Skip to content
Home » राज्य की अवधारणा

राज्य की अवधारणा

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राज्य की अवधारणा, संप्रभुता और राष्ट्रीय सीमाओं को दर्शाता चित्र

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (International Relations) में राज्य की अवधारणा (Concept of State)

राज्य का अर्थ एवं अवधारणा

राज्य (State) आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था की प्रमुख इकाई है। यह एक ऐसा राजनीतिक संगठन है जिसके पास निश्चित भू-भाग, स्थायी जनसंख्या, सरकार और संप्रभुता होती है। राज्य कानून बनाता है, प्रशासन चलाता है, आंतरिक व्यवस्था बनाए रखता है तथा अन्य राज्यों के साथ संबंध स्थापित करता है।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (International Relations) में राज्य का विशेष महत्त्व है, क्योंकि कूटनीति, युद्ध, शांति, राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के अधिकांश अध्ययन में राज्य प्रमुख भूमिका निभाता है। यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और गैर-सरकारी संगठन भी प्रभावशाली हैं, फिर भी राज्य अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की केंद्रीय इकाई बना हुआ है।

राज्य, सरकार और राष्ट्र में अंतर है। राज्य एक स्थायी राजनीतिक एवं कानूनी संगठन है, जबकि सरकार उसके संचालन का माध्यम है। राष्ट्र साझा इतिहास, संस्कृति, भाषा या सामूहिक पहचान वाला समुदाय हो सकता है। इसलिए प्रत्येक राष्ट्र का अपना स्वतंत्र राज्य होना आवश्यक नहीं है।

राज्य के आवश्यक तत्त्व (Essential Elements of State)

1933 के मोंटेवीडियो अभिसमय (Montevideo Convention) के अनुच्छेद 1 में राज्य के चार प्रमुख गुण बताए गए हैं।

1. स्थायी जनसंख्या (Permanent Population)

जनसंख्या राज्य का मानवीय आधार है। राज्य के नागरिक और निवासी ही उसकी राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करते हैं। जनसंख्या के लिए किसी एक भाषा, धर्म या संस्कृति का होना आवश्यक नहीं है। भारत जैसे राज्य में अनेक भाषायी, धार्मिक और सांस्कृतिक समुदाय रहते हैं।

2. निश्चित भू-भाग (Defined Territory)

राज्य का एक भौगोलिक क्षेत्र होता है, जहाँ वह अपने अधिकारों का प्रयोग करता है। सीमा-विवाद होने मात्र से किसी राज्य का अस्तित्व स्वतः समाप्त नहीं होता। भू-भाग का महत्त्व राष्ट्रीय सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधनों, व्यापारिक मार्गों और पड़ोसी राज्यों के साथ संबंधों से जुड़ा है।

3. सरकार (Government)

सरकार राज्य की नीतियों को लागू करने और प्रशासन चलाने वाली संस्था है। इसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी संस्थाएँ शामिल हो सकती हैं। सरकार बदलने पर राज्य का अस्तित्व सामान्यतः बना रहता है। उदाहरण के लिए, भारत में विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें बनने के बावजूद भारतीय राज्य की निरंतरता बनी रहती है।

4. संप्रभुता (Sovereignty)

संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता और बाहरी स्वतंत्रता को दर्शाती है। इसके दो प्रमुख पक्ष हैं:

  1. आंतरिक संप्रभुता:– राज्य के अधिकार-क्षेत्र में सर्वोच्च सार्वजनिक सत्ता।
  2. बाहरी संप्रभुता:– दूसरे राज्य के अधीन हुए बिना स्वतंत्र रूप से कार्य करने की स्थिति।

आधुनिक संप्रभुता का अर्थ असीमित स्वतंत्रता नहीं है। राज्य अंतर्राष्ट्रीय कानून और अपनी स्वीकार की गई संधियों से जुड़े दायित्वों के अधीन भी होते हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(1) सदस्य राज्यों की संप्रभु समानता को मान्यता देता है।

राज्य से संबंधित प्रमुख अवधारणाएँ

  • राज्य (State) – निश्चित भू-भाग, जनसंख्या, सरकार और संप्रभुता वाला राजनीतिक संगठन
  • राष्ट्र (Nation) – साझा पहचान, इतिहास, संस्कृति या राजनीतिक आकांक्षा वाला समुदाय
  • सरकार (Government) – राज्य का संचालन करने वाली संस्थाएँ और पदाधिकारी
  • समाज (Society) – सामाजिक संबंधों, समूहों और संस्थाओं का व्यापक क्षेत्र
  • शासन-व्यवस्था (Regime) – सत्ता के गठन, प्रयोग और नियंत्रण से संबंधित नियम एवं संस्थाएँ
  • राष्ट्र-राज्य (Nation-State) – ऐसी राजनीतिक व्यवस्था जिसमें राज्य और राष्ट्र की पहचान में पर्याप्त मेल हो

