पारिस्थितिकी का सिद्धांत (Ecological Theory of Public Administration) — एफ. डब्ल्यू. रिग्स
परिचय एवं अर्थ
पारिस्थितिकी के सिद्धांत (Ecological Theory) के प्रमुख प्रतिपादक फ्रेड डब्ल्यू. रिग्स (Fred W. Riggs) हैं। यह सिद्धांत प्रशासन और उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक परिवेश के संबंधों का अध्ययन करता है। रिग्स के अनुसार, प्रशासन को केवल उसके नियमों, संगठन और अधिकारियों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उसकी कार्यप्रणाली पर समाज की संरचना, राजनीतिक संबंध, आर्थिक परिस्थितियाँ और सांस्कृतिक परंपराएँ भी प्रभाव डालती हैं।
उदाहरण के लिए, किसी सरकारी विभाग में भर्ती के नियम योग्यता पर आधारित हो सकते हैं, लेकिन व्यवहार में राजनीतिक हस्तक्षेप या व्यक्तिगत संबंध चयन-प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। इस अंतर को समझने के लिए प्रशासन के साथ उसके सामाजिक परिवेश का अध्ययन आवश्यक है।
मुख्य विचार: प्रशासन और उसका परिवेश एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसलिए प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन उसके सामाजिक संदर्भ में किया जाना चाहिए।
ऐतिहासिक विकास
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों को स्वतंत्रता मिली। इन देशों ने आधुनिक प्रशासनिक संस्थाएँ अपनाईं, लेकिन कई जगह औपचारिक नियमों और वास्तविक प्रशासनिक व्यवहार के बीच अंतर बना रहा। इससे यह प्रश्न उठा कि समान प्रशासनिक संस्थाएँ विभिन्न समाजों में अलग-अलग परिणाम क्यों देती हैं। इसी पृष्ठभूमि में तुलनात्मक लोक प्रशासन (Comparative Public Administration) का विकास हुआ। रिग्स ने प्रशासनिक व्यवस्था को उसके सामाजिक परिवेश से जोड़कर समझाने का प्रयास किया।
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं:
- The Ecology of Public Administration (1961) — प्रशासन और उसके परिवेश के संबंधों का अध्ययन।
- Administration in Developing Countries: The Theory of Prismatic Society (1964) — प्रिज्मेटिक समाज और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था का विश्लेषण।
रिग्स का योगदान यह था कि उन्होंने प्रशासनिक विकास को केवल संगठनात्मक सुधार नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक संरचना और संस्थागत परिस्थितियों से जोड़ा।
रिग्स का फ्यूज्ड–प्रिज्मेटिक–डिफ्रैक्टेड मॉडल
रिग्स ने सामाजिक संरचना और प्रशासनिक व्यवस्था के संबंध को समझाने के लिए तीन आदर्श प्रकार प्रस्तुत किए। इनके माध्यम से वे बताते हैं कि समाज में संस्थाओं का विभेदीकरण प्रशासन को किस प्रकार प्रभावित करता है। आदर्श प्रकार (Ideal Types) वास्तविक समाजों का पूर्ण वर्णन नहीं हैं, बल्कि तुलना और विश्लेषण के लिए बनाए गए मॉडल हैं।
(1) फ्यूज्ड समाज (Fused Society) — Agraria
इस समाज में विभिन्न सामाजिक कार्यों के लिए अलग-अलग विशिष्ट संस्थाएँ कम विकसित होती हैं। राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक भूमिकाएँ परस्पर जुड़ी रहती हैं। परंपरा, व्यक्तिगत संबंध और स्थानीय प्रतिष्ठा का महत्त्व अधिक हो सकता है। रिग्स ने Agraria को मुख्यतः कृषि-प्रधान सामाजिक व्यवस्था के आदर्श प्रकार के रूप में प्रस्तुत किया।
(2) प्रिज्मेटिक समाज (Prismatic Society) — Transitia
यह संक्रमणशील समाज है, जिसमें परंपरागत और आधुनिक संस्थाएँ एक साथ मौजूद होती हैं। आधुनिक कानून, विभाग और प्रशासनिक नियम स्थापित हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक व्यवहार पर सामाजिक संबंधों, राजनीतिक संरक्षण और परंपराओं का प्रभाव बना रह सकता है। उदाहरण के लिए, सरकारी सेवाओं के लिए योग्यता-आधारित नियम होने के बावजूद यदि नियुक्ति में अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप हो, तो औपचारिक व्यवस्था और वास्तविक व्यवहार में अंतर दिखाई देता है।
