अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शक्ति की अवधारणा (Concept of Power)
शक्ति का अर्थ एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों में महत्त्व
शक्ति (Power) अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रमुख अवधारणा है। इसका अर्थ किसी राज्य की वह क्षमता है जिसके माध्यम से वह दूसरे राज्यों के व्यवहार, निर्णयों और नीतियों को प्रभावित करके अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में कोई सर्वोच्च विश्व-सरकार नहीं है जो सभी राज्यों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। इस स्थिति को अराजकता (Anarchy) कहते हैं। इसलिए राज्य अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सैन्य क्षमता, आर्थिक संसाधन, कूटनीति, गठबंधन और तकनीक का उपयोग करते हैं। यथार्थवाद (Realism) शक्ति को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय तत्व मानता है। हालाँकि, शक्ति केवल सैन्य बल नहीं है। आर्थिक निर्भरता, सांस्कृतिक आकर्षण, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और विचारों के माध्यम से भी राज्य दूसरों को प्रभावित कर सकते हैं।
नोट: संसाधनों का होना और उनसे इच्छित राजनीतिक परिणाम प्राप्त करना अलग-अलग बातें हैं। किसी राज्य की सैन्य या आर्थिक क्षमता अधिक हो सकती है, लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं होता कि वह हर परिस्थिति में दूसरे राज्य को अपनी नीति बदलने के लिए बाध्य कर सकेगा।
शक्ति, प्रभाव, बल और अधिकार
- शक्ति (Power): दूसरों के व्यवहार या राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता।
- प्रभाव (Influence): किसी के विचारों, निर्णयों या व्यवहार में परिवर्तन उत्पन्न करना।
- बल (Force): सैन्य या अन्य प्रत्यक्ष दबाव का प्रयोग।
- अधिकार (Authority): मान्य या वैध स्थिति के आधार पर आदेश देने की स्वीकृत क्षमता।
ये अवधारणाएँ संबंधित हैं, लेकिन समान नहीं हैं।
शक्ति की अवधारणा का ऐतिहासिक विकास
1. प्रारंभिक विचार
थ्यूसीडाइड्स की History of the Peloponnesian War में एथेंस और स्पार्टा के संघर्ष के माध्यम से शक्ति, भय, हितों और युद्ध के संबंध को समझा जा सकता है। यह आधुनिक यथार्थवाद का पूर्ण विकसित सिद्धांत नहीं था, लेकिन बाद के यथार्थवादी चिंतन के लिए महत्त्वपूर्ण संदर्भ बना। मैकियावेली की The Prince (1532) राजनीतिक सत्ता, सैन्य क्षमता और व्यावहारिक राजनीतिक निर्णयों पर बल देती है। थॉमस हॉब्स की Leviathan (1651) सुरक्षा, भय और संप्रभु सत्ता की आवश्यकता को समझाती है। हॉब्स का विचार राज्यों के बीच केंद्रीय सत्ता के अभाव पर होने वाली बहस को समझने में भी उपयोगी है।
2. पारंपरिक यथार्थवाद: हैंस मॉर्गेन्थाऊ
हैंस जे. मॉर्गेन्थाऊ (Hans J. Morgenthau) की Politics Among Nations: The Struggle for Power and Peace पारंपरिक यथार्थवाद की प्रमुख कृति है। मॉर्गेन्थाऊ के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय हित को शक्ति के संदर्भ में समझना चाहिए। राज्य अपनी सुरक्षा, स्वतंत्रता और अन्य हितों की रक्षा के लिए शक्ति का उपयोग करते हैं। राष्ट्रीय हित का स्वरूप परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है; इसलिए शक्ति का उपयोग हमेशा क्षेत्रीय विस्तार या सैन्य प्रभुत्व के लिए ही नहीं होता। मॉर्गेन्थाऊ राष्ट्रीय शक्ति के घटकों में भूगोल, प्राकृतिक संसाधन, औद्योगिक क्षमता, सैन्य तैयारी, जनसंख्या, कूटनीति और सरकार की गुणवत्ता को महत्त्व देते हैं।