राज्य और राष्ट्र का पूर्ण मेल आवश्यक नहीं है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक राज्य में अनेक भाषायी और सामाजिक पहचानें एक साझा राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत रहती हैं। इसी प्रकार शासन-व्यवस्था बदलने से राज्य का अस्तित्व स्वतः समाप्त नहीं होता।

राज्य का ऐतिहासिक विकास

1. प्राचीन काल

प्राचीन यूनान में नगर-राज्य (City-State) राजनीतिक संगठन का प्रमुख रूप था। प्लेटो ने Republic में न्यायपूर्ण राज्य की चर्चा की, जबकि अरस्तू ने Politics में राजनीतिक समुदाय और अच्छे जीवन के संबंध का विश्लेषण किया। प्राचीन भारत में महाजनपद, गण-संघ और राजतंत्रीय व्यवस्थाएँ राजनीतिक संगठन के विभिन्न रूप थे। हालाँकि इन व्यवस्थाओं को आधुनिक संप्रभु राज्य के समान नहीं माना जा सकता, लेकिन वे राजनीतिक सत्ता और प्रशासन के ऐतिहासिक विकास को समझने में उपयोगी हैं।

2. मध्यकाल

मध्यकालीन यूरोप में सत्ता राजा, सामंतों, चर्च और नगरों के बीच विभाजित थी। किसी एक केंद्रीय सत्ता का पूरे क्षेत्र पर समान नियंत्रण सामान्य स्थिति नहीं थी। बाद में प्रशासनिक केंद्रीकरण, कर-व्यवस्था और स्थायी सेनाओं के विकास ने आधुनिक राज्य के निर्माण में योगदान दिया।

3. आधुनिक राज्य का उदय

आधुनिक संप्रभु राज्य का विकास यूरोप में एक दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में हुआ। धार्मिक संघर्षों, युद्धों, केंद्रीकृत प्रशासन और राजसत्ता के विस्तार ने इसमें योगदान दिया। 1648 की वेस्टफेलिया की शांति (Peace of Westphalia) को आधुनिक संप्रभु राज्य-व्यवस्था के विकास का महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। हालाँकि आधुनिक संप्रभुता की पूरी व्यवस्था उसी वर्ष अचानक स्थापित नहीं हुई थी; उसका विकास क्रमिक रूप से हुआ।

राज्य की उत्पत्ति एवं प्रकृति के प्रमुख सिद्धांत

1 सामाजिक अनुबंध सिद्धांत (Social Contract Theory)

सामाजिक अनुबंध सिद्धांत राज्य की वैधता को व्यक्तियों की सहमति और राजनीतिक सत्ता की आवश्यकता के आधार पर समझाता है। इसके तीन प्रमुख विचारक हॉब्स, लॉक और रूसो हैं।

  1. थॉमस हॉब्स:– अपनी पुस्तक Leviathan (1651) में हॉब्स ने तर्क दिया कि साझा सत्ता के अभाव में असुरक्षा और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए शांति और सुरक्षा के लिए शक्तिशाली संप्रभु सत्ता आवश्यक है। उनका विचार राज्य की सुरक्षा-संबंधी भूमिका को स्पष्ट करता है।
  2. जॉन लॉक:– Two Treatises of Government (1689) में लॉक ने प्राकृतिक अधिकारों, सहमति और सीमित सरकार पर बल दिया। उनके अनुसार सरकार का उद्देश्य जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति जैसे अधिकारों की रक्षा करना है। यदि सरकार अपने दायित्वों का गंभीर उल्लंघन करे, तो उसके विरुद्ध प्रतिरोध का अधिकार उत्पन्न हो सकता है।
  3. जाँ-जाक रूसो:– The Social Contract (1762) में रूसो ने जन-संप्रभुता और सामान्य इच्छा (General Will) पर बल दिया। उनके अनुसार वैध राजनीतिक व्यवस्था में नागरिक सामूहिक रूप से कानून निर्माण के भागीदार होते हैं।

तुलना: हॉब्स के लिए सुरक्षा, लॉक के लिए प्राकृतिक अधिकार और सीमित सरकार तथा रूसो के लिए सामूहिक स्वशासन प्रमुख हैं। सामाजिक अनुबंध को राज्य की उत्पत्ति का प्रमाणित ऐतिहासिक विवरण नहीं, बल्कि राजनीतिक सत्ता की वैधता समझाने वाला दार्शनिक सिद्धांत माना जाना चाहिए।