(3) डिफ्रैक्टेड समाज (Diffracted Society) — Industria
इस समाज में संस्थागत विभेदीकरण अधिक विकसित होता है। प्रशासन, शिक्षा, न्याय और अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों के लिए विशिष्ट संस्थाएँ होती हैं तथा उनके कार्य अपेक्षाकृत स्पष्ट होते हैं। रिग्स ने Industria को औद्योगिक और अधिक विभेदित समाज के आदर्श प्रकार के रूप में प्रस्तुत किया।
तीनों मॉडलों में अंतर
Fused
- समाज का स्वरूप – कम विभेदीकरण
- संबद्ध अवधारणा – Agraria
- संस्थाओं की प्रकृति – अनेक कार्य एक ही संरचना में
- प्रमुख विशेषता – परंपरागत संबंधों का प्रभाव
Prismatic
- समाज का स्वरूप – संक्रमणशील
- संबद्ध अवधारणा – Transitia
- संस्थाओं की प्रकृति – आधुनिक और परंपरागत संस्थाओं का मिश्रण
- प्रमुख विशेषता – औपचारिकता और वास्तविक व्यवहार में अंतर संभव
Diffracted
- समाज का स्वरूप – अधिक विभेदीकरण
- संबद्ध अवधारणा – Industria
- संस्थाओं की प्रकृति – विशिष्ट एवं विभेदित संस्थाएँ
- प्रमुख विशेषता – कार्यों का अपेक्षाकृत स्पष्ट विभाजन
नोट: Fused–Prismatic–Diffracted मॉडल रिग्स के पारिस्थितिक सिद्धांत का केंद्रीय भाग है।
प्रिज्मेटिक समाज की तीन प्रमुख विशेषताएँ
रिग्स ने प्रिज्मेटिक समाज की तीन विशेषताओं पर विशेष बल दिया—Heterogeneity, Formalism और Overlapping।
1. विषमरूपता (Heterogeneity)
विषमरूपता का अर्थ है एक ही समाज में परंपरागत और आधुनिक संस्थाओं, मूल्यों तथा व्यवहारों का सह-अस्तित्व। उदाहरण के लिए, किसी देश में डिजिटल प्रशासन और आधुनिक भर्ती-प्रणाली के साथ जाति, परिवार तथा व्यक्तिगत संपर्क भी प्रशासनिक व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
महत्त्व: इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिक संस्थाओं की स्थापना के बावजूद परंपरागत सामाजिक संबंध समाप्त होना आवश्यक नहीं है।
2. औपचारिकतावाद (Formalism)
औपचारिकतावाद का अर्थ औपचारिक नियमों और वास्तविक प्रशासनिक व्यवहार के बीच अंतर है। उदाहरण के लिए, सरकारी नियम समयबद्ध सेवा का प्रावधान करते हैं, लेकिन व्यवहार में नागरिकों को अनावश्यक देरी का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में घोषित व्यवस्था और वास्तविक कार्यप्रणाली में अंतर दिखाई देता है। Formalism को लालफीताशाही (Red Tapism) के समान नहीं मानना चाहिए। लालफीताशाही का संबंध अत्यधिक प्रक्रियात्मक जटिलता से है, जबकि Formalism का केंद्रीय अर्थ औपचारिक नियमों और वास्तविक व्यवहार के बीच अंतर है।
3. अतिव्यापन (Overlapping)
अतिव्यापन का अर्थ है औपचारिक और अनौपचारिक संस्थाओं या भूमिकाओं का एक ही क्षेत्र में प्रभाव डालना। उदाहरण के लिए, किसी प्रशासनिक निर्णय का औपचारिक अधिकार सरकारी अधिकारी के पास हो, लेकिन व्यवहार में स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों या राजनीतिक प्रतिनिधियों का भी प्रभाव हो। इससे अधिकारों की अस्पष्टता, पक्षपात और जवाबदेही की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। हालाँकि, अनौपचारिक नेटवर्क कभी-कभी स्थानीय समस्याओं की जानकारी प्रशासन तक पहुँचाने में सहायक भी होते हैं।
तीनों विशेषताओं का संबंध Heterogeneity समाज में आधुनिक और परंपरागत व्यवस्थाओं के सह-अस्तित्व को बताती है। Overlapping उनके कार्यक्षेत्रों के एक-दूसरे पर प्रभाव को दर्शाता है। इन परिस्थितियों में औपचारिक नियमों और वास्तविक व्यवहार के बीच अंतर उत्पन्न हो सकता है, जिसे Formalism से समझा जाता है।
साला मॉडल (Sala Model)