आलोचना:– पारंपरिक यथार्थवाद शक्ति और राष्ट्रीय हित को अधिक महत्त्व देता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, आर्थिक सहयोग, घरेलू राजनीति और विचारों की स्वतंत्र भूमिका को पर्याप्त महत्त्व नहीं दे सकता।
3. नवयथार्थवाद: केनेथ वॉल्ट्ज
केनेथ एन. वॉल्ट्ज (Kenneth N. Waltz) की Theory of International Politics (1979) नवयथार्थवाद (Neorealism) की प्रमुख कृति है। वॉल्ट्ज ने शक्ति के अध्ययन में राज्य के नेताओं और उनकी नीतियों के बजाय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना पर अधिक ध्यान दिया। उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में केंद्रीय सत्ता का अभाव और राज्यों के बीच क्षमताओं का वितरण उनके व्यवहार को प्रभावित करता है। राज्य अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य तथा आर्थिक क्षमताएँ बढ़ाते हैं। लेकिन एक राज्य की सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास दूसरे राज्य में असुरक्षा उत्पन्न कर सकता है। इससे सुरक्षा-दुविधा (Security Dilemma) और हथियारों की प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है।
मॉर्गेन्थाऊ और वॉल्ट्ज में अंतर:– मॉर्गेन्थाऊ राष्ट्रीय हित और शक्ति के आधार पर राजनीतिक व्यवहार को समझाते हैं, जबकि वॉल्ट्ज अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना और सापेक्ष क्षमताओं के वितरण पर बल देते हैं।
आलोचना:– नवयथार्थवाद घरेलू राजनीति, नेतृत्व, विचारधारा और राज्यों की आंतरिक विशेषताओं को अपेक्षाकृत कम महत्त्व देता है।
4. शक्ति की व्यापक अवधारणा: डाहल से ल्यूक्स तक
रॉबर्ट डाहल (Robert A. Dahl) ने अपने लेख The Concept of Power (1957) में शक्ति को संबंधात्मक रूप में समझाया। उनके दृष्टिकोण में एक पक्ष की शक्ति इस बात से पहचानी जा सकती है कि वह दूसरे पक्ष से ऐसा कार्य करवा सके जिसे वह अन्यथा नहीं करता। पीटर बैक्रैक (Peter Bachrach) और मॉर्टन बैराट्ज़ (Morton Baratz) ने 1962 के लेख Two Faces of Power में बताया कि शक्ति केवल प्रत्यक्ष निर्णयों को प्रभावित नहीं करती। इसका प्रयोग कुछ मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे से बाहर रखने में भी हो सकता है।
स्टीवन ल्यूक्स (Steven Lukes) ने Power: A Radical View (1974) में शक्ति के तीन आयाम प्रस्तुत किए:-
- पहला आयाम: प्रत्यक्ष निर्णयों और व्यवहारगत संघर्षों को प्रभावित करना।
- दूसरा आयाम: यह निर्धारित करना कि कौन-से मुद्दे निर्णय-प्रक्रिया तक पहुँचेंगे।
- तीसरा आयाम: लोगों की धारणाओं, प्राथमिकताओं और हितों की समझ को प्रभावित करना।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में ये आयाम समझाते हैं कि शक्ति केवल युद्ध या समझौते के परिणामों में नहीं, बल्कि वैश्विक एजेंडा तय करने और कुछ नीतियों को स्वीकार्य या अपरिहार्य बनाने में भी काम कर सकती है।
शक्ति के प्रमुख सैद्धांतिक दृष्टिकोण
1. यथार्थवाद (Realism)
यथार्थवाद के अनुसार राज्य सुरक्षा, अस्तित्व और राष्ट्रीय हित की रक्षा करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में केंद्रीय सत्ता के अभाव के कारण सैन्य क्षमता, गठबंधन और शक्ति-संतुलन महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। मॉर्गेन्थाऊ शक्ति को राष्ट्रीय हित और राजनीतिक विवेक से जोड़ते हैं, जबकि वॉल्ट्ज इसे अंतरराष्ट्रीय संरचना और राज्यों की सापेक्ष क्षमताओं के संदर्भ में समझाते हैं।
