पर्यावरणीय सीमाओं और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना है। इसकी आलोचना यह है कि सतत विकास की व्यापक अवधारणा को अलग-अलग सरकारें अलग अर्थों में प्रयोग कर सकती हैं।
2. साझा किंतु विभेदित जिम्मेदारियाँ (CBDR-RC)
यह सिद्धांत मानता है कि पर्यावरण संरक्षण सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी और आर्थिक क्षमताएँ समान नहीं हैं। रियो घोषणा, 1992 के सिद्धांत 7 में इस विचार को प्रमुखता दी गई। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में इसका अर्थ है कि विकसित देशों की ऐतिहासिक भूमिका और विकासशील देशों की विकास संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसका मुख्य विवाद: विकसित देश वर्तमान उत्सर्जन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की क्षमताओं पर जोर देते हैं, जबकि विकासशील देश ऐतिहासिक उत्सर्जन, वित्तीय सहायता और विकास के अधिकार को महत्त्व देते हैं।
3. सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle)
यदि किसी गतिविधि से गंभीर या अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति की आशंका हो, तो पूर्ण वैज्ञानिक निश्चितता न होने को सुरक्षात्मक उपाय टालने का पर्याप्त कारण नहीं मानना चाहिए। रियो घोषणा का सिद्धांत 15 इस दृष्टिकोण से संबंधित है। इसका अर्थ है कि गंभीर पर्यावरणीय जोखिमों की स्थिति में उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर समय रहते सावधानीपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।
4. प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle)
इस सिद्धांत के अनुसार प्रदूषण को रोकने और उससे होने वाली पर्यावरणीय क्षति की लागत प्रदूषण उत्पन्न करने वाले पक्ष को वहन करनी चाहिए। यह सिद्धांत बाह्यताओं (Externalities) से जुड़ा है। यदि कोई उद्योग प्रदूषण की लागत को अपनी उत्पादन लागत में शामिल नहीं करता, तो समाज को उसका बोझ उठाना पड़ सकता है। प्रदूषक भुगतान सिद्धांत इस लागत को जिम्मेदार पक्ष पर डालने का प्रयास करता है।
5. अंतरपीढ़ीगत न्याय (Intergenerational Justice)
इस अवधारणा के अनुसार वर्तमान पीढ़ी को प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस तरह करना चाहिए कि भावी पीढ़ियों के जीवन और विकास के अवसर नष्ट न हों। जलवायु परिवर्तन इसका उदाहरण है, क्योंकि वर्तमान उत्सर्जन के प्रभाव लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इसीलिए पर्यावरणीय नीतियों में दीर्घकालीन परिणामों और भावी पीढ़ियों के हितों पर विचार आवश्यक है।
अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय शासन
अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय शासन (Global Environmental Governance) में वे संस्थाएँ, नियम और समझौते शामिल हैं जिनके माध्यम से देश पर्यावरणीय समस्याओं पर सहयोग करते हैं।
1. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)
UNEP की स्थापना 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद हुई। यह पर्यावरणीय मुद्दों पर वैज्ञानिक जानकारी, नीति-निर्माण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है। इसकी प्रभावशीलता सदस्य देशों के सहयोग और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करती है।
2. UNFCCC
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) को 1992 में अपनाया गया और यह 1994 में लागू हुआ। इसका उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को ऐसे स्तर पर स्थिर करने की दिशा में कार्रवाई करना है जिससे जलवायु प्रणाली में खतरनाक मानव-जनित हस्तक्षेप रोका जा सके। इसके अंतर्गत पक्षकारों का सम्मेलन (Conference of the Parties—COP) जलवायु वार्ताओं का प्रमुख मंच है।
3. क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता
क्योटो प्रोटोकॉल
- वर्ष – 1997