2. उदारवादी दृष्टिकोण (Liberal Perspective)

उदारवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता, अधिकारों, कानून के शासन और सीमित सरकार को महत्त्व देता है। इसके अनुसार राज्य अधिकारों की रक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है, लेकिन अनियंत्रित राज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में उदारवाद राज्य के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, आर्थिक परस्पर निर्भरता और सहयोग की भूमिका पर भी बल देता है। रॉबर्ट केओहेन की After Hegemony (1984) में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से सहयोग की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है।

3. मार्क्सवादी दृष्टिकोण (Marxist Perspective)

मार्क्सवादी दृष्टिकोण राज्य को वर्ग-संबंधों और आर्थिक संरचना के संदर्भ में समझता है। मार्क्स और एंगेल्स की The Communist Manifesto (1848) पूँजीवादी समाज की वर्गीय संरचना और राजनीतिक सत्ता के संबंध को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। मार्क्सवादी व्याख्या के अनुसार राज्य की नीतियाँ आर्थिक शक्ति और वर्गीय हितों से प्रभावित हो सकती हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में यह दृष्टिकोण वैश्विक पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, आर्थिक निर्भरता और अंतर्राष्ट्रीय असमानता को समझने में उपयोगी है। इसकी सीमा यह है कि राज्य की सभी नीतियों को केवल आर्थिक या वर्गीय हितों से नहीं समझा जा सकता। राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीतिक संस्थाएँ और विचारधारा भी राज्य के निर्णयों को प्रभावित करती हैं।

4. मैक्स वेबर का दृष्टिकोण

मैक्स वेबर ने अपने व्याख्यान Politics as a Vocation (1919) में आधुनिक राज्य को ऐसे राजनीतिक समुदाय के रूप में समझाया जो एक निश्चित क्षेत्र में वैध भौतिक बल-प्रयोग पर एकाधिकार का सफलतापूर्वक दावा करता है। इस अवधारणा में दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं। राज्य के पास बल-प्रयोग की क्षमता होती है और उसके बल-प्रयोग को वैधता प्राप्त होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, कानून के अंतर्गत पुलिस द्वारा कार्रवाई और किसी निजी समूह द्वारा मनमानी हिंसा अलग-अलग हैं। वेबर का दृष्टिकोण राज्य की वैधता, प्रशासनिक क्षमता और कानून के शासन को समझने में उपयोगी है।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राज्य: प्रमुख सिद्धांत

1. यथार्थवाद (Realism)

यथार्थवाद राज्य को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख अभिनेता मानता है। इसके अनुसार अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में कोई सर्वोच्च विश्व-सरकार नहीं है, इसलिए राज्य अपनी सुरक्षा, शक्ति और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं। हांस मॉर्गेन्थाऊ ने Politics Among Nations में राष्ट्रीय हित और शक्ति को विदेश नीति के विश्लेषण का आधार बनाया। केनेथ वॉल्ट्ज ने Theory of International Politics (1979) में अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की अराजक संरचना और राज्यों के बीच शक्ति-वितरण पर बल दिया। इसकी प्रमुख अवधारणा—अराजकता (Anarchy): इसका अर्थ पूर्ण अव्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था है जिसमें राज्यों के ऊपर कोई एक विश्व-सरकार नहीं है।

सीमा:– यथार्थवाद शक्ति और सुरक्षा को प्रभावी ढंग से समझाता है, लेकिन सहयोग, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, घरेलू राजनीति और विचारों की भूमिका को कभी-कभी कम महत्त्व देता है।

2. उदारवाद (Liberalism)

उदारवाद मानता है कि राज्य केवल प्रतिस्पर्धा और संघर्ष में ही शामिल नहीं होते, बल्कि साझा हितों के आधार पर सहयोग भी कर सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ सूचना के आदान-प्रदान, नियमों के निर्माण और समझौतों के पालन में सहायता कर सकती हैं। यह दृष्टिकोण व्यापार, आर्थिक परस्पर निर्भरता और बहुपक्षीय संस्थाओं के महत्त्व को स्पष्ट करता है। इसकी सीमा यह है कि सहयोग हमेशा संभव या समान रूप से लाभकारी नहीं होता; शक्ति-असमानता और राष्ट्रीय हित सहयोग को प्रभावित करते हैं।