2. उदारवाद (Liberalism)
उदारवाद शक्ति के महत्त्व को स्वीकार करते हुए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, व्यापार, आर्थिक परस्पर निर्भरता और सहयोग की भूमिका पर बल देता है। संस्थाएँ सूचना उपलब्ध कराकर, नियम बनाकर और सहयोग की निगरानी करके अनिश्चितता कम कर सकती हैं। हालाँकि, संस्थागत सहयोग में भी शक्ति की असमानता बनी रह सकती है। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि नियम बनाने में किस राज्य का प्रभाव अधिक है और सहयोग से लाभ किसे मिलता है।
3. मार्क्सवादी एवं नव-ग्राम्शीवादी दृष्टिकोण
मार्क्सवादी दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय शक्ति को आर्थिक संरचना, पूँजी, उत्पादन संबंधों और वर्गीय हितों के संदर्भ में देखता है। ग्राम्शी (Antonio Gramsci) की वर्चस्व (Hegemony) की अवधारणा बताती है कि प्रभुत्व केवल बल से नहीं, बल्कि सहमति और विचारों के माध्यम से भी कायम हो सकता है। रॉबर्ट डब्ल्यू. कॉक्स (Robert W. Cox) ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में इस दृष्टिकोण को विकसित किया। उनके विश्लेषण में भौतिक क्षमताएँ, विचार और संस्थाएँ मिलकर विश्व-व्यवस्था को आकार देती हैं।
आलोचना:– आर्थिक संरचनाओं पर अत्यधिक जोर देने से सैन्य सुरक्षा, राष्ट्रवाद, नेतृत्व और राज्यों की स्वतंत्र रणनीति की भूमिका कम दिखाई दे सकती है।
4. रचनावाद (Constructivism)
अलेक्जेंडर वेंड्ट (Alexander Wendt) की Social Theory of International Politics (1999) रचनावादी दृष्टिकोण की प्रमुख कृति है। रचनावाद के अनुसार शक्ति का प्रभाव केवल भौतिक संसाधनों से निर्धारित नहीं होता; पहचान, विचार और मानदंड भी महत्त्वपूर्ण हैं। एक राज्य किसी सहयोगी की सैन्य क्षमता को सुरक्षा का साधन और किसी प्रतिद्वंद्वी की समान क्षमता को खतरा मान सकता है। इस दृष्टिकोण की सीमा यह है कि विचारों और पहचान के प्रभाव को मापना कठिन हो सकता है। फिर भी, यह बताता है कि भौतिक क्षमताओं का राजनीतिक अर्थ संदर्भ के अनुसार बदलता है।
5. नारीवादी दृष्टिकोण (Feminist Perspective)
जे. एन. टिकनर (J. Ann Tickner) की Gender in International Relations: Feminist Perspectives on Achieving Global Security (1992) इस क्षेत्र की प्रमुख कृति है। नारीवादी दृष्टिकोण यह अध्ययन करता है कि युद्ध, सुरक्षा नीतियों, वैश्विक श्रम-विभाजन और अंतर्राष्ट्रीय निर्णय-प्रक्रिया में लैंगिक संबंध शक्ति को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। यह पारंपरिक सुरक्षा-अध्ययन से आगे बढ़कर पूछता है कि किसकी सुरक्षा सुनिश्चित होती है और किन समूहों के अनुभवों को कम महत्त्व दिया जाता है। नारीवादी दृष्टिकोण एक समान सिद्धांत नहीं है; इसकी विभिन्न धाराएँ शक्ति और सुरक्षा की अलग-अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत करती हैं।
शक्ति के प्रमुख प्रकार
1. कठोर शक्ति (Hard Power)
कठोर शक्ति में सैन्य बल, आर्थिक प्रतिबंध और अन्य प्रकार के दबाव या प्रोत्साहन शामिल होते हैं। इसका उद्देश्य किसी राज्य के व्यवहार को प्रभावित करना या उसकी नीति बदलने की लागत बढ़ाना हो सकता है। आर्थिक प्रतिबंध इसका उदाहरण हैं। उनकी सफलता लक्ष्य राज्य की निर्भरता, वैकल्पिक साझेदारों और घरेलू राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। दबाव से तत्काल अनुपालन प्राप्त हो सकता है, लेकिन स्थायी सहमति आवश्यक नहीं कि उत्पन्न हो।