- मुख्य व्यवस्था – विकसित देशों के एक समूह के लिए बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य
- प्रमुख विशेषता – विभेदित उत्सर्जन प्रतिबद्धताएँ
- चुनौती – सीमित भागीदारी और लक्ष्य-व्यवस्था की सीमाएँ
पेरिस समझौता
- वर्ष – 2015
- मुख्य व्यवस्था – सभी पक्षों के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs)
- प्रमुख विशेषता – व्यापक भागीदारी और समय-समय पर प्रगति की समीक्षा
- चुनौती – राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं और आवश्यक वैश्विक कार्रवाई के बीच अंतर
इन समझौतों से स्पष्ट होता है कि पर्यावरणीय शासन में विकसित देशों की जिम्मेदारी, सभी देशों की भागीदारी और वास्तविक उत्सर्जन कटौती के बीच संतुलन महत्त्वपूर्ण है।
4. गैर-राज्य अभिकर्ताओं की भूमिका
वैज्ञानिक संस्थाएँ पर्यावरणीय प्रमाण उपलब्ध कराती हैं, गैर-सरकारी संगठन जन-जागरूकता बढ़ाते हैं और नागरिक आंदोलन सरकारों पर कार्रवाई का दबाव डालते हैं। निजी कंपनियाँ स्वच्छ तकनीक के विकास में योगदान दे सकती हैं, लेकिन प्रभावी नियमन के अभाव में पर्यावरणीय लागतों को समाज पर डालने का जोखिम भी रहता है। इसलिए पर्यावरणीय शासन में राज्य, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, वैज्ञानिक समुदाय और नागरिक समाज की भूमिकाओं के बीच समन्वय आवश्यक है।
पर्यावरणवाद, सुरक्षा और भू-राजनीति
1. पर्यावरणीय सुरक्षा (Environmental Security)
पर्यावरणीय सुरक्षा का संबंध उन पर्यावरणीय स्थितियों से है जो मानव जीवन, आजीविका, सामाजिक स्थिरता और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। जल संकट, भूमि क्षरण, खाद्य असुरक्षा और चरम मौसमी घटनाएँ समुदायों की संवेदनशीलता बढ़ा सकती हैं। हालाँकि, पर्यावरणीय संकट को सीधे युद्ध का कारण नहीं माना जा सकता। संसाधनों की कमी से संघर्ष होगा या सहयोग, यह शासन की गुणवत्ता, संसाधनों के वितरण और संस्थागत व्यवस्था जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है।
2. मानव सुरक्षा (Human Security)
मानव सुरक्षा का दृष्टिकोण व्यक्ति के जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, आजीविका और सुरक्षित पर्यावरण को महत्त्व देता है। जलवायु परिवर्तन से कृषि, स्वास्थ्य और आवास प्रभावित हो सकते हैं। गरीब समुदायों के पास इन प्रभावों से निपटने के साधन कम होने के कारण वे अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
3 जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति
स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण से सौर ऊर्जा, बैटरी और विद्युत वाहनों के लिए आवश्यक खनिजों का रणनीतिक महत्त्व बढ़ा है। इनके उत्पादन और आपूर्ति पर देशों की निर्भरता सहयोग के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा भी पैदा करती है।
इस प्रकार पर्यावरणवाद ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता, वैश्विक व्यापार और राष्ट्रीय हितों के अध्ययन में भी उपयोगी है।
पर्यावरणीय न्याय और उत्तर-दक्षिण संबंध
पर्यावरणीय न्याय (Environmental Justice) का संबंध पर्यावरणीय लाभों, जोखिमों और निर्णय लेने की शक्ति के न्यायपूर्ण वितरण से है।
1. वैश्विक उत्तर और वैश्विक दक्षिण
विकसित देशों ने औद्योगीकरण के दौरान प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक उपयोग किया है। दूसरी ओर, विकासशील देशों को गरीबी उन्मूलन, ऊर्जा उपलब्धता और औद्योगिक विकास की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए विकासशील देश जलवायु वार्ताओं में ऐतिहासिक जिम्मेदारी, वित्तीय सहायता, तकनीकी हस्तांतरण और विकास के अधिकार पर जोर देते हैं। वहीं जलवायु परिवर्तन को सीमित करने के लिए वर्तमान के प्रमुख उत्सर्जक देशों की प्रभावी कार्रवाई भी आवश्यक है।
2. जलवायु न्याय (Climate Justice)
जलवायु न्याय के तीन प्रमुख प्रश्न हैं:
- उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी किसकी कितनी हो?
- जलवायु परिवर्तन से होने वाली क्षति और अनुकूलन की लागत कौन वहन करे?
- प्रभावित समुदायों को निर्णय-प्रक्रिया में कितनी भागीदारी मिले?
इन प्रश्नों का उत्तर ऐतिहासिक उत्सर्जन, वर्तमान क्षमताओं, विकास संबंधी आवश्यकताओं और जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखकर दिया जाता है। इसी कारण जलवायु न्याय अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय कूटनीति का प्रमुख मुद्दा है।
भारतीय संदर्भ में पर्यावरणवाद
1. चिपको आंदोलन
1970 के दशक में उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में चिपको आंदोलन विकसित हुआ। गौरा देवी सहित अनेक स्थानीय महिलाओं ने पेड़ों की कटाई का विरोध किया। यह आंदोलन वन संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों की आजीविका और प्राकृतिक संसाधनों पर उनकी निर्भरता से जुड़ा था। इसने पर्यावरणीय निर्णयों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी के महत्त्व को उजागर किया।
2. नर्मदा बचाओ आंदोलन
नर्मदा घाटी में बाँध परियोजनाओं के कारण विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बहस को आगे बढ़ाया। मेधा पाटकर इस आंदोलन की प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल थीं। इस आंदोलन ने स्पष्ट किया कि विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल बिजली, सिंचाई या आर्थिक लाभों से नहीं, बल्कि विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय लागतों के आधार पर भी होना चाहिए।
3 भारतीय संविधान और पर्यावरण संरक्षण
- अनुच्छेद 48A: राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा का प्रयास करने का निर्देश देता है। यह राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों में शामिल है।
- अनुच्छेद 51A(g): नागरिकों का मूल कर्तव्य है कि वे प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें वन, झीलें, नदियाँ और वन्यजीव शामिल हैं, की रक्षा एवं सुधार करें।
- अनुच्छेद 21: सर्वोच्च न्यायालय ने जीवन के अधिकार की व्याख्या में स्वस्थ पर्यावरण और प्रदूषण-मुक्त जीवन के महत्त्व को स्वीकार किया है।
इसके अतिरिक्त पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 भारतीय पर्यावरणीय शासन के महत्त्वपूर्ण कानूनी आधार हैं।
4 भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका
भारत अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में जलवायु न्याय, विकास के अधिकार, वित्तीय सहायता और तकनीकी हस्तांतरण पर जोर देता है। साथ ही, भारत को ऊर्जा की बढ़ती मांग, गरीबी उन्मूलन, नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए भारत की पर्यावरण नीति में विकास संबंधी आवश्यकताओं और वैश्विक पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन महत्त्वपूर्ण है।
पर्यावरणवाद का आलोचनात्मक मूल्यांकन
पर्यावरणवाद ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पर्यावरण संरक्षण, मानव सुरक्षा और वैश्विक न्याय को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। फिर भी, इसकी नीतियों और वैचारिक मान्यताओं से संबंधित कुछ प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
- विकास और पर्यावरण संरक्षण का संघर्ष:– विकासशील देशों को रोजगार, ऊर्जा और आधारभूत संरचना की आवश्यकता है, लेकिन पारंपरिक विकास पद्धतियाँ प्रदूषण और संसाधनों के क्षरण को बढ़ा सकती हैं। इसलिए स्वच्छ तकनीक और न्यायपूर्ण विकास नीतियों की आवश्यकता है।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सीमा:– पर्यावरणीय समस्याएँ वैश्विक हैं, लेकिन राज्य अक्सर अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं। अंतरराष्ट्रीय समझौते तभी प्रभावी होते हैं जब देश अपनी प्रतिबद्धताओं को लागू करें।
- आर्थिक असमानता:– पर्यावरणीय क्षति का बोझ अक्सर गरीब समुदायों पर अधिक पड़ता है, जबकि संसाधनों के दोहन से लाभ अन्य समूहों को मिल सकता है। इसलिए पर्यावरणीय नीतियों में न्यायपूर्ण वितरण आवश्यक है।
- तकनीकी समाधान की सीमा:– स्वच्छ तकनीक पर्यावरणीय क्षति कम कर सकती है, लेकिन अकेले तकनीकी सुधार पर्याप्त नहीं हैं। उत्पादन, उपभोग और संसाधन प्रबंधन की नीतियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
- लोकतांत्रिक भागीदारी:– पर्यावरण संरक्षण से जुड़े निर्णयों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सार्वजनिक उत्तरदायित्व आवश्यक हैं। इनके अभाव में संरक्षण नीतियाँ भी सामाजिक असमानता बढ़ा सकती हैं।
इस प्रकार पर्यावरणवाद की सफलता पर्यावरणीय प्रभावशीलता, आर्थिक व्यवहार्यता, सामाजिक न्याय और प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग के समन्वय पर निर्भर करती है।
निष्कर्ष
पर्यावरणवाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्त्वपूर्ण विषय है, क्योंकि यह राज्य की शक्ति और राष्ट्रीय हितों के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा, सतत विकास तथा वैश्विक न्याय को भी महत्त्व देता है। स्टॉकहोम सम्मेलन (1972), रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992), क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौते (2015) ने पर्यावरणीय मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का प्रमुख हिस्सा बनाया। हार्डिन और ऑस्ट्रॉम के विचार साझा संसाधनों के प्रबंधन की समस्या और उसके संस्थागत समाधान को समझाते हैं। नेस और डॉब्सन पर्यावरणीय विचारधारा के नैतिक एवं राजनीतिक पक्षों को स्पष्ट करते हैं। वहीं यथार्थवाद, उदार संस्थावाद, मार्क्सवादी दृष्टिकोण और रचनावाद पर्यावरणीय राजनीति के अलग-अलग पहलुओं की व्याख्या करते हैं।
परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य
- Silent Spring – रैचेल कार्सन, 1962
- The Tragedy of the Commons – गैरेट हार्डिन, 1968
- स्टॉकहोम सम्मेलन – 1972
- गहन पारिस्थितिकी – आर्ने नेस, 1973
- Our Common Future – विश्व पर्यावरण एवं विकास आयोग, 1987
- Governing the Commons – एलिनॉर ऑस्ट्रॉम, 1990
- रियो पृथ्वी सम्मेलन – 1992
- UNFCCC लागू हुआ – 1994
- क्योटो प्रोटोकॉल – 1997
- पेरिस समझौता – 2015
- साझा किंतु विभेदित जिम्मेदारियाँ – रियो घोषणा का सिद्धांत 7
- सावधानी सिद्धांत – रियो घोषणा का सिद्धांत 15
- अनुच्छेद 48A – राज्य का पर्यावरण संरक्षण संबंधी नीति-निदेशक तत्त्व
- अनुच्छेद 51A(g) – नागरिकों का पर्यावरण संरक्षण संबंधी मूल कर्तव्य
महत्वपूर्ण पुस्तकें –
- Rachel Carson, — Silent Spring (1962).
- Garrett Hardin, — “The Tragedy of the Commons” — Science (1968).
- Arne Næss, — “The Shallow and the Deep, Long-Range Ecology Movement: A Summary” — Inquiry (1973).
- World Commission on Environment and Development — Our Common Future (1987).
- Elinor Ostrom, — Governing the Commons: The Evolution of Institutions for Collective Action — Cambridge University Press (1990).
- Andrew Dobson, — Green Political Thought — Routledge.
- United Nations — Rio Declaration on Environment and Development (1992).
- UNFCCC — जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय, क्योटो प्रोटोकॉल एवं पेरिस समझौते के आधिकारिक दस्तावेज।
इन्हें भी पढ़े –
यथार्थवाद और नव-यथार्थवाद (Realism and Neo-Realism)
उदारवाद और नव-उदारवाद (Liberalism and Neoliberalism)
सामाजिक संरचनावाद (Social Constructivism)
क्रिटिकल थ्योरी (Critical Theory)