3. मार्क्सवाद एवं आलोचनात्मक राजनीतिक अर्थव्यवस्था

यह दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को वैश्विक पूँजीवाद, वर्ग-संबंधों और आर्थिक असमानता के संदर्भ में समझता है। इसके अनुसार औपचारिक रूप से संप्रभु राज्य भी वैश्विक आर्थिक संरचनाओं के कारण अपने नीतिगत विकल्पों में सीमित हो सकते हैं। इसकी विशेषता आर्थिक शक्ति और संरचनात्मक असमानताओं का विश्लेषण है। इसकी सीमा यह है कि आर्थिक संरचना के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीतिक संस्थाओं और विचारधारा की स्वतंत्र भूमिका को भी समझना आवश्यक है।

4. रचनावाद (Constructivism)

रचनावाद के अनुसार राज्यों के हित और पहचान केवल भौतिक शक्ति से निर्धारित नहीं होते; विचार, सामाजिक मानदंड, ऐतिहासिक अनुभव और दूसरे राज्यों के प्रति धारणाएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। अलेक्जेंडर वेंड्ट ने Social Theory of International Politics (1999) में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सामाजिक निर्माण पर बल दिया। रचनावाद यह समझने में मदद करता है कि समान भौतिक परिस्थितियों में भी राज्य दूसरे देशों को अलग-अलग रूपों में क्यों देखते हैं।

सीमा: विचारों और पहचान की भूमिका महत्त्वपूर्ण है, लेकिन विदेश नीति को समझने के लिए भौतिक शक्ति, आर्थिक संसाधनों और संस्थागत परिस्थितियों का अध्ययन भी आवश्यक है।

नोट – सिद्धांत – राज्य के व्यवहार का प्रमुख आधार

  • यथार्थवाद – शक्ति, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित
  • उदारवाद – सहयोग, संस्थाएँ और परस्पर निर्भरता
  • मार्क्सवाद – वर्ग-संबंध, पूँजीवाद और आर्थिक असमानता
  • रचनावाद – पहचान, विचार और सामाजिक मानदंड

संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय कानून

संप्रभुता राज्य की स्वतंत्रता का आधार है, लेकिन आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में राज्य अंतर्राष्ट्रीय नियमों और दायित्वों से भी बँधे होते हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के दो प्रावधान विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं:

  • अनुच्छेद 2(1): सदस्य राज्यों की संप्रभु समानता।
  • अनुच्छेद 2(4): दूसरे राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल की धमकी अथवा बल-प्रयोग पर सामान्य निषेध।

बल-प्रयोग संबंधी नियमों को समझते समय चार्टर के अन्य प्रावधानों, विशेषतः आत्मरक्षा और सुरक्षा परिषद की कार्रवाई से जुड़े प्रावधानों को भी ध्यान में रखना चाहिए। संप्रभु समानता का अर्थ यह नहीं कि सभी राज्यों की वास्तविक शक्ति समान है। सैन्य क्षमता, आर्थिक संसाधन, तकनीक और कूटनीतिक प्रभाव के आधार पर राज्यों की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति में अंतर हो सकता है।

राज्य की मान्यता (Recognition of State)

जब कोई राजनीतिक इकाई स्वतंत्र राज्य होने का दावा करती है, तो अन्य राज्यों द्वारा उसकी मान्यता का प्रश्न उठता है।

  1. घोषणात्मक सिद्धांत (Declaratory Theory):– इसके अनुसार राज्य का अस्तित्व मुख्यतः उसके वस्तुगत गुणों पर निर्भर करता है। मोंटेवीडियो अभिसमय का अनुच्छेद 3 इस विचार का समर्थन करता है कि राज्य का राजनीतिक अस्तित्व अन्य राज्यों की मान्यता से स्वतंत्र है।
  2. संस्थापक सिद्धांत (Constitutive Theory):– इसके अनुसार दूसरे राज्यों की मान्यता राज्य की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और संबंधों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

व्यवहार में राज्यत्व के वस्तुगत गुण और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता अलग प्रश्न हैं। मान्यता की कमी किसी इकाई के राजनयिक संबंधों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में भागीदारी को प्रभावित कर सकती है।

वैश्वीकरण और राज्य की बदलती भूमिका

वैश्वीकरण (Globalization) ने राज्य की भूमिका को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसकी चुनौतियों को जटिल बनाया है। व्यापार, पूँजी, तकनीक और सूचना के सीमापार प्रवाह के कारण राष्ट्रीय नीतियाँ दूसरे देशों को भी प्रभावित करती हैं। जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय अस्थिरता जैसी समस्याओं के समाधान के लिए राज्यों को सहयोग करना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाएँ इस सहयोग के लिए मंच प्रदान करती हैं। इसके बावजूद राज्य कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक सेवाओं और आर्थिक नीतियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः वैश्वीकरण का अर्थ राज्य का अंत नहीं, बल्कि उसकी स्वायत्तता, क्षमता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के स्वरूप में परिवर्तन है।