2. मृदु शक्ति (Soft Power)
जोसेफ एस. नाई जूनियर (Joseph S. Nye Jr.) ने Bound to Lead (1990) और Soft Power (2004) में मृदु शक्ति की अवधारणा को विकसित किया। मृदु शक्ति का अर्थ आकर्षण के माध्यम से दूसरों को प्रभावित करना है। संस्कृति, राजनीतिक मूल्यों, शिक्षा और विदेश नीति की विश्वसनीयता इसके स्रोत हो सकते हैं। किसी देश की संस्कृति लोकप्रिय होने से यह आवश्यक नहीं कि दूसरे देश उसकी सभी नीतियों का समर्थन करें। इसलिए सांस्कृतिक आकर्षण और वास्तविक राजनीतिक प्रभाव में अंतर करना चाहिए।
3. स्मार्ट शक्ति (Smart Power)
स्मार्ट शक्ति कठोर और मृदु शक्ति के साधनों का रणनीतिक संयोजन है। उदाहरण के लिए, किसी संघर्ष के समाधान में कूटनीति, आर्थिक सहायता, संस्थागत सहयोग और विश्वसनीय सुरक्षा-व्यवस्था का संयुक्त उपयोग किया जा सकता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि चुने गए साधन राजनीतिक उद्देश्य के अनुकूल हों और एक-दूसरे को कमजोर करने के बजाय पूरक बनें।
4. आर्थिक शक्ति (Economic Power)
आर्थिक शक्ति में उत्पादन क्षमता, बाजार का आकार, व्यापार, निवेश, वित्तीय नेटवर्क और तकनीकी संसाधन शामिल हैं। इनकी सहायता से राज्य दूसरे देशों के विकल्पों और निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन बड़ी अर्थव्यवस्था होना अपने आप विदेश नीति में सफलता की गारंटी नहीं है। आर्थिक निर्भरता, वैकल्पिक बाजारों और राजनीतिक परिस्थितियों का भी महत्त्व है।
5. सैन्य शक्ति (Military Power)
सैन्य शक्ति में हथियारों, सैनिकों, प्रशिक्षण, रक्षा-उद्योग, खुफिया जानकारी और सैन्य तकनीक की क्षमता शामिल है। इसका एक प्रमुख कार्य प्रतिरोध (Deterrence) है। प्रतिरोध का उद्देश्य संभावित प्रतिद्वंद्वी को यह विश्वास दिलाना है कि आक्रमण की लागत उसके लाभ से अधिक होगी। परमाणु क्षमता प्रतिरोध को मजबूत कर सकती है, लेकिन वह सभी प्रकार के संघर्षों को समाप्त नहीं करती।
6. संरचनात्मक शक्ति (Structural Power)
सुसान स्ट्रेंज (Susan Strange) ने States and Markets (1988) में संरचनात्मक शक्ति का महत्त्वपूर्ण विश्लेषण किया। संरचनात्मक शक्ति का अर्थ उन व्यवस्थाओं और नियमों को प्रभावित करने की क्षमता है जिनके भीतर दूसरे राज्य निर्णय लेते हैं। स्ट्रेंज ने सुरक्षा, उत्पादन, वित्त और ज्ञान से संबंधित संरचनाओं पर विशेष ध्यान दिया। उदाहरण के लिए, वैश्विक वित्तीय नेटवर्क, तकनीकी मानकों और महत्त्वपूर्ण आपूर्ति-शृंखलाओं में केंद्रीय स्थान रखने वाले राज्य दूसरे देशों के विकल्पों को प्रभावित कर सकते हैं।
7. संस्थागत शक्ति (Institutional Power)
संस्थागत शक्ति अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नियमों, निर्णय-प्रक्रियाओं और प्रतिनिधित्व को प्रभावित करने की क्षमता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना तथा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में मतदान की व्यवस्था इसके अध्ययन के उपयोगी उदाहरण हैं। संस्थाएँ केवल शक्तिशाली राज्यों के हितों को आगे नहीं बढ़ातीं; वे नियम बनाकर राज्यों के व्यवहार को सीमित भी कर सकती हैं।
राष्ट्रीय शक्ति के घटक
- राष्ट्रीय शक्ति (National Power) राज्य की उन क्षमताओं का समग्र है जिनके माध्यम से वह अपने राष्ट्रीय हितों और विदेश नीति के उद्देश्यों को आगे बढ़ाता है।
- मॉर्गेन्थाऊ ने राष्ट्रीय शक्ति के विश्लेषण में भूगोल, प्राकृतिक संसाधन, औद्योगिक क्षमता, सैन्य तैयारी, जनसंख्या, कूटनीति और सरकार की गुणवत्ता को महत्त्व दिया।
- भौगोलिक स्थिति समुद्री मार्गों, सीमाओं और व्यापारिक रास्तों के कारण रणनीतिक लाभ दे सकती है। लेकिन तकनीकी विकास और परिवहन में परिवर्तन इन लाभों को बदल सकते हैं।
- जनसंख्या एवं मानव संसाधन बाजार, श्रम और सैन्य क्षमता का आधार बन सकते हैं। फिर भी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और उत्पादकता के बिना बड़ी जनसंख्या प्रभावी शक्ति में नहीं बदलती।
- आर्थिक एवं तकनीकी क्षमता राज्य को रक्षा, उत्पादन और विदेश नीति में अधिक विकल्प देती है। वैज्ञानिक अनुसंधान, ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा-उद्योग इसके महत्त्वपूर्ण अंग हैं।
- राजनीतिक नेतृत्व, कूटनीति और संस्थागत क्षमता उपलब्ध संसाधनों को वास्तविक परिणामों में बदलने में सहायता करते हैं। इसी कारण समान संसाधन वाले राज्य अलग-अलग अंतर्राष्ट्रीय परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
- राष्ट्रीय शक्ति का कोई एक सार्वभौमिक मापक नहीं है। GDP, रक्षा व्यय, तकनीकी क्षमता और व्यापारिक स्थिति उपयोगी संकेतक हैं, लेकिन किसी एक संकेतक से संपूर्ण शक्ति का आकलन नहीं किया जा सकता।
शक्ति-संतुलन और आधिपत्य
1. शक्ति-संतुलन (Balance of Power)
शक्ति-संतुलन का अर्थ ऐसी स्थिति या नीति से है जिसमें कोई राज्य या राज्यों का समूह किसी एक शक्ति के अत्यधिक प्रभुत्व को रोकने का प्रयास करता है। इसके दो प्रमुख तरीके हैं। आंतरिक संतुलन (Internal Balancing) में राज्य अपनी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी क्षमता बढ़ाता है। बाहरी संतुलन (External Balancing) में वह अन्य राज्यों के साथ गठबंधन करता है। वॉल्ट्ज के नवयथार्थवाद में शक्ति-संतुलन को अंतर्राष्ट्रीय अराजकता और राज्यों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं से जोड़ा जाता है।
आलोचना:– संतुलन के प्रयास हथियारों की दौड़ और सुरक्षा-दुविधा बढ़ा सकते हैं। गठबंधनों और प्रतिद्वंद्वी की क्षमताओं का गलत आकलन भी संघर्ष पैदा कर सकता है।
2. आधिपत्य (Hegemony)
आधिपत्य ऐसी स्थिति है जिसमें कोई राज्य अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के नियमों, संस्थाओं और दिशा को प्रभावित करने की असाधारण क्षमता रखता है। आधिपत्य केवल सैन्य श्रेष्ठता नहीं है। आर्थिक शक्ति, संस्थागत प्रभाव, वैचारिक नेतृत्व और अन्य राज्यों की स्वीकृति भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं। नव-ग्राम्शीवादी दृष्टिकोण आधिपत्य को बल के साथ-साथ सहमति, विचारों और संस्थाओं से जोड़ता है। इसकी आलोचना यह है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थिरता को कभी-कभी प्रमुख शक्ति के हितों से अत्यधिक जोड़ दिया जाता है।
3. शक्ति-संक्रमण (Power Transition)
ए. एफ. के. ऑर्गैंस्की (A. F. K. Organski) से संबंधित शक्ति-संक्रमण सिद्धांत यह समझाता है कि स्थापित और उभरती शक्तियों के बीच सापेक्ष क्षमताओं में परिवर्तन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कैसे प्रभावित कर सकता है। यहाँ केवल शक्ति में वृद्धि महत्त्वपूर्ण नहीं है। उभरती शक्ति मौजूदा व्यवस्था से संतुष्ट है या उसे बदलना चाहती है, यह भी संघर्ष की संभावनाओं को प्रभावित करता है।
नोट: शक्ति-संतुलन किसी शक्ति की बढ़त को सीमित करने पर केंद्रित है, जबकि शक्ति-संक्रमण प्रमुख शक्तियों की सापेक्ष स्थिति में परिवर्तन का अध्ययन करता है।
परस्पर निर्भरता और शक्ति
रॉबर्ट कीओहेन (Robert O. Keohane) और जोसेफ नाई की Power and Interdependence (1977) इस विषय की प्रमुख कृति है। परस्पर निर्भरता (Interdependence) का अर्थ है कि राज्य व्यापार, वित्त, तकनीक और अन्य संबंधों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े हों। लेकिन निर्भरता समान शक्ति का प्रमाण नहीं है। यदि एक राज्य दूसरे पर किसी आवश्यक संसाधन के लिए अधिक निर्भर है और उसके पास विकल्प कम हैं, तो दूसरे राज्य की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है।
इस संदर्भ में दो अवधारणाएँ महत्त्वपूर्ण हैं:
- संवेदनशीलता (Sensitivity): बाहरी परिवर्तन से कोई राज्य कितनी जल्दी प्रभावित होता है।
- असुरक्षा (Vulnerability): उपलब्ध विकल्पों और समायोजन की लागत को ध्यान में रखने पर कोई राज्य कितना प्रभावित रहता है।
उदाहरण के लिए, किसी देश की ऊर्जा-आपूर्ति कुछ सीमित स्रोतों पर निर्भर हो तो आपूर्ति में व्यवधान उसकी अर्थव्यवस्था और विदेश नीति को प्रभावित कर सकता है। वैकल्पिक स्रोत विकसित करने से यह निर्भरता कम हो सकती है। परस्पर निर्भरता दबाव का साधन भी बन सकती है और सहयोग का आधार भी। इसका वास्तविक प्रभाव निर्भरता की असमानता और उपलब्ध विकल्पों पर निर्भर करता है।
सुरक्षा-दुविधा और शक्ति की सीमाएँ
रॉबर्ट जर्विस (Robert Jervis) ने अपने लेख Cooperation Under the Security Dilemma (1978) में सुरक्षा-दुविधा के विश्लेषण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सुरक्षा-दुविधा तब उत्पन्न होती है जब एक राज्य अपनी रक्षा के लिए सैन्य क्षमता बढ़ाता है, लेकिन दूसरा राज्य इसे संभावित खतरा समझकर अपनी क्षमता बढ़ाने लगता है। परिणामस्वरूप दोनों राज्यों की असुरक्षा बढ़ सकती है, भले ही किसी ने प्रारंभ में आक्रमण की योजना न बनाई हो।
शक्ति के प्रयोग की अन्य सीमाएँ भी हैं। सैन्य कार्रवाई महँगी हो सकती है, आर्थिक प्रतिबंध अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकते और अत्यधिक दबाव दूसरे राज्यों को वैकल्पिक गठबंधन बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। इसलिए शक्ति का प्रभावी उपयोग केवल संसाधनों पर निर्भर नहीं करता। सही रणनीति, राजनीतिक उद्देश्य, लागत, प्रतिपक्षी की प्रतिक्रिया और कूटनीति भी महत्त्वपूर्ण हैं।
भारतीय संदर्भ में शक्ति
1. रणनीतिक स्वायत्तता
रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का अर्थ विदेश नीति संबंधी निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने की क्षमता बनाए रखना है। इसका अर्थ सभी देशों से समान दूरी रखना नहीं है। शीतयुद्ध के दौरान भारत की गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) ने महाशक्ति गुटों से औपचारिक रूप से अलग रहकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने का आधार दिया। समकालीन राजनीति में विभिन्न शक्तियों के साथ मुद्दा-आधारित सहयोग को बहु-संरेखण (Multi-alignment) के संदर्भ में भी समझा जाता है। दोनों अवधारणाओं का ऐतिहासिक संदर्भ अलग है। रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और कूटनीतिक क्षमता आवश्यक है। अत्यधिक बाहरी निर्भरता नीति संबंधी विकल्पों को सीमित कर सकती है।
2. सैन्य, आर्थिक और तकनीकी शक्ति
भारत की सैन्य क्षमता, परमाणु प्रतिरोध, भौगोलिक स्थिति और समुद्री हित उसकी रणनीतिक भूमिका को प्रभावित करते हैं। लेकिन सैन्य क्षमता सभी समस्याओं का समाधान नहीं है। क्षेत्रीय स्थिरता, सीमा-प्रबंधन और कूटनीतिक संवाद भी महत्त्वपूर्ण हैं। भारत का बाजार, उत्पादन, सेवाएँ, वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी विकास उसकी आर्थिक शक्ति के स्रोत हैं। इन संसाधनों का वास्तविक प्रभाव संस्थागत क्षमता, नवाचार और वैश्विक आर्थिक नेटवर्क में भारत की स्थिति पर निर्भर करता है।
3. मृदु शक्ति और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव
योग, सिनेमा, साहित्य, शिक्षा, सांस्कृतिक संपर्क और प्रवासी भारतीय समुदाय भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर सकते हैं। ये मृदु शक्ति के संभावित स्रोत हैं, लेकिन सांस्कृतिक लोकप्रियता से अपने आप विदेश नीति के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित नहीं होती।
नोट: भारत की शक्ति का मूल्यांकन केवल सैन्य क्षमता या GDP से नहीं, बल्कि इन संसाधनों को प्रभावी विदेश नीति, कूटनीतिक प्रभाव और रणनीतिक स्वायत्तता में बदलने की क्षमता से करना चाहिए।
शक्ति की आलोचनात्मक समीक्षा
शक्ति की अवधारणा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को समझने में उपयोगी है, लेकिन इसके कुछ प्रमुख प्रश्न बने रहते हैं।
- शक्ति का मापन कठिन है। GDP या सैन्य व्यय संसाधनों का संकेत देते हैं, लेकिन वास्तविक राजनीतिक परिणामों की पूरी व्याख्या नहीं करते।
- विभिन्न सिद्धांत शक्ति के अलग-अलग आयामों पर जोर देते हैं। यथार्थवाद सैन्य क्षमता और राष्ट्रीय हित को, उदारवाद संस्थाओं और सहयोग को, मार्क्सवादी दृष्टिकोण आर्थिक संरचनाओं को तथा रचनावाद विचारों और पहचान को महत्त्व देता है।
- शक्ति का प्रयोग हमेशा सफलता नहीं देता। दबाव प्रतिरोध पैदा कर सकता है और सुरक्षा बढ़ाने के प्रयास सुरक्षा-दुविधा उत्पन्न कर सकते हैं।
- शक्ति और वैधता अलग प्रश्न हैं। किसी राज्य की अधिक क्षमता उसके प्रत्येक निर्णय को स्वतः वैध या उचित नहीं बनाती।
इसलिए शक्ति का अध्ययन करते समय संसाधनों, राजनीतिक संबंधों, संस्थाओं, विचारों और परिणामों का संयुक्त विश्लेषण आवश्यक है।
समकालीन प्रासंगिकता
समकालीन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति के नए आयाम महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डेटा, उन्नत चिप्स, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक उत्पादन-शृंखलाएँ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करती हैं। इन क्षेत्रों में शक्ति केवल संसाधनों के स्वामित्व से निर्धारित नहीं होती। तकनीकी विशेषज्ञता, वैकल्पिक आपूर्ति, संस्थागत क्षमता और दूसरे देशों की निर्भरता भी महत्त्वपूर्ण हैं।
जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य और समुद्री सुरक्षा जैसी समस्याएँ यह भी दिखाती हैं कि कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सामूहिक क्षमता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक हैं। इसलिए समकालीन राजनीति में शक्ति का विश्लेषण प्रतिस्पर्धा तथा सहयोग दोनों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शक्ति केवल सैन्य श्रेष्ठता नहीं, बल्कि संसाधनों, राजनीतिक प्रभाव, संस्थाओं, विचारों और निर्भरता का व्यापक संबंध है। मॉर्गेन्थाऊ ने इसे राष्ट्रीय हित से, वॉल्ट्ज ने अंतर्राष्ट्रीय संरचना से, नाई ने आकर्षण से, स्ट्रेंज ने संरचनात्मक व्यवस्थाओं से और वेंड्ट ने विचारों एवं पहचान से जोड़ा। इन दृष्टिकोणों से स्पष्ट होता है कि किसी राज्य के पास संसाधनों की अधिकता होना और उसका इच्छित राजनीतिक परिणाम प्राप्त करना अलग बातें हैं। शक्ति का वास्तविक प्रभाव संदर्भ, रणनीति, प्रतिपक्षी की प्रतिक्रिया और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर निर्भर करता है। इसलिए शक्ति की समग्र समझ के लिए यह जानना आवश्यक है कि शक्ति किसके पास है, उसका प्रयोग कैसे होता है, उसके लाभ और लागत क्या हैं तथा वह अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संघर्ष और व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित करती है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य
- मॉर्गेन्थाऊ – पारंपरिक यथार्थवाद; राष्ट्रीय हित और शक्ति
- केनेथ वॉल्ट्ज – Theory of International Politics (1979); संरचनात्मक यथार्थवाद
- रॉबर्ट डाहल – The Concept of Power (1957); संबंधात्मक शक्ति
- बैक्रैक एवं बैराट्ज़ – Two Faces of Power (1962); एजेंडा-नियंत्रण
- स्टीवन ल्यूक्स – Power: A Radical View (1974); शक्ति के तीन आयाम
- जोसेफ नाई – मृदु शक्ति; आकर्षण के माध्यम से प्रभाव
- कीओहेन एवं नाई – Power and Interdependence (1977)
- सुसान स्ट्रेंज – States and Markets (1988); संरचनात्मक शक्ति
- अलेक्जेंडर वेंड्ट – Social Theory of International Politics (1999); रचनावाद
- जे. एन. टिकनर – नारीवादी अंतर्राष्ट्रीय संबंध
- रॉबर्ट जर्विस – Cooperation Under the Security Dilemma (1978)
- ऑर्गैंस्की – शक्ति-संक्रमण सिद्धांत
महत्वपूर्ण पुस्तकें –
- Hans J. Morgenthau, — Politics Among Nations: The Struggle for Power and Peace.
- Kenneth N. Waltz, — Theory of International Politics. Addison-Wesley, 1979.
- Robert A. Dahl, — “The Concept of Power.” Behavioral Science, 1957.
- Peter Bachrach, and Morton S. Baratz — “Two Faces of Power.” American Political Science Review, 1962.
- Steven Lukes, — Power: A Radical View. 1974.
- Robert O. Keohane, and Joseph S. Nye — Power and Interdependence. 1977.
- Joseph S. Nye, — Soft Power: The Means to Success in World Politics. 2004.
- Susan Strange, — States and Markets. 1988.
- Robert W. Cox, with Timothy J. Sinclair — Approaches to World Order. Cambridge University Press, 1996.
- Alexander Wendt, — Social Theory of International Politics. Cambridge University Press, 1999.
- J. Ann Tickner, — Gender in International Relations. Columbia University Press, 1992.
- Robert Jervis, — “Cooperation Under the Security Dilemma.” World Politics, 1978.
- Michael Barnett and Raymond Duvall — “Power in International Politics.” International Organization, 2005.
इन्हें भी पढ़े –
सामाजिक संरचनावाद (Social Constructivism)
क्रिटिकल थ्योरी (Critical Theory)
विश्व-व्यवस्था सिद्धांत (World-Systems Theory)
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नारीवाद
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में पर्यावरणवाद (Environmentalism)
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (International Relations) में राज्य की अवधारणा (Concept of State)