साला मॉडल रिग्स के प्रिज्मेटिक समाज की प्रशासनिक व्यवस्था को समझाता है। Sala ऐसे प्रशासनिक कार्यालय या व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें आधुनिक नौकरशाही का औपचारिक ढाँचा मौजूद हो सकता है, लेकिन वास्तविक कार्यप्रणाली पर व्यक्तिगत संबंधों, सामाजिक परंपराओं और अनौपचारिक प्रभावों का असर भी पड़ता है। उदाहरण के लिए, किसी कार्यालय में कार्य-विभाजन और अधिकार औपचारिक रूप से निर्धारित हों, लेकिन निर्णय व्यक्तिगत संपर्क या राजनीतिक दबाव से प्रभावित हों।
इस मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ हैं:
- औपचारिक नियमों और वास्तविक व्यवहार में अंतर।
- व्यक्तिगत संबंधों एवं संरक्षण का प्रभाव।
- औपचारिक और अनौपचारिक अधिकारों का अतिव्यापन।
- सामाजिक परिवेश पर प्रशासन की निर्भरता।
महत्त्व: साला मॉडल बताता है कि किसी प्रशासनिक कार्यालय की वास्तविक कार्यप्रणाली को समझने के लिए केवल उसकी नियमावली और संगठनात्मक संरचना का अध्ययन पर्याप्त नहीं है।
बाजार–कैंटीन मॉडल (Bazaar–Canteen Model)
रिग्स ने प्रिज्मेटिक समाज की आर्थिक व्यवस्था को समझाने के लिए Bazaar–Canteen Model प्रस्तुत किया। बाजार (Bazaar) का आदर्श रूप मांग, आपूर्ति और प्रतिस्पर्धा पर आधारित विनिमय व्यवस्था को दर्शाता है। इसके विपरीत, कैंटीन (Canteen) नियंत्रित वितरण और निर्धारित शर्तों पर आधारित व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है। रिग्स ने इन दोनों के माध्यम से यह समझाया कि प्रिज्मेटिक समाज में आर्थिक व्यवहार केवल प्रतिस्पर्धी बाजार के नियमों से संचालित नहीं होता। प्रशासनिक नियंत्रण, विशेषाधिकार, व्यक्तिगत संबंध और अनौपचारिक प्रथाएँ भी आर्थिक लेन-देन को प्रभावित कर सकती हैं।
नोट: Bazaar–Canteen Model को प्रिज्मेटिक समाज की आर्थिक पारिस्थितिकी से जोड़कर याद करें, जबकि Sala Model को उसकी प्रशासनिक व्यवस्था से संबंधित रखें।
पारिस्थितिकी सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ एवं योगदान
रिग्स के सिद्धांत का मुख्य योगदान प्रशासन को उसके सामाजिक परिवेश से जोड़ना है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
- प्रशासन और परिवेश का संबंध: प्रशासनिक व्यवहार को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझा जाता है।
- तुलनात्मक दृष्टिकोण: विभिन्न समाजों की प्रशासनिक व्यवस्थाओं की तुलना करते समय उनकी संस्थागत और सामाजिक विशेषताओं को महत्त्व दिया जाता है।
- विकासशील समाजों पर ध्यान: यह सिद्धांत उन समाजों की प्रशासनिक समस्याओं को समझने में उपयोगी है जहाँ आधुनिक संस्थाएँ और परंपरागत संबंध साथ मौजूद हैं।
- औपचारिक और वास्तविक व्यवस्था का अंतर: यह स्पष्ट करता है कि नियमों की स्थापना और उनका प्रभावी क्रियान्वयन अलग-अलग बातें हैं।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
रिग्स का सिद्धांत प्रशासनिक व्यवस्था के सामाजिक संदर्भ को समझने में उपयोगी है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ हैं।
- पश्चिम-केंद्रित विकास-दृष्टि: Agraria और Industria जैसे मॉडल कृषि-प्रधान से औद्योगिक समाज की ओर विकास को प्रमुख संदर्भ बनाते हैं। इससे विभिन्न समाजों के विशिष्ट ऐतिहासिक मार्गों को पर्याप्त महत्त्व न मिलने की आशंका रहती है।
- अवधारणाओं की व्यापकता: Heterogeneity, Formalism और Overlapping जैसी अवधारणाएँ व्यापक हैं। यदि इन्हें स्पष्ट संकेतकों के बिना प्रयोग किया जाए, तो अनेक अलग-अलग समस्याओं को एक ही ढाँचे में समझाने की प्रवृत्ति हो सकती है।
- वास्तविक समाजों की विविधता: किसी देश के सभी विभागों और क्षेत्रों में समान प्रशासनिक विशेषताएँ नहीं होतीं। इसलिए पूरे देश को एक ही प्रकार का समाज मानना उचित नहीं है।
- कारणों की सीमित व्याख्या: प्रशासनिक नियमों और वास्तविक व्यवहार में अंतर मिलने पर केवल प्रिज्मेटिक समाज का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। भ्रष्टाचार, संसाधनों की कमी, कमजोर निगरानी और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे विशिष्ट कारणों की भी जाँच करनी चाहिए।
इस प्रकार, रिग्स का सिद्धांत प्रशासनिक समस्याओं के विश्लेषण का उपयोगी ढाँचा देता है, लेकिन इसे अनुभवजन्य प्रमाणों और अन्य प्रशासनिक सिद्धांतों के साथ प्रयोग करना अधिक उचित है।
भारतीय प्रशासन में प्रासंगिकता
भारत में आधुनिक संवैधानिक संस्थाएँ, पेशेवर नौकरशाही और डिजिटल सेवाएँ मौजूद हैं। इसके साथ ही सामाजिक असमानता, स्थानीय परंपराएँ तथा अनौपचारिक नेटवर्क भी प्रशासनिक व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। रिग्स के सिद्धांत को भारतीय प्रशासन में निम्न प्रकार से लागू किया जा सकता है।
- Formalism: सेवा प्रदान करने के लिए नियम मौजूद होने के बावजूद उनके क्रियान्वयन में देरी या असमानता का अध्ययन।
- Heterogeneity: डिजिटल प्रशासन और आधुनिक संस्थाओं के साथ सामाजिक, आर्थिक तथा तकनीकी असमानताओं का सह-अस्तित्व।
- Overlapping: औपचारिक प्रशासनिक अधिकारों के साथ स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों या अनौपचारिक नेटवर्क की भूमिका।
इन उदाहरणों का अर्थ यह नहीं है कि भारत को बिना शर्त प्रिज्मेटिक समाज घोषित कर दिया जाए। रिग्स का मॉडल विश्लेषण का साधन है; भारतीय प्रशासन के अलग-अलग क्षेत्रों का मूल्यांकन वास्तविक प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
एफ. डब्ल्यू. रिग्स का पारिस्थितिकी का सिद्धांत प्रशासन और उसके सामाजिक परिवेश के संबंधों को समझाता है। उनका Fused–Prismatic–Diffracted मॉडल सामाजिक विभेदीकरण की विभिन्न अवस्थाओं का विश्लेषण करता है। Heterogeneity, Formalism और Overlapping प्रिज्मेटिक समाज की प्रमुख विशेषताएँ हैं, जबकि Sala Model उसकी प्रशासनिक व्यवस्था तथा Bazaar–Canteen Model उसकी आर्थिक व्यवस्था को समझाने में उपयोगी हैं। इस सिद्धांत की मुख्य सीमा इसकी व्यापक श्रेणियों और विकास संबंधी मान्यताओं में है। फिर भी तुलनात्मक लोक प्रशासन में इसका महत्त्व बना हुआ है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक संस्थाओं की सफलता केवल नियमों पर नहीं, बल्कि उनके सामाजिक संदर्भ और वास्तविक क्रियान्वयन पर भी निर्भर करती है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य
- प्रमुख विचारक – Fred W. Riggs
- प्रमुख पुस्तक – The Ecology of Public Administration (1961)
- प्रिज्मेटिक समाज पर पुस्तक – Administration in Developing Countries: The Theory of Prismatic Society (1964)
- Fused Society – Agraria
- Prismatic Society – Transitia
- Diffracted Society – Industria
- तीन प्रमुख विशेषताएँ – Heterogeneity, Formalism, Overlapping
- प्रशासनिक मॉडल – Sala Model
- आर्थिक मॉडल – Bazaar–Canteen Model
- प्रमुख दृष्टिकोण – Ecological Approach
- अध्ययन का मुख्य केंद्र – प्रशासन और उसके सामाजिक परिवेश का संबंध
पुस्तकें –
- Fred W. Riggs, — The Ecology of Public Administration (1961).
- Fred W. Riggs, — Administration in Developing Countries: The Theory of Prismatic Society (1964).
- Richard A. Chapman, — “Prismatic Theory in Public Administration: A Review of the Theories of Fred W. Riggs” (1966).
- Wen-shien Peng, — “A Critique of Fred W. Riggs’ Ecology of Public Administration” (2008).
इन्हें भी पढ़े –
नवीन लोक प्रशासन का विकास (Evolution of New Public Administration)
नवीन लोक प्रबंधन का विकास (Evolution of New Public Management)
लोक प्रशासन के शास्त्रीय सिद्धांत: हेनरी फेयोल, लूथर गुलिक और मैरी पार्कर फॉलेट