राज्य की अवधारणा का आलोचनात्मक मूल्यांकन

राज्य की पारंपरिक अवधारणा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ हैं।

  1. राज्य को एक एकीकृत अभिनेता मानने से घरेलू राजनीति, राजनीतिक दलों और विभिन्न सामाजिक समूहों के प्रभाव की उपेक्षा हो सकती है।
  2. कानूनी संप्रभुता और वास्तविक क्षमता में अंतर होता है। कोई राज्य औपचारिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी प्रशासनिक कमजोरी, आर्थिक निर्भरता या आंतरिक संघर्ष के कारण अपने पूरे क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में कठिनाई अनुभव कर सकता है।
  3. राज्य-केंद्रित दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका को कम करके आँक सकता है।

इसलिए राज्य का संतुलित अध्ययन आवश्यक है। यथार्थवाद सुरक्षा और शक्ति, उदारवाद सहयोग, मार्क्सवाद आर्थिक असमानता और रचनावाद पहचान एवं विचारों की भूमिका को स्पष्ट करता है। इन सभी दृष्टिकोणों को साथ रखकर राज्य की प्रकृति और अंतर्राष्ट्रीय भूमिका को अधिक व्यापक रूप से समझा जा सकता है।

निष्कर्ष

राज्य आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की प्रमुख राजनीतिक और कानूनी इकाई है। उसके आवश्यक तत्त्व हैं—स्थायी जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और अन्य राज्यों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता। संप्रभुता राज्य की स्वतंत्रता का आधार है, लेकिन आधुनिक व्यवस्था में उसका प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय कानून और पारस्परिक दायित्वों के संदर्भ में होता है। राज्य की प्रकृति को अलग-अलग सिद्धांत विभिन्न दृष्टिकोणों से समझाते हैं। यथार्थवाद शक्ति और सुरक्षा, उदारवाद सहयोग, मार्क्सवाद आर्थिक संरचना तथा रचनावाद पहचान और विचारों पर बल देता है। वैश्वीकरण के बावजूद राज्य की भूमिका समाप्त नहीं हुई है; बल्कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में उसकी क्षमता तथा सहयोग दोनों महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं।

परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • मोंटेवीडियो अभिसमय – 1933; अनुच्छेद 1 में राज्य के चार गुण
  • हॉब्स – Leviathan (1651); शक्तिशाली संप्रभु सत्ता
  • लॉक – Two Treatises of Government (1689); प्राकृतिक अधिकार
  • रूसो – The Social Contract (1762); सामान्य इच्छा
  • वेस्टफेलिया की शांति – 1648; आधुनिक संप्रभु राज्य-व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण पड़ाव
  • मैक्स वेबर – Politics as a Vocation (1919); वैध भौतिक बल-प्रयोग पर एकाधिकार का दावा
  • मॉर्गेन्थाऊ – यथार्थवाद, राष्ट्रीय हित और शक्ति
  • केनेथ वॉल्ट्ज – Theory of International Politics (1979); नवयथार्थवाद
  • रॉबर्ट केओहेन – After Hegemony (1984); अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
  • अलेक्जेंडर वेंड्ट – Social Theory of International Politics (1999); रचनावाद
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर – अनुच्छेद 2(1): संप्रभु समानता; अनुच्छेद 2(4): बल-प्रयोग पर सामान्य निषेध

महत्वपूर्ण पुस्तकें –

  • Thomas Hobbes, — Leviathan (1651).
  • John Locke, — Two Treatises of Government (1689).
  • Jean-Jacques Rousseau, — The Social Contract (1762).
  • Max Weber, — Politics as a Vocation (1919).
  • Hans J. Morgenthau, — Politics Among Nations: The Struggle for Power and Peace.
  • Kenneth N. Waltz, — Theory of International Politics (1979).
  • Robert O. Keohane, — After Hegemony (1984).
  • Alexander Wendt, — Social Theory of International Politics (1999).
  • John M. Hobson, — The State and International Relations (2000).
  • Montevideo Convention on Rights and Duties of States (1933).
  • Charter of the United Nations (1945).

इन्हें भी पढ़े –

उदारवाद और नव-उदारवाद (Liberalism and Neoliberalism)

सामाजिक संरचनावाद (Social Constructivism)

क्रिटिकल थ्योरी (Critical Theory)

विश्व-व्यवस्था सिद्धांत (World-Systems Theory)

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नारीवाद

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में पर्यावरणवाद (Environmentalism)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *